सृजन स्वत: सिद्ध होता है, बशर्ते सोच, समझ सृजनात्मक, सकारात्मक हो

विलेज टाइम्स समाचार सेवा, व्ही.एस.भुल्ले:  हजारों सेकड़ों वर्षो से नंगे, भूखे, प्यासे, स्वयं की आशा-आकांक्षा लुटा पीडि़त, वंचितों ने हमेशा...

विलेज टाइम्स समाचार सेवा, व्ही.एस.भुल्ले: हजारों सेकड़ों वर्षो से नंगे, भूखे, प्यासे, स्वयं की आशा-आकांक्षा लुटा पीडि़त, वंचितों ने हमेशा से ही सत्ताओं का संरक्षण भी किया है और समय-समय पर उनकी रक्षा कर उनके संवर्धन का भी कार्य किया। मगर अनादिकाल से सत्तायें आती रही जाती रही। कुछ ने इतिहास गढ़ा तो कुछ इतिहास में दफन हो गई। सत्तायें आज भी है और कल भी रहेंगी। मगर राष्ट्र को राष्ट्र और उसे महान आकार पहचान देने वाले राष्ट्र, प्रकृति भक्तों की संख्या कभी भी इस महान भारतवर्ष में कम होने वाली नहीं। 

ये सही है कि काल के दुष्प्रभाव या सदप्रभाव से हमारी संततियां कोमे कभी धर्म, संप्रदाय तो कभी जाति, क्षेत्रों में बटी रही है जो क्रम आज भी तीव्रता के साथ जारी है। मगर इस महान भू-भाग पर सृजन कर्ताओं की कमी न तो तब थी और न ही आज है। 

यह भी सच है कि काल परिस्थितियों अनुसार सत्तायें, अत्याचारी, सदाचारी, सर्वजन सुखाय सर्वजन हिताय के सिद्धान्तों पर चलती रही और आज भी चल रही है। कभी कुछ सत्तायें अपने स्वार्थवत सिद्धान्त, अहम, अहंकार में डूब, बड़ी-बड़ी सियासत, सल्तनतों को अपने बूट तले कुचल, सृजन से लड़ती रही तो कुछ सत्तायें सृजन के साथ राष्ट्र जनकल्याण में भी जुटी रही, जो आज भी हमारे महान ग्रन्थ इतिहास मेंं दर्ज है। 

मगर जिस तरह से अपने मंसूबे पूरे करने आज की सत्तायें या सत्ता शीर्ष अहंम, अहंकार, स्वार्थवत सिद्धान्तों के चलते एक नई संस्कृति का निर्माण कर खुशहाल, कल्याणकारी, समृद्ध, समाज, राष्ट्र  निर्माण की सोच रखती है। तो उन्हें अवश्य सृजन का अर्थ और उस महान संस्कृति के सिद्धान्त को समझना होगा। जो कभी हमारी समृद्ध विरासत रही है। ऐसी सत्ताओं को समझना होगा कि महान भारतवर्ष कोई भूमि का टुकड़ा नहीं या सीमाओं में बंधा कोई राष्ट्र उसकी सांस्कृतिक विरासत आज समुचे भारतवर्ष में विराजमान है। जिसका अपना एक सुनहरा इतिहास, संस्कृति, संस्कार और एक प्रमाणिक इतिहास है, जिसकी महानता कायम रखने में यहां के नागरिक प्रकृति, संस्कृति, संस्कारों का बड़ा योगदान है। 

जिस महान राष्ट्र के कण-कण में सृजन, त्याग, समर्पण सहित संपन्नता का भाव है, वहां के नागरिक आज बेहाल हो और सत्तायें निहित स्वार्थ बस जनभावनाओं के साथ षडय़ंत्र पूर्ण झूठ बोल सिर्फ और सिर्फ  जनभावना जनाकांक्षाओं पर ही आरोप लगा, सवाल उठाती हो, वह सत्तायें राष्ट्र व जन कल्याणकारी कैसे हो सकती है। जो संगठित संचालक सत्ता शीर्ष की पद गरिमा या त्याग पुरुष व्यक्ति या व्यक्तियों की प्रतिष्ठाओं को दांव पर लगा, अपने अविवेकपूर्र्ण मंसूबो को पूरा करना चाहते है। उन्हें समझना चाहिए कि न तो उनके मातृ संगठन का यह सिद्धान्त है और न ही ऐसी पहचान रही है, और न ही कभी ऐसी पहचान और सिद्धान्त रह सकते है। कभी दूसरे संगठनों को समझाने वालों को समझना चाहिए कि संगठन की मूल आत्मा क्या है उसकी सोच क्या है। उसके माध्यम से राष्ट्र जन कल्याण के लिये क्रियान्वयन का माध्यम क्या है? जो पीढिय़ां त्याग, तपस्या कर इस राष्ट्र के लिये मर अपना सबकुछ इस महान राष्ट्र की खातिर न्यौछावर कर गयी उनकी आत्मायें आज अपने कृतत्व और संतत्व पर रौती होगीं। आज उस गरीब, पीडि़त, वंचित लोगों के पूर्वज की रुहें पछताती होगीं कि क्या वह ऐसा ही अखण्ड, समृद्ध भारतवर्ष चाहते थे जैसा कि हम जानते है। कि कभी महान भारतवर्ष को आर्य वृत, भरत खण्डे के नाम से पहचान प्राप्त थी। हमें विचार करना चाहिए अपनी पहचान की, हमें स मान करना चाहिए उस महान राष्ट्र का जहां हम निर्विघन भाव से अपने बन्धु बान्धवो, प्रिय, सहजनों के साथ सुख शान्ति के साथ निवास करते है। 

