क्या तर्क, कुर्तकों से घिरी कॉग्रेस का काया कल्प असंभव ?

वीरेन्द्र शर्मा, विलेज टाइम्स समाचार सेवा:  वर्तमान राजनैतिक हालातों में देश में मौजूद राजनैतिक दलों के अन्दर कितने ही बड़े महान लोकतंत्र ...

वीरेन्द्र शर्मा, विलेज टाइम्स समाचार सेवा: वर्तमान राजनैतिक हालातों में देश में मौजूद राजनैतिक दलों के अन्दर कितने ही बड़े महान लोकतंत्र की दुहाई क्यों न दी जाती हो। मगर जिस तरह से दलों के अन्दर एक महान लोकतांत्रिक देश में लोकतंत्र को दरकिनार कर, इकला चल के रास्ते दल चल निकले है और दल में मौजूद कुछ व्यक्ति अहम तो शेष हासिये पर पड़े है, यह बड़ा ही शर्मनाक है। भले ही हासिये पर पड़े वह व्यक्ति कितने ही काबिल क्यों न हो, न तो वह दल न ही संगठन में चलते, तर्क, कुर्तकों के सामने दलों की काया पलट करने में अक्षम, असफल साबित हो रहे है। हाालिया मामला 2018 में देश के सबसे अहम राज्य मप्र में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर सर्वाधिक चर्चा में है। जिसका केन्द्र बिन्दु भले ही अपने संगठनात्मक मजबूत ढांचे के चलते सत्ताधारी दल, भले ही न हो। मगर प्रमुख राजनैतिक दल चौदह वर्ष तक सत्ता के बाहर रहने के बावजूद भी सबक लेने तैयार नहीं। 

मप्र के प्रमुख विपक्षी दल कॉग्रेस की दुविधा यह है कि उसमें मौजूद कई धड़ों की अपनी-अपनी स्वार्थ सिद्धि उतावली हो तर्क, कुर्तकों के माध्यम से कॉग्रेस को उस रास्ते पर चलने में बाधा साबित हो रही है, जहां से रास्ता सीधा सत्ता की ओर जाता है। कॉग्रेस के लिये एक दुर्भाग्य की बात यह भी है कि वह 2003 की करारी हार जिसमें उसे 220 सीटों में से मात्र 36 सीटें ही हासिल हो सकी और वह चौदह वर्ष में मप्र के अन्दर ऐसा कोई सर्वमान्य नेता नहीं खड़ा कर सकी। जो गुटों में बटी कॉग्रेस को चौदह वर्ष बाद एक सूत्र में पिरों पाता या फिर 2013 के चुनावों में ही मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित हो मप्र में कॉग्रेस की सरकार बना पाता। 

यहां यक्ष सवाल कॉग्रेस के प्रति निष्ठा रखने वाल मप्र के वह क्षत्रप नेता जो मु यमंत्री पद के चेहरों को लेकर आमने-सामने दिख रहे है या फिर दिल्ली में बैठे कॉग्रेस के उन रणनीतकारों को लेकर यह है, कि जो लोग 2013 के चुनाव के पूर्व मु यमंत्री चेहरे को घोषित न कर, चुनाव लडऩे की दलीले दे रहे थे। और कॉग्रेस में मुख्यमंत्री चेहरा न घोषित करने की पर पराओं का पत्रकारों के बीच पानी पी-पी कर दम भर रहे थे। आखिर उन बड़े रणनीतकारों का क्या हुआ। कम से कम कॉग्रेस के नये निजाम राहुल गांधी को दिल्ली में बैठे उन कॉग्रेस के रणनीतकारों से यह सवाल अवश्य करना चाहिए कि 2013 में नाम न घोषित कर, कॉग्रेस की इतनी बुरी हार क्यों हुई। और वो कौन-कौन वह नेता थे, जिन्होंने यह तर्क दें, कि मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने में कॉग्रेस सत्ता में नहीं आ पायेगी। 

आखिर कॉग्रेस ने ऐसे सलाहकारों के खिलाफ क्या कदम उठाये और जो 2018 के विधानसभा चुनावों में मुख्यमंत्री का चेहरा न घोषित करने के तर्क दें, बजाये अहम मुद्दों पर सत्ता पक्ष को घेरने के यह व्यान देने में मशगूल है। कि कॉग्रेस का कोई मु यमंत्री चेहरा नहीं। क्योंकि कॉग्रेस में यह पर परा नहीं। 

