राहुल राष्ट्रीय नेता है, या प्रादेशिक.........?

वीरेन्द्र शर्मा, विलेज टाइम्स समाचार सेवा: अब इसे हम अपने महान लोकतंत्र का भाग्य कहे या दुर्भाग्य कि जिस तरह से देश के दलों के अन्दर लोकतांत्रिक सरंचना पद गरिमा का हास हो रहा है वह बड़ा ही हास्यपद  शर्मनाक ही नहीं, बल्कि किसी भी मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिये खतरनाक भी है। वर्तमान राजनैतिक परिवेश में अब तो नगरीय निकाय चुनावों से लेकर विधानसभा, लोकसभा तक के चुनावो में दलों को अपने राष्ट्रीय नेताओं का मुंह ताकना पड़ता है और प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री जैसे जबावदेह संवैधानिक पदों पर बैठे नेताओं को अपने संवैधानिक उत्तरदायित्वों को दरकिनार कर, लोकसभा, विधानसभा ही नहीं, अब तो नगरीय निकाय चुनावों में भी दल की जीत सुनिश्चित करने ऐड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ता है। रहा सवाल विपक्षी दलों का तो वहां भी लोकतंत्र के नाम सत्ताधारी दलों से इतर ज्यादा कुछ नहीं। 

अगर यो कहे कि आज राजनैतिक दल अघोषित रुप से लोकतंत्र को दरकिनार कर, कॉरपोरेट कल्चर की ओर तेजी से बढ़ रहे है। और नेताओं के नाम कुछ किरदार बन, संचालक या संचालन समितियों के सहारे चल रहे है। जिनमें जीवंत ऐहसास का आभाव अब स्पष्ट परिलक्षित होता दिखाई पड़ता है। नहीं तो दलों को नेता का चाल चरित्र और उसकी त्याग पूर्ण जीवन पद्धति और विद्धबता उसे आक्रशक मजबूत लीडर और ऐसे लीडरों का कार्यकर्ताओं का समूह चमकदार दल बनाते थे।  जिनसे लोकतांत्रिक तरीके से दल भी चलते थे और उन दलों की लोकप्रियता से सरकारें भी बनती थी। मगर आज जिस तरह से राजनैतिक दल फिर वह सत्ता में हो या विपक्ष में जिस तरह से राष्ट्रीय नेता या सत्ता प्रमुख के नाम पर सत्ता हासिल करने हर चुनाव में आजमा रहे है वह किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिये उचित नहीं।  

देखा जाये तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में सभी की अपनी-अपनी संगठनात्मक जबावदेही दलो में तो दलीय आधार पर तो सरकार बनाने वाले दलों से देश के संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की जबावदेही उत्तरदायित्व और कत्र्तव्य होते है। मगर विगत वर्षो में या तो देश के अन्दर लोकतांत्रिक पर परायें दरक रही है या फिर नेतृत्व और दल आतंरिक तौर पर निस्तानाबूत होते जा रहे है। जिसका स्थान अब कॉरपोरेट कल्चर लेते जा रहे है।  विगत 5 वर्षो में हुये चुनावों को हम देखें तो इन चुनावों में न तो वार्ड, नगर, जिला, महानगर, प्रदेश नेतृत्व इतने प्रभावी बचे कि जिन पर राष्ट्रीय नेतृत्व, दल अपना विश्चास व्यक्त कर सके, न ही दलों में ऐसे राष्ट्रीय नेता बचे जिनका नाम लेकर वार्ड, नगर, जिला, महानगर, प्रदेशों में जीत-हार का काम चलाया जा सके। 

इस नई लोकतांत्रिक संस्कृति के स वर्धन में न तो सत्ताधारी दल बीजेपी पीछे रहना चाहती है, न ही प्रमुख विपक्षी दल कॉग्रेस हालिया मसला मप्र का है। जहां मुख्यमंत्री की सभाओं और ऐड़ी चोटी का जोर लगाने के बाद भी सत्ताधारी दल वार्ड, नगर, महानगर, पालिका सहित विधानसभा चुनाव तक हार रहा है, तो वहीं पर परा के नाम पर कॉग्रेस भी उसी रास्ते चल अपना सत्ता प्राप्ति का मार्ग अपने निक मेपन का और अर्कमण्यता को छिपा तय करना चाहती है। 