देश में आज अपने सत्ता प्रमुख या सत्ताओं की निष्ठा, ईमानदारी को लेकर न तो इस देश के किसी भी नागरिक न ही किसी राष्ट्र भक्त को उनकी राष्ट्र भक्ति पर कोई संदेह नहीं, न ही कोई शिकायत। मगर जब-जब प्रकृति के नैसर्गिक सिद्धान्तों के खिलाफ अन्यायपूर्ण व्यवहार या प्रतिभा विधा विद्ववानों के साथ अन्याय हुआ है तो ऐसे में प्राकृतिक सिद्धान्त सहित प्रतिभा संरक्षण और न्याय की रक्षा के लिये इस महान भू-भाग पर ऐसी सत्ताओं के खिलाफ बगावत ही नहीं, खुला संग्राम हुआ है। जिसका मार्गदर्शन संत, शिक्षक, विधा, विद्ववान और समाज प्रमुखों ने समय-समय पर इस महान राष्ट्र की खातिर किया है। फिर वह सत्तायें, साम्राज्य कितने ही शक्तिशाली, वैभवशाली क्यों न रहे हो, उनका नाम लैवा पानी देवा इस इस महान भू-भाग पर नहीं बचा, हमारे पवित्र ग्रन्थ रामायाण, गीता उसके प्रमाण है।   

देखा जाये तो आज आजाद भारत में पूर्ववत सरकार के अलावा हमारी वर्तमान सरकार ने कई क्षेत्रों में जनकल्याणकारी, विकास उन्मुख शुरुआत की है और ढांचागत निर्माण भी। मगर संघीय ढांचागत और लोकतांत्रिक व्यवस्थागत मजबूरियां भी कुछ राष्ट्र व जनकल्याण के मार्ग में हमेशा से बाधायें उत्पन्न करती रही। मगर हमारे राष्ट्र जनकल्याण का कारवां आगे बढ़ता रहा। मगर जो प्रमाणिक परिणाम खासकर रोजगार के क्षेत्र में हमें प्राप्त होने थे वह न हो सके। क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जितनी जटिल  प्रक्रियायें है उतनी सरल भी, मगर किसी भी समस्या का समाधान न हो यह हमारी महान लोकतांत्रिक व्यवस्था में अस भव नहीं।  
अभी कुछ ही दिन पूर्व हमारे त्याग पुरुष प्रधानमंत्री जी ने टी.व्ही. पर इन्टरव्यू में कहा कि उन्होंने सवां सौ करोड़ के देश में औपचारिक, अनौपचारिक रुप से लाखों करोड़ों खर्च कर करोड़ों लोगों को रोजगार दिया। हो सकता है आंकड़े सही हो मगर यह भी सच है कि देश के पीडि़त, वंचितों को उज्जवला सहित जनधन, फसल बीमा, आवास, शौचालय के क्षेत्र में लोगों को सीधा प्रभावी लाभ मिला है। 

मगर स्थाई सृजनात्मक रोजगार शिक्षा, शोध के क्षेत्र में जो आशा-आकांक्षायें देश वासियों की थी वह बिगड़े व्यवस्थागत आचरण और प्रधानमंत्री जी की लाख कोशिशों के बाद वह पूर्ण नहीं हो सकी। इसे हमारे प्रधानमंत्री जी को अपने स्वभाव अनुरुप स्वीकारना चाहिए। 

प्रभावी परिणाम न मिले, तो मायूस होना स्वभाविक है। जिस तरह से रेल, पैट्रोल पंप, सडक़, आवास, फसल बीमा, शौचालय, उज्जवला, जनधन ने आम पीडि़त, वंचित ही नहीं, समुचे राष्ट्र में अपनी प्रभावी पहचान बना प्रमाणिक परिणाम दिये है यह किसी से छिपा नहीं। 

तीसरी और सबसे अहम बात यह है कि 15 अगस्त पर लाल किले की प्राचीर से स्वराज का अर्थ परिभाषा बताने वाले हमारे प्रधानमंत्री जी की प्रभावी स्पीच का स्वराज से जुड़ा अंश अगले ही दिन मीडिया रिर्पोटो से गायब हो गया।  

