क्या छव्वे बनने की तैयारी..........? तीरंदाज

व्ही.एस.भुल्ले: भैया- चुनाव आते ही हारा कलेजा तो मुंह को आवे। सियासतदारों के ऐसे षडय़ंत्र और मंसूबे देख, मने तो लागे कि मैं तो कभी चुनाव न लड़ू। मगर कै करु गांव, गली, गरीब, किसान की खातिर कुछ तो हारा भी धर्म होवे। भले ही हारी पहचान ब्लेक इन व्हाईट, साप्ताहिक, धीमी गति का समाचार भले ही होवे। मगर हारा भी हारे महान लोकतंत्र में कोई कर्तव्य जबावदेही तो है। सो मने तो इधर-उधर की पकड़ अपनी जबावदेही अपने चिन्दी-पन्ने में पूरे मान-सम्मान, स्वाभिमान के साथ निभाने की कोशिश कर रिया हूं। 

भैये- तने तो बावला शै, कै थारे को मालूम कोणी कि युदूवंशियों और रघुवंशियों की पावन भूमि पर झूठ, सच को लेकर सेक्यूलर और रेगूलर के बीच रण क्षेत्र छिड़ा है। कोई कौरव, पाण्डवों का युद्ध, तो कोई जीत-हार का युद्ध मानकर चल रहा है। समुचे क्षेत्र में छिड़ी विकास, विनाश को लेकर बहस के बीच मने तो हारे दल की चिन्ता सताये जा रही है। रोटी, पानी हलक से दूर तो रात भर नींद नहीं आ रही है। काडू बोल्या कि थारे दल का कितना ही इकबाल बुलंद क्यों न हो, मने तो बोल्यू भाया सफाया तय है।

भैया- तने भी कै अर्र-बर्र बोल्ये जा रहा है शै और काडू की बात पर थारे को इतना विश्वास क्यों सता रहा शै, कै थारे को मालूम कोणी कि हारे दल की सरकार ने जनता जनार्दन की सेवा में पलक पावड़े बिछा रखें है और योजनाओं के ऐसे-ऐसे कीर्तिमान स्थापित किये है। जिनकी मिशाल थारे को इस महान भू-भाग पर और कहीं देखने सुनने मिलने वाली हाथों हाथ भूमि पूजन और घोषणाओं की बौछार के बीच लावो-लश्करों की भाग दौड़ से अब तो पगडन्डी भी सडक़ बन चुकी है और हर किसी को कुछ न कुछ राहत अवश्य मिली है। कै ऐसे में भी हारी नहीं चल पायेगी। 

भैये- बात चलने न चलने की नहीं, जिस तरह से थारे दल ने रणनीत बनाई है उसके चलते हारे को तो लागे कि प्रतिद्वन्दी तो दूर कोणी दल के अन्दर ही वह कोहराम छिडऩे के आसार नजर आते है। कि ऐन मौके पर न तो थारे को और न ही थारे महान दल को निगलते-उगलते बनेगा। क्योंकि जो भी रुठा वह छोटा-मोटा नहीं बड़ा गच्चा देने में सक्षम होगा। 

भैया- चुपकर मुंये गर किसी ने सुन लिया तो थारी तो थारी हारे ब्लेक व्हाईट साप्ताहिक धीमी गति के समाचार तो समाचार थारी भी घिग्गी बंद हो जायेगी। क्योंकि यह सियासी संग्राम साधारण ही नहीं, असाधारण होने वाला है। जिसमें हर एक-एक सूरमा सिपहसालारों के शौर्य का इतिहास लिखे जाने वाला है। अन्दर आने की माने तो जिस तरह से स्थानीय सैनिक, सेवक, सिपहसालार, सूरवीर, सेनापतियों को इस महान संग्राम में इकनोर कर उन्हें अपमानित किया जा रहा है। उसके रहते मने न लागे कि हारे दल को इस सियासी संग्राम में कोई सफलता मिलने वाली है। इसीलिये मने तो चुप ही रहना थारे और हारे हित में है। 

भैये- तो क्या ऊपर वाले के आर्शीवाद और हारी सेवाओंं के चलते हारी जीत सुनिश्चित हो पायेगी कि अन्य सियासी संग्रामों की तरह सिंध के इस मैदान में भी हमारी र्दुगति हो जायेगी? 

भैया- मने न तो कोई हस्तरेखा, विशेषज्ञ हूं न ही महान गणतज्ञ हूं मैं ठहरा चित्रकार-पत्रकार मैं कै जानू सियासत के इन गूढ़ रहस्यों को यह तो थारे को कोई सियासी पण्डित ही बता पायेगा। मगर इतना जाडू कि गर हारे दल का कारवां इसी तरह सियासी समर युद्ध में बड़ा तो कहीं ऐसा न हो कि सियासी शतरंज पर मोहरे तो पूर जमे दिखाई दे और मात्र एक घोड़े की चाल से ही सारे शतरंज का खेल खत्म नजर आये।

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