अब ऐसे तर्क, कुर्तक करने वाले नेता और आंख बंद कर सत्ताधारी दल को वाकऑवर देने वाले तथाकथित नेताओं से कौन पूछे कि मप्र में मौजूद कॉग्रेस संगठन एवं उसके अनुवांशिक संगठन सेवा दल, युवक कॉग्रेस, एनएसयूआई, महिला कॉग्रेस, किसान कॉग्रेस, कर्मचारी कॉग्रेस जैसे अहम संगठन जमीनी स्तर पर किस हालात में है। और क्यों चुनाव से पूर्व मु यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने मौजूदा कॉग्रेस विधायक ही नहीं, कॉग्रेस कार्यकर्ता कर रहे है, शायद इसका उत्तर उन तर्क, कुर्तक करने वाले कॉग्रेस के रणनीतकारों के पास हो। मगर मु यमंत्री के चेहरे को लेकर इसी तरह तर्क, कुर्तक चलता रहा और नये निजाम को मप्र की सल्तनत जिताने का कारवां उन्हीं के नेतृत्व में आगे बढ़ता रहा, तो कोई कारण नहीं कि कॉग्रेस की हालात, उत्तराखंण्ड, गोवा, मणीपुर, उत्तरप्रदेश, बिहार, गुजरात से भी बत्तर हो, गुजरात में तो इज्जत इसीलिये बच गई कि कमान स्वयं राहुल के हाथ थी और रणनीत भी अलग। साथ ही आन्दोलनकारी तीन युवाओं का कॉग्रेस को साथ। मगर मप्र तो वह प्रदेश है जहां आन्दोलन तो दूर उसके नेताओं तक का पता नहीं।  

फिलहाल तो गत दिनों जिस तरह से कॉग्रेस विधायकों की बैठक में मु यमंत्री चेहरे को लेकर जिस तरह की बाते की गई और कॉग्रेस आलाकमान राहुल गांधी के नेतृत्व में चुनाव लडऩे की बात मप्र कॉग्रेस प्रभारी की मौजूदगी में हुई उसे देखकर तो यहीं लगता है कि मप्र में कॉग्रेस लौटने वाली नहीं। अगर जल्द ही राहुल गांधी ने स्वयं संज्ञान ले, मप्र का मसला नहीं सुलटाया, तो वह दिन दूर नहीं, लोग जब लोग मप्र में भी कॉग्रेस को गये गुजरे समय की पार्टी कहने से नहीं चूकेगें। 

बहरहाल इस बात की संभावना कम ही है क्योंकि कॉग्रेस का निजाम तो बदल गया। मगर रणनीतकारों की जमावट दिल्ली में ज्यों की त्यों है। जो बजाये संगठनात्मक गतिविधि बढ़ाने के रोजाना बेसर पैर के मुद्दों पर दिमाक व ऐसे राज्यों से राहुल का दिमाक हटाना चाहती है जहां कॉग्रेस के सत्ता में लौटने की उ मीद है। क्योंकि सत्ताधारी दल से परदे के पीछे गलबईयां कर स्वयं के स्वार्थ सिद्धि में जुटे नेता जानते है कि अगर मप्र में कॉग्रेस की सरकार बनी, तो उनके हित में प्रभावित हो सकते है। और मप्र में कॉग्रेस ही नहीं, स्वयं आलाकमान राहुल गांधी भी मजबूत हो सकते है। जिसके चलते उन लोगों का घर बैठना तय है जो अपने आपको कॉग्रेस का बड़ा क्षत्रप मान अपनी राजनैतिक गोटियां बैठाने में लगे रहते है। 

देखना होगा कि राहुल गांधी मप्र के इस अहम मसले को कैसे लेते है। अगर निर्णय में जरा भी देर या चूक हुई तो परिणाम उत्तराखंण्ड, बिहार, उत्तरप्रदेश और गुजरात से भी बत्तर साबित होगें। बेहतर हो कि राहुल स्वयं मप्र की कमान संभाल, ऐसे तर्क, कुर्तकों को विराम दें, जो 2018 में कॉग्रेस को घातक सिद्ध होने वाले है। क्योंकि मप्र कॉग्रेस में न तो नये लोगों को जोड़ा जा रहा और न ही नेतृत्व का मौका दिया जा रहा जैसी कि चर्चा है। जिस तरह से कॉग्रेस ने अपने प्रवक्ता भर्ती की गुप-चुप प्रक्रिया अपनाई और विभिन्न संगठनों में कोई नयी नियुक्ति इस दौरान नहीं की उससे स्पष्ट हो जाता है कि मु यमंत्री का चेहरा घोषित न होने के पीछे की मंशा तर्क, कुर्तक करने वालों की क्या है। और कॉग्रेस के लिये 2018 में सत्ता का रास्ता कितना सुगम और सहज रहने वाला है।  

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