सटीक समाधान के आभाव में, दम तोड़ता पुरुषार्थ, इतिहास रचने उतावले निर्णयों में, न तो नया इनोवेशन, न ही कोई समाधान

व्ही.एस. भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा। 5 मार्च 2018 : जिस तरह से आजादी के बाद विगत 70 वर्षो में इतिहास रचने उतावले निर्णय होते रहे है,...

व्ही.एस. भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा। 5 मार्च 2018: जिस तरह से आजादी के बाद विगत 70 वर्षो में इतिहास रचने उतावले निर्णय होते रहे है,उसके चलते मौजूद सड़े सिस्टम से न तो कोई नया इनोवेशन ही हो सका और न ही ऐसे समाधान सामने आ सके। जिन्हें स्वर्ण अक्षरों में इतिहास में कोई स्थान मिल सके। अब्बल सटीक समाधान के आभाव में देश का पुरुषार्थ आज सफर ही नहीं, दम तोड़  बुढ़ावे की ओर अग्रसर होता रहा है और सत्तायें उसी सड़े सिस्टम में समाधान की उम्मीद तलाशती आज भी अपने अहंम, अहंकार में डूब अपनी पीठ थप-थपा रही है। 

परिणाम कि न तो हम शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, रोजगार के क्षेत्र में ऐसी कोई स्थाई समाधान खोज सके, न ही ऐसी कोई नजीर छोड़ सके , जो सर्व स्वीकार्य हो और न ही कोई ऐसा सिस्टम विकसित कर सके जो समाधान खोज सके। 

अगर कुछ हो सका, तो वोट की राजनीति और सतत सत्ता में बने रहने की महत्वकांक्षा जिसे संरक्षित करने 18-18 घंटे मेहनत और हवाई यात्राओं की नजीरे सुनाई जाती है। जबकि होना तो यह था कि ऐसे-ऐसे समाधानों , नये इनोवेशनों की शुरुआत की जाती, जो मार्गदर्शी ही नहीं, स्पर्शी अनुभूति पूर्ण और परिणाम मूलक होते। मगर हम सत्ताओं में रहकर भी ऐसी कोई लकीर खीचने में हमेशा अक्षम, असफल साबित होते रहे जो मौजूद ही नहीं, हमारी आने वाली पीढिय़ों के लिये भी स्थायी समाधान और नजीर साबित हो सकते थे।
  
दुर्भाग्य कि हमारे लोकतंत्र का, कि विगत दो दशकों से सत्ता संचालन में आध्यात्म, प्रतिभाओं के बजाये, सत्ता स्वार्थी, मण्डलियां और निर्जीव तकनीकें जीवन्त, जिन्दगियों के संबंध में निर्णय और फैसले लेने में सक्षम और सफल हो गयी। परिणाम कि सत्ता सिंहासन आज मानवीय मूल्य और प्रकृति प्रदत्त जीवन मूल्यों से इतर महत्वकांक्षाओं पर निर्भर हो गयी। सड़े सिस्टम को कौच नये-नये इनोवेशन का दम भरने वाली हमारी व्यवस्थायें ये भी भूल गई कि स्वच्छंद जीवन निर्वहन में कैसी नीति और किन-किन निर्णयों से समृद्धि, खुशहाली लायी जा सकती है। कैसे हमारे आने वाली पीढ़ी की जिन्दगियां स्वच्छन्द, समृद्ध, खुशहाल बनाई जा सकती है। 

