क्या यशोधरा का अंध स्नेह और अपनत्व, सियासी षडय़ंत्रकारियों का बड़ा अस्त्र ?

विलेज टाइम्स समाचार सेवा, म.प्र शिवपुरी। जब से सियासत में श्रीमंत यशोधरा राजे सिंधिया ने अपनी मातृश्री की राजनैतिक विरासत सजोये रखने राजनीति में कदम रखा है तभी से क्या अपने, क्या पराये उन्हें किन्ही न किन्हीं कारण के चलते राजनति से दरकिनार करने का अभियान चलता रहा। मगर 30 वर्ष के लंबे अन्तराल के बाद न तो उनका, वह राजनैतिक रास्ता ही अवरुद्ध कर सके और न ही उनके कद को छोटा करने में कामयाब हो सके। 

कंटकों भरे रास्तों पर चलने की आदि हो चुकी, श्रीमंत यशोधरा राजे सिंधिया के राजनैतिक जीवन का शायद इसे भाग्य कहे या दुर्भाग्य कि क्षेत्रीय विकास, कल्याण और उनका लोगों के प्रति अन्ध स्नेह और अपनत्व का भांव ही लगता है कि उनके अपने राजनैतिक जीवन में सबसे बड़ी बाधा बनता रहा है। मगर उन्होंने कभी भी सेवा भावी एवं जीवन मूल्यों से जुड़ी राजनीति से मुंह नहीं मोड़ा और न ही कभी किसी से कोई सार्वजनिक शिकायत की। शायद यह संस्कार उन्हें उनकी मातृश्री से विरासत में मिला। जब भी कभी चुनाव आते है या फिर कोई बड़ा सियासी अभियान चलता है तो उसमें उनकी शख्सियत का उनका उपयोग तो अवश्य होता है। मगर उन्हें न तो उस कार्य का यश ही मिल पाता है और न ही उनके योगदान को सराहा जाता है।  

देखा जाये तो सियासी षड़यंत्रकारी उनकी कमजोरी को भली-भांति जानते है कि उन्हें किस तरीके से कमजोर करना है और जो भी व्यक्तिगत, सामाजिक, राजनैतिक रुप से उनके सहयोगी, शुभचिन्तक है। उन्हें कैसे दूर कराना है। 

अपुष्ट सूत्रों की माने तो यहीं षड़यंत्रकारी सियासतदार बड़ी ही सफाई से उनका राजनैतिक लाभ ले, आर्थिक लाभ भी विभिन्न माध्यमों से उठाते रहे है और चुन-चुन कर, ऐसे लेागों को यसोधरा से ही विभिन्न माध्यमों से षड़यंत्रक पूर्ण सूचनायें या शिकायत का नाटक रच वफादारों को दूर कराते रहे है। क्योंंकि सियासी षड़यंत्रकारी यह भलि भांति जानते है कि यसोधरा जिसे भी स्नेह और अपनत्व का भांव देती है या जिसे भी जमीन से उठा राजनीति के चोटी तक ले जाती है तो वह उसी स्नेह अपनत्व के नाते सार्वजनिक रुप से डांट डपट से भी नहीं चूकती। दूसरा साफ सुधरी राजनीति एवं साफ सुधरे सार्वजनिक जीवन में विश्वास रखने वाली मप्र की लोह पुरुष कही जाने वाली मप्र शासन में मंत्री का स्पष्ट और मुखर स्वभाव इसीलिये भी लोगों को गले नहीं उतरता क्योंकि अब राजनैतिक मूल्य सिद्धान्त और राजनीति भी बदल चुकी है और लोगों में नये संस्कारों का भी उदय हुआ है। 
          
टेलिफोन या अन्य सूचनाओं के आधार पर निर्णय लेने वाली श्रीमंत यशोधरा राजे सिंधिया के बारे में सियासी षड़यंत्रकारी बखूवी जानते है कि वह न तो यहां रहती और न ही उनका लोगों से ऐसा सीधा संपर्क रह पाता जिससे लोग सच को सामने रख सके। जिसके चलते वह पूरी गैंग बना उन्हें घेरे रहते है और अपने मंसूबे पूर्ण करने ऐसी-ऐसी सूचनायें, शिकायतें उन तक पहुंचाते रहे है जिससे न तो उनका ही भला हो सका, न ही राजनीति का।  

बहरहाल कहते है कि न तो किसी के लंबे जीवन के आदर्श, सिद्धान्त, व्यवहार को बदला जा सकता है और न ही उसे सवांरा जा सकता है। मगर कोशिश जीवन में अवश्य होनी चाहिए जो स्वस्थ एवं सफल सार्वजनिक राजनैतिक जीवन में अहम होती है। 

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