फकीर की बस्ती में दुंआ का अकाल: न डिटेल न ही, डी.पी.आर कैसे हो अब राष्ट्र उद्धार

व्ही.एस.भुल्ले/विलेज टाइम्स समाचार सेवा। संगठित करना या होना अलग विषय है, मगर शासन करना अलग विद्या है। कहते है कि स्वार्थवत, अहंकारी सत्ता, परिषदों ने इस महान राष्ट्र का बड़ा अहित किया है। आज सवालों का उठना साधारण बात हो सकती है मगर उनका सटीक जबाव ढूढ़ निकालना असाधरण काम है।  मगर हम महान भारत वासियों के सामने आज सबसे बड़ा और यक्ष सवाल है कि हम प्रकृति, पुरूषार्थ, संसाधनों समर्पित सत्ताओं के बीच क्यों हैरान परेशान है क्यों हमारा पुरुषार्थ प्रतिभायें प्रदर्शन से पूर्व ही दम तोडऩे मजबूर है। 

       कारण साफ है कि हमारी सत्तायें अहंम, अहंकार में डूब, जुनूनी घोड़े पर सवार हो सारी समस्याओं की जंग, बगैर किसी स्थापित रणनीत, डिटेल, डी.पी.आर का अध्ययन एवं सक्षम, सफल दस्ते के जीत लेना चाहती है। यह उस जुनून का ही परिणाम है कि हमारी सबसे अहम शिक्षा जो कि भी समाज या राष्ट्र की रीढ़ और स्वास्थ रक्त तथा और रोजगार ऊर्जा होती है। जिसमें जल उसका आहार मगर आज हम सक्षम पारदर्शी परिणाम मूलक प्रभावी शिक्षा, स्वास्थ, रोजगार जल नीति के अभाव में चारों खाने चित पड़े है। 

        ऐसे में न तो फकीर की इबादत न ही किसी ऑलिया का कॉल काम कर रहा है। बैसे भी इतिहास देखे, समझे तो अहम, अहंकारी स्वार्थवत सत्ताओं ने इस महान राष्ट्र का कई मर्तवा अहित किया है। क्योंकि संगठनात्मक आधार खड़ा करना अलग बात है। और शासन सत्ता को जबावदेह बना उत्तरदायी बनाना अलग बात है, जिसका सन्तुलन ही राजधर्म होता है। 

        ऐसा नहीं कि हमारे पास एक से बढक़र एक नीति, नीतिकार रणनीतकार या फिर संसाधन न हो, या फिर पूर्ण निष्ठा ईमानदारी से क्रियान्वयनकत्र्ताओं की कमी हो। हम पहले भी समृद्ध खुशहाल व विश्व विरादरी के मार्गदर्शक थे और आज भी बन सकते है। 

मगर यह तभी स भव है जब हमारी सत्तायें शासक पूर्ण निर्भीकता के साथ निष्ठा पूर्वक अपने कत्र्तव्य, उत्तरदायित्वों को समझ अपने राजधर्म का पालन करते हुये जीवन, मूल्य, न्याय सन्तुलन व सिद्धान्तों की रक्षा करे। जिस तरह से आज देश में रोजगार को लेकर बढ़ी हाय तौबा मची है व टी.व्ही. चैनलों, गांव, गली में समाधान को लेकर  चर्चा चल रही है। वह किसी भी स य समाज को झंझकोर देने वाली है। आज जो भी समस्यायें देश के सामने ऐसा नहीं कि उनका निदान असं भव हो। अगर नीत, नियत ठीक हो, तो कोई भी समस्या का समाधान असंभव नहीं। मगर सत्ताओं के अहम अहंकार, वैचारिक, दलीय निष्ठा और उनके प्रति समर्पण से आगे हम नहीं बढ़ पाते। जो समृद्ध, खुशहाल राष्ट्र निर्माण की बड़ी बाधा है। कुछ दिन पूर्व की ही बात है कि स्वराज ने सवाल उठाया था के देश में रोजगार की कोई समस्या नहीं। देश की सत्तायें, परिषद चाहे तो करोड़ों लोगों को स्थाई रोजगार मात्र 1 वर्ष में ही दिया जा सकता है। 

     मगर कहते है जिन सत्ताओं शासकों को अपने स्वयं और जनहित राष्ट्र हित की परवाह न हो और जो अपने और अपने दलों के एजेन्डो पर आंख, कान बंद कर अपने कत्र्तव्यों का निर्वहन करे, वहां न तो कभी समृद्धि आ सकती, न ही कभी खुशहाली। 

        बेहतर हो हम इतिहास और अतीत से सबक लेते हुये राष्ट्र निर्माण के एजेन्डे पर काम करें तो 5 वर्ष तो बहुत समय होता है। साल दो साल में ही परिणाम राष्ट्र के सामने होगें। बधाई के पात्र है जो त्याग कर इस  महान राष्ट्र निर्माण के लिये दिन रात एक कर रहे है। मगर जरा सी न समझी के चलते वह परिणाम नहीं मिल रहे। जिनकी देश को आशा-आकांक्षा है। और करोड़ों करोड़ नागरिक को दरकार बेहतर हो कि हम अपने निहित स्वार्थ छोड़ राष्ट्र निर्माण पर विचार करें। 
जय स्वराज
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