प्रभावी विकल्प और रणनीत के आभाव में अपमानित होती कॉग्रेस

वीरेन्द्र शर्मा, विलेज टाइम्स समाचार सेवा: देश में मौजूद वैचारिक राजनैतिक दलों की रीति-नीति और प्रभावी विकल्पों सहित अहम, अहंकार और निहित स्वार्थो क चलते मानों लोकतंत्र में राष्ट्र व जनहित मेंं राय रखना भी मानों बैमानी-सा हो गया है। लोकतंत्र एवं वैचारिक रुप से संगठित दलों के नाम चंद हाथों में निहित स्वार्थो के चलते सिकुड़ते दल या सीमित दायरे में सिमटते सत्ता प्रमुख इस हद तक असंवेदनशील हों, निहित स्वार्थो में डूब जायेगेंं। शायद ही किसी ने सपने में भी सोचा होगा। जो दल व सत्तायें अपने निहित स्वार्थ और महत्वकांक्षाओं के चलते न तो कानून का राज ही प्रभावी बना सके, न ही अपनी सामाजिक सांस्कृतिक विरासत को बचा सके, जो किसी भी राष्ट्र और उस राष्ट्र के नागरिकोंं के लिये अहम होता है।
एक ओर जहां सत्तामद में डूब सियासी दलों की महत्वकांक्षाओं के चलते स्वयं सत्ता या दल प्रमुख को अक्षम,असफल महसूस कर, इतने बड़े महान राष्ट्र का नेतृत्व करने का मंसूबा लिये समय-समय पर समय के हाथों इसीलिये भी अपमानित और अक्षम साबित होते रहे है या हो रहे है। कि वह न तो प्रभावी विकल्प देश को दे सके, न ही ऐसी कोई रणनीत राष्ट्र के सामने प्रस्तुत कर सके जिससे देश के नागरिक स्वयं पर गर्व कर स्वंय को गौरान्वित मेहसूस कर पाते। कारण जो भी हो, अपने अन्दर वह सक्षमता और सफलता का भांव अपने दल व अधीनस्तों एवं राष्ट्र के नागरिकोंं में शायद इसीलिये भी पैदा नहीं कर पा रहे कि वह कहीं न कहीं किसी न किसी ऐसी अक्षमता का शिकार है जिसके चलते उन्हें समय बेसमय अक्षम और असफल साबित होना पड़ता है। 

हालिया मसला देश में पर्याप्त रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ जैसी विहगम समस्याओं को लेकर ज्वलंत है तो दूसरी ओर देश के प्रमुख राजनैतिक दल के प्रमुख के 26 जनवरी के समारोह में सम्मान जनक सीट को लेकर है। दोनों ही स्थिति में परिणाम वहीं विकल्प और प्रभावी रणनीत को लेकर है जिसके आभाव में यह अहम मुद्दें देश में चर्चा का विषय है। 

जिस तरह से सत्ताधारी दल देश के सबसे बड़े प्रमुख विपक्षी दल को सुनियोजित तरीके से अपमानित करने का कोई मौका नहीं छोडऩा चाहता है। चाहे वह मनरेगा से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन की वर्षगांठ या फिर 69वें गणतंत्र पर कॉग्रेस अध्यक्ष की बैठक व्यवस्था हो। मगर जिस तरह से कॉग्रेस पूर्ववत गलतियों को दौहराते हुये 2014 से 26 जनवरी 2018 तक का सफर तय कर चुकी है। उसमें शायद भविष्य में भी कोई सुधार संभव हो, ऐसा असंभव ही है जैसी कि आम चर्चा है। क्योंकि जब से स्व. राजीव गांधी का नेतृत्व कॉग्रेस से जाता रहा, तभी से कॉग्रेस एक प्रभावी विकल्प और रणनीत के आभाव में छरण के रास्ते पर अग्रसर होती रही और वह क्रम आज तक जारी है। जबकि समुचे देश में उसके सफाये के बाद कॉग्रेस दो-पांच प्रदेशों में ही सत्ता में शेष बची है।

कारण साफ है कि जिस रास्ते कॉग्रेस स्व. राजीव गांधी के बाद चली आज भी उसी रास्ते पर चल रही है। जहां न तो अब कॉग्रेस में प्रतिभा, विधा, विद्ववानों का जमावड़ा है और न ही मेहनतकश वह नेता और कार्यकर्ता जिनके कारण उसे देश में गौरव प्राप्त था। वहीं सत्ताधारी दल कॉग्रेस की कमजोरी पकड़ सिर्फ उसकी एक ही कमजोर नस को दबाता रहा और वह क्रम आज भी जारी है। जिसके चलते वह आज समुचे देश में अपना परचम फहराने आतुर है।

बेहतर होता कि कॉग्रेस नेतृत्व 26 जनवरी के रोज छठवी लाइन में न बैठ महात्मा गांधी की तरह आमजन के बीच बैठ गणतंत्र दिवस का आनन्द उठाता। मगर एक बार फिर ऐसा नहीं हो सका जिसके लिये कॉग्रेस को देश ही नहीं, समुचे विश्च में गौरव प्राप्त है। अब जबकि 2019 कोई ज्यादा दूर नहीं और कॉग्रेस संगठन भी जस का तस है और उसकी नीतियां भी जस की तस, ऐसे में प्रभावी विकल्प न होना सत्ताधारी दल के लिये एक वाकऑव्हर जैसा ही है। 

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