मप्र: कुर्तक पर उतारु कॉग्रेस: चुनाव में चेहरा कॉग्रेस के लिये नई बात नहीं

वीरेन्द्र शर्मा/विलेज टाइम्स समाचार सेवा। मप्र कुर्तक पर उतारु कॉग्रेस हर चुनाव से पूर्व आखिर क्यों, भाजपा की जीत का रास्ता साफ रखना चाहती है यह तो कॉग्रेस आलाकमान के दिल्ली दरबार में बैठे मु य सलाहकार और उसकी परिषद के लोग ही जाने। मगर यह सत्य है कि कॉग्रेस जन्म से ही चेहरे की मोहताज रही है न कि संगठनात्मक संरचना की। सच यह है कि जब-जब कॉग्रेस का चेहरा मजबूत रहा तब-तब उसका संगठन भी मजूबत रहा और उसे सत्तायें भी मिलती रही। स्व. पं. नेहरु से लेकर इन्दिरा, राजीव गांधी और नरसिंहराव तक कॉग्रेस का संगठन जबदरस्त मजबूत और जमीनी स्तर तक रहा। उसके बाद सोनिया गांधी का भी चेहरा बड़े समय तक कॉग्रेस का सहारा रहा। 

मगर आज कॉग्रेस के नये नेतृत्व के बावजूद भी जिस तरह के तर्क-कुर्तकों का सहारा ले, कॉग्रेस को कमजोर करने का कार्य चमकदार प्रतिभाओं की अनदेखी कर, खुलेयाम कॉग्रेसी कर रहे है। वह आने वाले समय में कॉग्रेस के लिये शुभ संकेत नहीं। 

इससे बड़ा दुर्भाग्य कॉग्रेस का क्या होगा कि इसी कुर्तक के सहारे कॉग्रेस ने 2014 में भी मप्र में चेहरा घोषित न कर, जो गलती की उसका परिणाम कि उसे जबरदस्त हार का मुंह देखना पड़ा। जबकि सत्ताधारी दल भाजपा ने देश की राजनीति मेें पर पराओं से उलट प्रधानमंत्री पद का चेहरा घोषित कर, देश में अप्रत्याशित परिणाम हासिल किये और कॉग्रेस ने भी पंजाब चुनाव में जो परिणाम प्राप्त किये वह किसी से छिपे नहीं। 

मगर मप्र में कॉग्रेस का दुर्भाग्य यह है कि सत्ता लोलुप कुछ नेता हकीकत जानते हुये भी कुर्तक करने से नहीं चूकते। ये अलग बात है कि जो साम, नाम, दण्ड, भेद की नीति में माहिर है उन्हें जनता पसंद नहीं करती और जिन्हें जनता पसंद करती है वह साम, नाम, दण्ड, भेद की नीति में माहिर नहीं। परिणाम कि कॉग्रेस जहां 2013 का मौका गवां चुकी है बगैर किसी चेहरे के चुनाव मैदान उतर। 

साथ ही 4 वर्ष का समय इसी गफलत में निकाल चुकी है कि कोई तो चेहरा बनेगा, आगामी चुनाव में, मगर इसी अन्तर द्वन्द के चलते कॉग्रेस अभी तक यह निर्णय नहीं ले सकी। सिवाये इस संदेश के कि कॉग्रेस में चुनाव पूर्व चेहरा घोषित करने की पर परा नहीं और जिस तरह के परिणाम वह 2013 के चुनाव में देख चुकी है उसी दिशा में शायद वह अभी भी अग्रसर है। जो कॉग्रेस के लिये न तो सुखद है न ही परिणामदायी जिसका खामियाजा अगर भाजपा की रणनीत सही रही तो 2018 के आम चुनाव में भी कॉग्रेस को उठाना पड़ सकता है। हो सकता है कि दिल्ली दरबार के सलाहकार, रणनीतकार कॉग्रेस आलाकमान को यह बताने में सफल रहते हो कि अगर मप्र में किसी भी चमकदार चेहरे को मु यमंत्री का चेहरा बना दिया तो कहीं कॉग्रेस नेतृत्व की चमक कहीं खतरे में पड़ जाये। इसी डर से कॉग्रेस मप्र कॉग्रेस में फूट डालो और संगठन चला कि नीति पर चल निकला है जो कॉग्रेस आलाकमान ही नहीं, समुची कॉग्रेस के लिये घातक है। 

अगर कॉग्रेस आलाकमान चाहे तो सार्वजनिक न सही आन्तरिक तौर पर चमकदार चेहरे को ताकत दें, कॉग्रेस की नैया पार लगा सकता है। जो हर राजनेता राजनीति में बेहतर ढंग से समझता है अगर कॉग्रेस आलाकमान जो 4 वर्ष गवा चुका है अगर एक माह भी अपने निर्णय को लेने में असफल साबित होता है तो फिर मप्र ही नहीं, समुचे देश में उसका भगवान ही मालिक है। जिसकी शरण में आज उसे आंशिक सफलतायें नसीब हो रही है। 
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