सत्तायें कुचल सकती है, मगर सत्य को बदल नहीं सकती।

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा : इतिहास गवाह है कि उन्मादी सत्ताओं ने अनादिकाल से ही ऐश्वर्य तो खूब भोगा, मगर वह कभी भी अपने अस्तित्व को संरक्षित और सुरक्षित नहीं रख पायीं। कई दौर, काल, खंण्ड ऐसे दिव्य, भव्य और गौरवशाली रहे। मगर उन्मादी सत्ताओं का कोई भी काल, खंण्ड, दौर ऐसा नहीं रहा, जिस पर कि गर्व किया जा सके। सिवाये एक ही संदेश के और वह सत्य का संदेश जिस पर हम गर्व भी कर सकते है और स्वयं को गौरांवित भी मेहसूस कर सकते है। अब जबकि नियति कलयुग के हाथ है और सत्य भी अपने विराट अस्तित्व में सामने। ऐसे में उन्मादी, अहम, अहंकारी सत्ताओं का जनसेवाओं के नाम उन्माद भी स्वयं को इतिहास में स्वर्ण अक्षरों के रुप में अंकित करने जैसा है। 

देखा जाये तो पूर्व और वर्तमान व्यवस्थाओं में प्रकृति, जन, जीव, कल्याण के लिये स्वयं-भू सत्ताओं की अपनी-अपनी सोच, विचार और व्यवस्थायें रही है। जो प्रकृति जन्य, जीवन मूल्य, सिद्धान्तों के संरक्षण, स बर्धन के लिये संकल्पित, संघर्षरत रही और आज भी है। मगर जो भाव व्यवस्थागत आम जन, जीव के बीच अनुभूति के रुप में होना चाहिए। अगर हम कुछ समय, काल, खंण्ड को छोड़ दें, तो वह व्यवस्थागत रुप से अपर्याप्त ही रही। 

आज जब हम कबीले, राजे-रजबाड़े आक्रान्ताओं से आगे निकल स्वयं के द्वारा स्वयं के लिये स्थापित व्यवस्था के बीच है। तब भी न तो हम उन्मादी, अहम, अहंकारी सत्ताओं से निजात पा सके, न ही ऐसी सर्वकल्याणकारी व्यवस्था ही स्थापित कर, उसे मूर्तरुप दे सके। जिसमें समस्तजन, जीव कल्याण सरंक्षित, स र्बधित हो सके। 

ऐसा नहीं कि प्रकृति जन्य, जीवन मूल्य, सिद्धान्तों के संरक्षण, स बर्धन के लिये प्रयास न हुये हो, या आज भी न हो रहे हो। बल्कि प्रचलित प्रयासों में कहीं न कहीं इच्छा-शक्ति, न्याय के सिद्धान्त के भाव का कहीं न कहीं आभाव ही रहा है। जो स्वच्छन्द जीवन निर्वहन में सबसे बड़ी बाधा है। अगर प्रकृति जन्य, जीवन मूल्य, सिद्धान्त एवं न्याय के आधार पर प्रयास किये जाते या किये जाये तो कोई कारण नहीं जो प्रकृति की इतनी सुन्दर कायानात और जीवन के रुप में मौजूद अमूल्य धरोहर को सजाया, सवारा न जा सके। मगर निहित स्वार्थ और स्वयं-भू की उन्मादी धारणा, आचार, विचार, व्यवहार के आगे वह जीवन अब स्वच्छंद जीवन न होकर संघर्ष पूर्ण समस्या ग्रस्त जीवन में तब्दील होता जा रहा है। 

जिस तरह से प्रकृति में विभिन्न विधा, विद्ववान, प्रतिभाओं का प्रकृति जन-जीव, कल्याण में अपने-अपने सामर्थ अनुसार संवर्धन, सरंक्षण में योगदान होता है। ठीक उसी प्रकार किसी भी स्थापित व्यवस्था में इनका योगदान उनकी योग्यता अनुसार होना चाहिए जो सन्तुलन के सिद्धान्त का पालन करते हुये अपनी-अपनी क्षमताओं अनुसार अपना योगदान कर सके। फिर व्यवस्था राजतंत्र की हो, या लोकतंत्र की। सभी में यह भाव समाहित होना चाहिए और राजन या सत्ता प्रमुख को इतना योग्य होना चाहिए कि वह स्थापित मूल्य सिद्धान्तों के अनुरुप व्यवस्था संचालन में समन्वय सामजस्य स्थापित कर हर क्षेत्र में सन्तुलन और न्याय के सिद्धान्त का पूरी निष्ठा ईमानदारी से पालन कर सके, तभी सर्वकल्याण संभव है। 
जय स्वराज 
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