2003 में करारी हार के बाद 2013 के आम विधानसभा में केन्द्रीय नेतृत्व के नाम शर्मनाक हार हासिल करने वाली कॉग्र्रेस ने 2018 में होने वाले आम विधानसभा चुनाव से पूर्व स्थानीय प्रादेेशिक नेताओं की सक्षमताओं को नकार, एक बार फिर से यह इकबाल बुलंद किया है। कि केन्द्रीय नेतृत्व अर्थात कॉग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ा जाये। क्योंकि कॉग्रेस में मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने की पर परा नहीं है। 

अब ऐसे तर्क, कुर्तक करने वालों को कौन समझाये कि आज की राजनीति में जो जन व प्रदेश सहित दल के हित में हो, वहीं संस्कृति, पर परा बन जाती है। बैसे भी राहुल गांधी राष्ट्रीय नेता है न कि किसी जिला, संभाग, क्षेत्र, प्रदेश के। अगर 15 वर्ष से सत्ता के बाहर बैठी कॉग्रेस इस चुनाव में भी कुर्तक भरी पर पराओंं के पालन में जुटी रही, तो उसका सत्ता से बाहर रहना सुनिश्चित है। फिर जब कॉग्रेस ही नहीं बचेगी तो पर पराओं का पालन कौन करेगा। जैसी कि कॉगे्रस के अन्दर मची स्वार्थ पूर्ण सर फुटब्बल की  चर्चायें सरगर्म है। जो नेता राहुल की छत्र-छाया या उनके नेतृत्व मेंं मप्र में अगर सत्ता वापसी चाहते है तो उन्हें यह भी मालूम होना चाहिए कि मप्र में हार हो, या जीत, उसका श्रेय तो बैसे भी राष्ट्रीय अध्यक्ष का ही होता है। क्या प्रदेश के नेता अभी तक स्वयं के सत्तावत स्वार्थो को छोड़ वह जनाधार लोकप्रियता नहीं जुटा पाये जिसके लिये नेता जाने जाते है जो राहुल के नेतृत्व की आड़ में अपने सत्तावत स्वार्थ सिद्ध करना चाहते है। 

यह यक्ष सवाल आज कॉग्रेस आलाकमान राहुल गांधी के सामने होना चाहिए और इस तरह के तर्क, कुर्तक कर, विगत एक दशक से कॉग्रेस पार्टी को कमजोर करने वालो से विगत 10 वर्ष की सत्ता तो 15 वर्ष  की विपक्ष की भूमिका का हिसाब लेना चाहिए। अगर राहुल यह कर सके, तो कोई कारण नहीं, जो मप्र में 2018 में सत्ता वापसी से कॉग्रेस को कोई रोक सके फिर नेतृत्व स्वयं राहुल करें या फिर किसी अन्य नेता को सौंप नेतृत्व कराये या स्वयं करें। कॉग्रेस की जीत अवश्य होगी जैसी कि आम मप्र में सिंधिया के नाम को लेकर चर्चा है। मगर मुख्यमंत्री का चेहरा तो कॉग्रेस को ही तय करना होगा, वरना हार सुनिश्चित है। फिलहाल चर्चाओं का क्या, चर्चा तो आम है मगर अपुष्ट सूत्र भी यह बताते नहीं थकते कि अगर मुख्यमंत्री चेहरा कॉग्रेस जल्द से जल्द नहीं दे सकी तो जैसी कि मौजूद विधायक और कॉग्रेस के कार्यकत्ताओं सहित आमजन की भावना सिंधिया नाम को लेकर है, तो कॉग्रेस को एक बार फिर से सत्ता के साथ अघोषित रुप से गलबईयां करने वाले मप्र ही नहीं, दिल्ली में बैठे सलाहकारों की सलाह के चलते सत्ता से हाथ धोना पड़े तो कोई अतिश्योक्ति न होगी। 
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