आज जिस तरह से सत्तायें सतत सत्ता में बने रहने वोट के लिये सरकारी खजाने का उलीचा सोशल इन्जीनियरिंग के नाम वोट बैंक का जमाबड़ा तैयार करने में सारी ऊर्जा बर्बाद कर रही है। और जिनका अन्तिम लक्ष्य जनकल्याण से इतर केवल सत्ता प्राप्ति या सत्ता में बने रहना बन गया है।  बरना क्या कारण है कि प्रकृति प्रदत्त नैसर्गिक ज्ञान, आध्यात्म, सुविधायें जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल और रोजगार जैसी समस्यायें 70 वर्ष के संघर्ष के बाद भी समाधान के आभाव में विकराल रुप मेें आज हमारे सामने है। जनकल्याण के नाम विभिन्न योजनाओं के माध्यम से राहत के नाम बड़ी तादाद में जनधन का बटौना कभी किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। क्योंकि भीख भी बगैर किसी परिश्रम के या कारण के सनातन संस्कृति में अपराध या दोष पूर्ण माना गया है। जिस समस्या का समाधान व्यक्ति से व्यक्ति, परिवार से परिवार और समाज से समाज जीवन मूल्यों को आधार बना, आज भी स्वयं ढूंढ लेते  है या फिर यो कहें कि प्रकृति में मौजूद पेड़, पौधे, पशु-पक्षी जिनकी न तो कोई सरकारें है, और न ही संरक्षक संस्थायें स्वत: ढूंढ लेते है जो वेजुबान भी है और विज्ञान की माने तो मानव की तुलना में विवेक के मामले में भी शून्य जब उनका सिस्टम अनादिकाल से समाधान युक्त और समस्या मुक्त चला आ रहा है। ऐसे में हमारे सिस्टम ही नहीं, उन संस्थाओं के लिये शर्म और लज्जा की बात है। जो आध्यात्म, तकनीक, ज्ञान, प्रतिभा, पुरुषार्थ के मामले में पेड़, पौधे, पशु-पक्षी से कहीं आगे है और प्राकृतिक रुप से भी उन्हें सोचने-समझने और सर्वकल्याण करने की शक्ति अधिक प्रदान की गई है।

मगर जब हमारी मौजूद व्यवस्था में रिटार्यटमेंट की आयु 62 वर्ष और शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार के नाम पर सिर्फ आश्वासन और वोट के लिये नगद बांटने की नीतियां बनाई जाती है। तो उन्हें सुन, पड़, देखकर दुख भी होता और दर्द भी। कि जिस व्यवस्था में आजादी की तीसरी पीढ़ी अन्तिम पड़ाव पर है और शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, रोजगार की समस्यायें विकराल ही नहीं, विस्फोटक स्थिति में है।

ऐसे में सत्ता परिषदों में अहम अहंकार का भाव इस बात का स्पष्ट संदेश है कि समस्याओं का कुहासा फिलहाल छटने वाला नहीं। क्योंकि दुर्भाग्य से सत्ताओं में स्पर्शी अनुभूति पूर्ण निर्णय लेने वाले लोगों का आभाव और सत्ताओं को संचालित करने वाले स्वार्थियों की भरमार का भाव स्पष्ट परलक्षित है, इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए मगर कहते है कि किसी भी राष्ट्र, समाज, परिवार और व्यक्ति ही वह अन्तिम उम्मीद होता है जो किसी भी राष्ट्र को सही दिशा दिखा उसे शिक्षित, सुसंस्कृत, समृद्ध, शक्तिशाली, खुशहाल बनाने में अपना अहम योगदान देती है। यहीं बात आज हर नागरिक को समझना जरुरी है बरना देर हुई तो भविष्य में ऐसे संघर्ष पूर्ण जीवन की दुर्दशा और देखने मिले तो कोई अति संयाक्ति नहीं होगी। इसीलिये देश के बुद्धिजीवी, युवा वर्ग को राष्ट्र निर्माण या राष्ट्र सृजन और समस्या, समाधान के लिये एक होना ही पड़ेगा और विधि सबंद्ध अपनी एकजुटता का परिचय देते हुये उन सत्ताओं के मंदिरों तक पहुंचना पड़ेगा जहां आज देश के आम, गांव, गली, गरीब, किसान सहित उन विधा, विद्ववानों के भाग्य के फैसले हो रहे है। क्योंकि प्रकृति ने हर जीव को खुशहाल, स्वच्छंद जीवन निर्वहन करने कर्म करने के लिये भेजा है, जो हमारा कर्तव्य भी है और उत्तरदायित्व भी।  
जय स्वराज 

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