स्वराज से ही संभव, समृद्धि खुशहाली भ्रम में रहे, तो भटकाव सुनिश्चित

व्ही.एस. भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा : कहते है कि व्यक्ति स्वयं को, परिवार का मुखिया परिवार को, और समाज को समाज प्रमुख और राज्य या राष्ट्र को सत्ता प्रमुख चलाते हैं। यह स्थिति समाज, अर्थ, राजनीति या हर क्षेत्र में यथा संभव होती है। आज जब परिवार, समाज सत्ताओं, संगठनों का संचलन बदल रहा है और वह कही न कही किसी न किसी कारण से असफल अक्षम साबित हो रहे हो, तो ऐसी स्थिति में वह जिन्दादिल इन्सान भी चुप नहीं रहते, जिन्हें इन्सान होने के नाते अपनी जबाब देहियों का एहसास होता है।

आज जिस रास्ते जन, राष्ट्र कल्याण, सुख, समृद्धि  का दस्तूर चल निकला है जिसके चलते विभिन्न संगठनों, दलों, के रूप में सत्ता उन्मुख महत्वाकांक्षाओं के तहत संचालित किया जाता है या किया जा रहा है। उनकी इन महात्वाकांक्षाओं के बूटों  तले आशा, आकांक्षायें तो रौंधी ही जा रही है साथ ही विद्या, विद्यवान, प्रतिभाओं का भी दमन हो रहा है। जो न तो व्यक्ति, परिवार समाज, राज्य, राष्ट्र के हित में है न ही जीव जगत के हित में। स्पष्ट विजन, डी.पी.आर. के अभाव में युवा तरूणाई बुजुर्ग ही नही बच्चे भी भ्रम के दौर से गुजर रहे है।

मगर यहाँ देश के युवा बच्चे, बुजुर्गों को समझने वाली बाते यह है कि जिस तरह परिवार, समाज को उसका मुखिया अपने चन्द सहयोगियों की मदद से चलाते है। अपनी आशा, आकांक्षा पूर्ति के लिए। ठीक उसी प्रकार किसी भी संगठन, दल, सरकारों को भी चलाने वाले मुखियाओं के भी कुछ सहयोगी, शुभचिन्तक होते है। जिनकी संख्या भी हजारों में नहीं सेकड़ों में होती है। जिनके संगठन, दल, सरकारों की भी आशा, आकांक्षायें होती है। जिनकी पूर्ति के लिये वह स्थापित व्यवस्था में विधि स वत संघर्षशील रहते हैं। मगर जब वह अपने संगठन, दल, सरकारों की आशा आकांक्षाओं से इधर अपनी जबाबदेही उत्तरदायित्व जो जन व राष्ट्र कल्याण में निहित होती है, के निर्वहन में अक्षम, असफल होने लगे तो ऐसे में सबसे अहम जबाबदेही, उत्तरदायित्व उस राज्य, राष्ट्र के नागरिको की होती है जो राज्य, राष्ट्र समाज, परिवार के प्रति संवेदनशील और सजग होते है।

कहते हैं जब, जब युवा पीढ़ी या जागरूक नागरिकों ने अपनी जबाबदेही से मुँह मोड़ा है वहां के नागरिक ने इतिहास में भयंकर त्राषदी को झेला है। क्योंकि जब-जब युवा नागरिक व्यस्त और सत्ता में संगठन, दल, मस्त हो जाते है। उसका खामियाजा सभी को भुगतना पड़ता है। इसलिए जो महान नागरिक युवा राष्ट्र जन कल्याण की समझ और आस्था रखते हैं उन्हें यह सोच कर चुप नहीं रहना चाहिए। कि वह तो अन्य की तुलना में बेहतर है या उनका जीवन निर्वहन जिस भी स्थिति में हो, कम से कम हो तो रहा है।

यह सोच किसी भी सभ्य समृद्ध खुशहाल समाज के लिए घातक होती है। परिणाम की प्रतिभा, विद्या, विद्यवान ही नही मौजूद युवा, बच्चे, बुजुर्ग भ्रमित हो जाते हैंं। जरूरत आज स्वराज के रास्ते उस मार्ग को खोजने की है जो सीधा समृद्धि, खुशहाली की ओर जाता है और यह तभी संभव है जब इसकी शुरूआत हम स्वयं से करेंं। 

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