दूसरा जब प्रधानमंत्री जी ने राष्ट्र व जनकल्याण की खातिर देश को एक छत के नीचे ला व देश के दोनो सदनों को साथ बैठा 1942 की भारत छोड़ोंं की वर्षगांठ पर, अपना बड़ा दिल करते हुये एक नई शुरुआत की और अपने प्रभावी स बोधन के दौरान जब उन्होंने देश के महापुरुषों के साथ पूर्व प्रधानमंत्रियों का उल्लेख किया तो फिर उनके उदबोधन से स्व.पण्डित नेहरु का नाम क्यों छूट गया जबकि देश ही नहीं समुचा विश्व जानता है कि प.नेहरु गुट निरपेक्ष आन्दोलन के चलते विश्च में एक प्रभावी नेता के रुप में अपनी पहचान और आजादी के आन्दोलन में वर्षो जेल काटने के बाद देश के प्रथम प्रधानमंत्री ही नहीं आाजदी के सिपाही रहे थे। जिसके चलते प्रधानमंत्री जी की प्रभावी पहल बैकार हो गई हो सकता है भाषण की स्क्रिप्ट लिखने वाले की त्रुटि रही हो। मगर एक अहम मौका सशक्त राष्ट्र निर्माण का एकता के अभाव में जाता रहा।

कहते है कि सत्ता प्रमुख लोकतंत्र में हो या फिर राजतंत्र या फिर संस्था सहित सरकार और संस्थाओं में, अगर उन्हें एक मजे हुये जौहरी की तरह हीरे की परख करने या सोचने, समझने का समय नहीं मिलेगा तो उन्हें अपने सत्ता संचालको, सलाहकारों के अविवेक, अज्ञानता बस अपनी सरकार की कार्यप्रणाली की अलोचनाओं का पात्र अवश्य बनना पढ़ेगा।  

वरना क्या कारण है कि समुचा जीवन राष्ट्र के लिये खपाने वाला एक अनुशासित दृढ़ निश्चियी सृजन में विश्वास रखने वाले व्यक्ति को 18-18 घंटे की मेहनत और रातों का सफर करने के बावजूद भी आलोचनाओं का शिकार होना पड़े जिसके लिये वह न तो कदाचित दोषी ठहराया जा सकता है और न ही उसकी ईमानदारी कत्र्तव्यनिष्ठा में राष्ट्र के प्रति कोई कमी। 

जब राष्ट्र को समर्पित किसी व्यक्ति पर बगैर किसी दोष के आरोप-प्रत्यारोप हो, तो मानवता के नाते दुख भी होता है और दर्द भी। यहां हम ऐसी तीन घटनाक्रमों का उल्लेख करना चाहते है जिससे बहुत कुछ समझा जा सकता है।

पहला जनधन, श्री, फसल बीमा, आवास, शौचालय, सिंचाई, ग्रीन इण्डिया, उज्जवला, स्टार्टप, कौशल विकास, मुद्रा बैंक सहित एक से एक बढक़र राष्ट्र जनकल्याणकारी प्रभावी स्पर्शी योजनायें लागू होने के बाद भीराष्ट्र व आमजन को कुछ योजनाओं को छोड़, स्पर्शी          

इतना ही नहीं प्रधानमंत्री जी ने कई मर्तवा अपने विभिन्न उदबोधनों में राष्ट्र निर्माण में अच्छे-अच्छे सुझाव विभिन्न मंचो से राष्ट्र वासियों को दिये। बगैर आलोचनाओं की परवाह किये राष्ट्र व जनहित में निर्णय लिये। मगर न तो वह ठीक से क्रियान्वित हो सके जो क्रियान्वित हुये उनके क्रियान्वयन के तरीके लोग नहीं समझ सके। कारण निहित स्वार्थ, भ्रष्टाचार का दंश वर्षो से झेलता सिस्टम ईमानदारी की वह रफतार नहीं सहन कर सका जिस पर प्रधानमंत्री जी सिस्टम को दौड़ाना चाहते है इसके लिये दोषी कौन? यहीं यक्ष सवाल आज देश के सामने सबसे अहम है। जिसकी समीक्षा प्रधानमंत्री जी को अपने व्यस्त समय से निकाल अवश्य करनी चाहिए। क्योंकि यह इस महान भारतवर्ष का सौभाग्य है कि आज एक ऐसा प्रधानमंत्री देश के पास है। जिसके रहते यह देश एक मर्तवा फिर से खुशहाल, समृद्ध, शक्तिशाली राष्ट्र बन सकता है, बशर्ते हीरों की खोज पत्थरों के बीच, स्वयं प्रधानमंत्री जी को ही करनी होगी और समीक्षा भी, क्योंकि देश में आज भी रोजगार कोई समस्या नहीं, बल्कि इस महान राष्ट्र के लिये वरदान है। जरुरत एक मात्र व्यक्ति की है जो प्रधानमंत्री जी के सरंक्षण में राष्ट्र व जन की खातिर सृजनात्मक समाधान दे सके।  
जय स्वराज 

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तीरंदाज,321,व्ही.एस.भुल्ले,515,
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Village Times: सृजन स्वत: सिद्ध होता है, बशर्ते सोच, समझ सृजनात्मक, सकारात्मक हो
सृजन स्वत: सिद्ध होता है, बशर्ते सोच, समझ सृजनात्मक, सकारात्मक हो
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