काँग्रेस: क्या सी.एम. चेहरे में जीवन मूल्य और सिद्धान्त हैं, बड़ी बाधा

वीरेन्द्र शर्मा: जिन जीवन मूल्यों की खातिर जिस दल ने  फर्स से लेकर अर्स तक कभी भी जीवन मूल्य और सिद्धान्तों से समझौता नहीं किया। क्या आज वही जीवन मूल्य और सिद्धान्त काँग्रेस के लिए म.प्र. की राजनीति में सी.एम. चेहरे को लेकर बड़ी बाधा है। यही यक्ष सवाल आज राजनैतिक गलियारों में सर्वाधिक सरगर्म है। आज जिस तरह से म.प्र. की राजनीति में साम, नाम, दण्ड, भेद की नीति, जीवन मूल्यों को दरकिनार कर सिद्धान्तों से समझौता करने विवस है। वह किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए घातक और शर्मनाक भी है। मगर सबसे बड़ा धर्म संकट तो देश के उस सबसे बड़े दल के  सामने है। जिसे लोकतंत्र के जीवन मूल्य, सिद्धान्तों सहित मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए जाना जाता है।

आज उसी काँग्रेस के अन्दर सुचितापूर्ण जीवन मूल्य सिद्धान्त की राजनीति और साम, नाम, दण्ड, भेद की नीति के बीच अन्तर द्वन्द छिड़ा। जिसके परिणाम एक मर्तवा फिर से 2013 के बाद 2018 में घातक या अप्रत्याशित हो तो कोई अतिश्योक्ति न होगी। ये अलग बात है कि एक राष्ट्रीय टी.बी. चैनल के शिखर स मेलन कार्यक्रम में चुनाव से पूर्व सी.एम. चेहरे की घोषणा को लेकर एक राजनेता स्पष्ट रूप से जीवन मूल्य और सिद्धान्तों की राजनीति से समझौता न करने की बात कह चुके हैं। जिसके लिए वह कोई भी परिणाम भुगतने तैयार हैं तो वही दूसरी ओर शेष नेता दोहरा चुके हैं कि काँग्रेस में चुनाव से पूर्व चेहरा घोषित करने की पर परा नहीं है।  

बरहाल इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि म.प्र. की राजनीति में ज्योतिरादित्य सिंधिया का चेहरा एक ऐसा चेहरा रहा है जो संगठन विहीन हो चुकी काँग्रेस को 15 वर्ष के ल बे अन्तराल के बाद सत्ता दिला सकता है। जिसमें झाबुआ के उपचुनाव से लेकर चित्रकूट, अटेर और हालिया तौर पर कोलारस, मुगावली उपचुनाव की जीत में निर्णानायक भी रहा है मगर न तो आलाकमान  के सलाहकार और न ही म.प्र. के स्वयं भू नेता 2013 से सब कुछ जानते हुए भी 2018 तक यह स्वीकारने तैयार नही कि संगठन विहीन हो चुकी काँग्रेस को यही चेहरा मजबूत संगठन और म.प्र. में सत्ता दिला सकता है। अब इसे काँग्रेस का सौभाग्य कहे या दुर्भाग्य कि न तो स्वयं काँग्रेस न ही म.प्र. के क्षत्रप नेता और आलाकमान के सलाहकार यह सत्य स्वीकारने तैयार है कि दावा व शक्ति प्रदर्शन तो बाद में भी हो सकते है। राजनैतिक दांव पेच तो बाद में भी चले जा सकते है।



अगर 2018 भी 2013 की तरह जाता रहा तो कोई अतिश्योक्ति न होगी कि काँग्रेस की स्थिति म.प्र. में भी बिहार, उत्तरप्रदेश की तरह साबित हो। क्योंकि सियासी तैयारी से इधर टी.बी. चैनलों और सार्वजनिक ब्यान बाजी प्रदेश के कुछ नेता और प्रदेश प्रभारी के मुँह से म.प्र् की जनता आय दिन सुन रही है जो  न तो काँग्रेस न ही म.प्र. के हित में है। यह काँग्रेस आलाकमान और अस्तित्व की जंग में जुटे नेताओं को समझनी चाहिए। मगर वर्तमान हालातों के मद्देनजर लगता नहीं कि काँग्रेस 2018 से पूर्व ऐसा कुछ करने में सफल हो पाएगी जैसी कि उम्मीद आम काँग्रेसी म.प्र. में लगाये बैठे हैं।
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