प्रमाणिकता के आभाव में अपेक्षा और उपेक्षा के बीच होगा घमासान, कहते है सियासत में झूठ चलता मगर झूठ पर झूठ नहीं चलता

विलेज टाइम्स समाचार सेवा: म.प्र. में मुगावली, कोलारस विधानसभा क्षेत्रों में आसन्न उपचुनाव के मद्देनजर जिस तरह से सत्ताधारी दल भाजपा और कॉग्रेस के बीच सीधा मुकाबला होता दिखाई देता है। तो वहीं दबे पांव आम आदमी पार्टी और लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी ऐन वक्त का इन्तजार कर, अपनी उपस्थिति के पत्ते खोलने तैयार नहीं, जैसी कि समुचे मुगावली एवं कोलारस विधानसभा क्षेत्रों में चर्चा का विषय है। 

दलों के अन्दर दावे प्रतिदावे जो भी हो, मगर प्रमाणिकता के आभाव में अपेक्षा और उपेक्षा के बीच जो घमासान मैदानी स्तर पर आम मतदाताओं को दिखाई सुनाई पड़ ही रहा है। वह बड़ा ही भीषण सुनाई पड़ता है। मगर जो संघर्ष दलों के अन्दर ही अन्दर छिडऩे की संभावनायें प्रबल हो रही है। उनके चलते जहां कॉग्रेस ने अपना प्रत्याशी घोषित कर डैमेज कन्ट्रॉल की कोशिश की है। तो वहीं निर्धारित नामाकंन की तारीख 31 जनवरी को मप्र के कॉग्रेस प्रभारी सहित अघोषित रुप से मुख्यमंत्री पद के दावेदार और आला नेताओं का नामांकन के दौरान उपस्थित रहना इस बात के स्पष्ट संकेत है कि कॉग्रेस 2018 के चुनाव से पूर्व कोई ऐसी कोर कसर नहीं छोडऩा चाहती जिससे कोई भी कारण उसकी जीत में बाधा बन सके।
  
अपुष्ट सूत्रों की माने तो सर्वाधिक खतरा तो सत्ताधारी दल के अन्दर ही मडऱा रहा है। जहां टिकट के कई  दावेदार टिकट हासिल करने ऐड़ी चोटी का जोर लगा, टिकट हासिल करने की जुगत में लगे है। तो वहीं दो माह से उक्त विधानसभा क्षेत्रों में मय दल बल के हाथ अजमाने वाले सत्ताधारी दल भाजपा अपनी सत्ता के हुकूक के बल गांवों की खांक छान मय सरकार के मुखिया और उनके नुमायदें सहित समुचा संगठन अभी तक केवल विकास, कार्य व वैचारिक आधार पर अपना आधार मजबूत करने में लगे है। 

अपुष्ट सूत्रों का तो कहना यहां तक है कि अब टिकट जिसको भी मिले मगर बगावत तो तय है। फिर वह बगावत चौराहे पर हो या भूमिगत, बैसे भी सरकार और सत्ताधारी दल भाजपा ने क्षेत्रीय नेता और मप्र सरकार की कद्दावर मंत्री को इस उपचुनाव से अछूता कर पहले ही इस बात के बीज डाल दिये कि दल और सरकार में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा। जो नेता विगत 30 वर्षो से इस क्षेत्र में सक्रिय रह अपनी मां और भाजपा की जननी कही जाने वाली कै. राजमाता विजयाराजे सिंधिया की राजनैतिक विरासत को ढो रहा हो और उसी के विधानसभा क्षेत्र वाले जिले की विधानसभा सीट से अलग थलग रखना सत्ताधारी दल की अपनी समझ और सोच हो सकती है। 

मगर जब चुनाव प्रतिष्ठा का हो, तो निश्चित ही सभी की मदद लगती। बहरहाल क्या सही, क्या गलत यह तो सत्ताधारी दल और सरकार ही जाने। मगर जिस तरह से चर्चाओं में अन्दर खाने की खबरें आ रही है उसके चलते टिकट पाने वालों की फैरिस्त भले ही दो या तीन नामों पर टिक गयी हो और लोगों की टिकट के लिये बनी आशा-आकांक्षायें टूट चुकी हो। मगर जिस दिन भी टिकट सत्ताधारी दल तय करेगा उसे एक नये गणित का सामना करना पड़ सकता है। 

अगर प्रमाणिक आंकड़ों पर जायें, तो 2013 से पूर्व हुये कोलारस विधानसभा क्षेत्र में हुये आम चुनावों में कॉग्रेस की हार और भाजपा की जीत का आंकड़ा मात्र 200 वोट के अन्दर ही था। मगर 2013 के आम चुनावों में भाजपा की हार का आंकड़ा लगभग 25 हजार के पार था। अब ऐेसें में अगर 5 हजार से लेकर 15 हजार तक वोट का आंकड़ा अपने पक्ष में रखने वाले किसी प्रबलदावेदार नेता या फिर टिकट की आशा-आकांक्षा में लिस्टबद्ध टिकट दावेदार जिनके पास भी लगभग 4 हजार से लेकर कम से कम 5 हजार तक का आंकड़ा हैं। इतना ही नहीं जिस तरह से विभिन्न जातियों के सामाजिक स मेलनों के सहारे लोगों में नेतृत्व की आशा-आकांक्षायें प्रबल हुई उनका भी आंकड़ा 10 हजार से लेकर 30 हजार के आसपास माना जाता है जैसी आम चर्चा है। 

अगर इनमें से किसी की भी भावना या आशा-आकांक्षायें प्रभावित होती है तो निश्चित ही चुनाव सत्ताधारी दल को सहज और सुलभ रहने वाला नहीं। ये अलग बात है कि भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री ही नहीं, कई मंत्री सहित संगठन के मजे हुये नेता और समर्पित कार्यकर्ता पार्टी की जीत सुनिश्चित करने में जुटे है। ज्ञात हो कि कभी आरक्षित इस विधानसभा सीट पर आरक्षण मुक्त होने के बाद दो आम चुनाव के बाद पहली मर्तवा उपचुनाव हो रहा है। जिसका बड़े ही रोचक रहने की संभावना है। ऐसा नहीं कि विपक्षी दल कॉग्रेस में भी आशा-आकांक्षा टूटने के बाद भीतर घात व संगठनात्मक कमजोरी के कारण कम हो। मगर सारी स्थिति सामने आने में नामांकन वापसी की अन्तिम तारीख का इन्तजार तो सभी को करना ही होगा। 

फिलहाल तो इस उपचुनाव में दावे प्रतिदावे के बीच प्रमाणिकता अपेक्षा और उपेक्षा के सवाल तो यक्ष है ही साथ ही यह भी सुगूफा सर चढक़र समुचे विधानसभा क्षेत्र में चल रहा है जैसी कि चर्चा है। कि माना सियासत में झूठ चलता है, मगर झूठ पर झूठ नहीं चलता है। अब किसका झूठ किसका सच इसका निधारण तो कोलारस विधानसभा क्षेत्र के उन स्वाभिमानी आम गांव, गरीब, किसान तथा आम मतदाता को 24 फरवरी को करना है। जिसके परिणाम ही यह साबित करेगें कि सच क्या है और झूठ क्या है किसकी आशा-आकांक्षायें पूर्ण हुई और किसकी उपेक्षा और अपेक्षा खरी उतरी। 

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