संकट में विरासत बगैर संघर्ष असंभव खुशहाली

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा। अमर शहीद महात्मा गांधी, सुभाषचन्द्र बोस एवं विराट व्यक्तित्व के धनी डॉ. राममनोहर लोहिया जैसी अनेकों विभूतियों ने समय, परिस्थिति, काल खण्ड अनुसार राष्ट्र की महान विरासत बचाने देश के नौजवानों को ही आवाज दे, अपने कर्तव्य निर्वहन एवं उत्तरदायित्वों का कारवां आगे बढ़ाया। यह वो महान व्यक्तित्व थे जो अपने-अपने संघर्ष के चलते राष्ट्र को परिणाम देने में सक्षम और सफल रहे। ऐसा नही कि इसके बाद देश में नेताओं का राष्ट्र व राष्ट्र की खुशहाली के लिये कोई आव्हान या संघर्ष नही रहा। कुछ सफल तो कुछ असफल रहे, मगर राष्ट्र के युवा व जिन्दा कौमो ने इस महान राष्ट्र को न तो कभी हताश किया और न ही कभी निराश किया। 

मगर जो निराशा, हताशा आज राष्ट्र के युवाओं में अपने भविष्य को लेकर घर कर रही है वह इस महान राष्ट्र के नौजवानों के लिये सुखद नहीं, न ही परिणाम मूलक। ऐसे में राष्ट्र के नौजवानों के आगे एक ही रास्ता बचता है कि वह महात्मा गांधी के रास्ते चल अपने बेहतर सपनो को साकार करने संघर्ष में जुटे। और यह तभी संभव है जब हम व्यवहारिक रुप से अलोकतांत्रिक हो चुके संगठनों से इतर सत्ता सौपानों तक लोकतांत्रिक तरीके से पहुंचने का अपना मार्ग प्रस्त करे और संघर्ष के लिये आगे बढ़े।  

यह सच है कि रास्ता इतना आसान नहीं और मौजूद लोकतांत्रिक व्यवस्था में इतने संसाधन सहज सुलभ भी नहीं, जो सत्ता सौपानों तक सहजता के साथ जाते हो। ऐसे में महात्मा गांधी, लोहिया द्वारा दिखायें मार्ग राष्ट्र व जनहित में सर्वोत्तम है। 

कहते है कि जिस राज्य या राष्ट्र की जिन्दा कौमे असहज और नौजवान संघर्ष से पूर्व स्वहित में डूब जाते है, वहां खुशहाली, समृद्धि दूर की कोणी साबित होती है। आज दुर्भाग्य हमारा यह है कि जिस तरह से विगत 20-25 वर्षो में सत्ता उन्मुख राजनीति के चलते दल, संगठनों ने राजनीति की नसरियों को तहस-नहस कर आसामाजिक तत्व, गुन्डो का राजनीति में रास्ता सहज किया है। उस राजनीति ने हमारे मूल्य सिद्धान्त ही नहीं, हमारी पर पराओं का बंटाढार किया है।

जिसका परिणाम कि आज विधान मण्डल, परिषद से लेकर संसद तक में जघन्य अपराधियों की लंबी चौड़ी फौज मौजूद है और दलों के नाम ऐसी प्रायवेट लिमिटेड कंपनियां अघोषित तौर पर अस्तित्व में है। जिनका विश्वास जनता, कार्यकर्ता, अच्छी छवि वाले नेताओं के बजाये नई-नई निर्जीव तकनीक और वोट कबाडऩे ऐसे-ऐसे सिस्टमों पर है जिनका न तो राष्ट्र, समाज से कोई लेना-देना सिर्फ वोट कबाडऩे के अलावा। देखा जाये तो सं या, धन और तकनीक बल के सहारे जनहित के नाम सत्ता भोगने वाले यह दल भी अब इतने असहज, असहाय है कि इनमें नेता के नाम मौजूद नेता भी अब सही सक्षम निर्णय लेने में अक्षम, असफल साबित हो रहे।

निश्चित ही मौजूद नेताओं के निष्प्रभावी होने के पीछे मात्र एक ही कारण हो सकता है कि उनके चाल-चरित्र, भाषा, व्यवहार में वह प्रमाणिकता समन्वय समानता, अनुभूति का आभाव जिसकी कि जीवंत समाज को अपेक्षा होती है। जो हमारे महान शहीद नेताओ में कूट-कूट कर भरी होती थी और नेतृत्व का आभा मण्डल इतना मजबूत कि लोग उनके कायल हुआ करते थे। अब समय आ गया कि हमारे नौजवान, बुद्धिजीवी आगे बढ़, महात्मा गांधी, सुभाष चन्द्र जी बोस और लोहिया जैसै महान व्यक्तित्वों के बताये रास्तों पर चल अपने पीडि़त बुद्धिजीवी, उघोगपति, किसान, गरीब, पीडि़त, वंचित, गांव, गली के नौजवानों को न्याय दिला अपने कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व का निर्वहन करें, तभी हम हमारी महान विरासत के महान संरक्षक और इस महान राष्ट्र के नागरिक कहला पायेगें। कहते है कि जब-जब जिस-जिस राज्य में जनता मूर्ख और धूर्त शासक रहने की चर्चा चरितार्थ हुई है तब-तब उन राज्यों का बंटाढार हुआ है।  जिस तरह से हमारी राजनीति में संख्या, धन, तकनीक, कुर्तक के बल आभा मण्डल तैयार हुआ है और अघोषित तौर पर कॉर्पोरेट राजनीति का प्रादुर्भाव हुआ है वह हमारी जीवन्त राजनैतिक विरासत के लिये खतरनाक है। 

जिस पर अविल व विचार उन दल संगठन, संस्था, नेता, नौजवानो, नौकरशाहों को भी करना होगा जो इसके घोषित, अघोषित तौर पर साक्षी, सहभागी है। वरना बहुत देर हो चुकी होगी हमें मान-सम्मान रखना होगा ऐसे दल, संस्था, संगठन, नौकरशाहों का जो लाख विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भी राष्ट्र व जन की समृद्धि, खुशहाली के लिये आज भी संघर्षरत है। तभी हम हमारी महान विरासत व जीवन मूल्यों को बचा व्यवस्था को अक्षुण रख पायेगें। 
जय स्वराज 

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