देश-प्रदेश में रोजगार कोई समस्या नहीं, सरकारों में संकल्प, समाधान शक्ति का अभाव सांसत में, स्वयं-भू, समाधान की शिकार सत्तायें

व्हीएस भुल्ले विलेज टाइम्स समाचार सेवा। जब न्याय का भाव मजबूर और समाधान, संकल्प शक्ति का आभाव हो, तो समस्यायों का विकराल होना स्वभाविक है फिर क्षेत्र जो भी हो, किसी भी सत्ता की सबसे बड़ी समस्या स्वयं-भू समाधान और राजधर्म से दूर मातृत्व संगठनों के प्रति सामूहिक ला ा पूर्ण लयबद्धता है। जो किसी भी सत्ता की अक्षमता, असफलता का सबसे बड़ा कारण होता है।

       जिस रोजगार को लेकर चहुंओर कोहराम मचा है उसके हाथों हाथ समाधान के बड़े-बड़े आंकड़े भी आये दिन दि ााई, सुनाई दे जाते हैं। मगर ये आंकड़े न तो प्रभावी है न ही प्रमाणिक और स्पर्शी। जो आने वाले समय में देश के लिये घातक हो सकते है क्योंकि जब-जब प्रमाण प्रमाणिकता में अन्तर स्पष्ट होता है जो स्वभाविक भी है तब स्थिति बड़ी विकराल होती है जिसे राष्ट्र व जनहित में सत्ता, परिषद, सरकारों को दरकिनार नहीं करना चाहिए। 

अगर सत्ता, सरकारों की संकल्प, समाधान शक्ति मजबूत और प्रमाणिक होती, तो आज कोई कारण नहीं जो देश के करोड़ों हाथ एक ऐसी व्यानबाजी के मोहताज नहीं होते। जिसे सुन लोगों में आक्रोश का भांव पैदा होता हो। मगर सत्ताओं में जब जनकल्याण से इतर सामूहिक ला ा की प्रतिबद्धता और स्वयंभू-समाधान आड़े आता हो। ऐसे में निश्तिच ही करोड़ों बेरोजगार हाथ सफर करने पर मजबूर होते है जो किसी भी न्याय पूर्ण व्यवस्था के लिये अन्याय पूर्ण बात है। कहते हैं कि प्रमाण के लिये किसी पाखण्ड की आवश्यकता नहीं होती। 

     अगर वाक्य में ही आंकड़े अनुसार रोजगारों का सृजन हो रहा होता तो क्या कारण है जो हताश निराश बेरोजगार युवा, रोजगार के लिये दर-दर भटक ठोकरे खाते हुये उन संस्थानों पर अविश्चवास करते जिनकी प्रमाणिकता रोजगार मुहैया कराने की है। मगर राजधर्म से इतर सत्ता सीन आखिर इतने मजबूर कैसे हो जाते है जो सब जानते पहचानते हुये भी सही निर्णय लेने में अक्षम, असफल साबित होते रहते है। 

         बहरहाल जो भी हो जब सत्तायें अहंकार छोड़ एक सामान्य शासक की तरह सोचने लगती है तो समाधान स्वत: नजर आने लगते हैं। मगर जमीनी हकीकत से दूर जब सत्तायें, परिषद सरकारें स्वयं के थिंकटेक और मशीनरी पर अंधा विश्वास कर, जब वह आंकड़ों की बाजीगरी में जुट, सतत सत्ता प्राप्ति के लक्ष्य सर्वोपरि मान कत्र्तव्य निर्वहन में जुटते हैं तो ऐसे में समाधान नहीं समस्याओं के ऐसे मार्गो का निर्माण स्वत: हो जाता हैं जिन्हें पाटना मुश्किल ही नहीं, कभी-कभी नमुमकिन भी होता है। 
जय स्वराज    
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