बेरोजगारी कोई समस्या नहीं, समस्या समाधान की है, रोजगार को लेकर लकीर पीटती सत्ता और संस्थायें

विलेज टाइम्स समाचार- जिस तरह से सत्ता व संस्थायें बढ़ती बेरोजगारी को लेकर चितिंत व समाधान के लिये लालाहित नजर आती है और बेरोजगारी की विकराल समस्या के समाधान हेतु संसाधन को जुटाती है वह सब न काफी सिद्ध नजर आते है। देखा जाये तो निदान हेतु लाख कोशिशो के बावजूद भी उसके प्रयास अक्षम असफल होने के पीछे मात्र एक ही कारण है कि देश के ज्ञान, विधा, विद्ववानों का व्यवस्था में आभाव एवं कारगार रणनीति का निर्माण मुख्य कारण है। जब तक हमारी सत्तायें, संस्थायें, ज्ञान, विधा, विद्ववानों के मान-सम्मान और स्वाभिमान सरंक्षण के साथ उनकी सुरक्षा कर उनके संबर्धन का मार्ग प्रस्त नहीं कर लेती तब  तक देश में स्थाई व्यवस्थागत रोजगार जुटा पाना असंभव ही नहीं नमुमकिन है। 

प्राय: विगत 40 वर्षो से हमारी सत्तायें लकीर की फकीर बन या तो कुबेरपतियों, निवेशकों या फिर एनआईआर सहित विश्व बैंक का मुंह ताकती रही है। मगर आज तक न तो सरकारें तेजी से बढ़ती जनसं या वाले देश में दूरगामी विजन देश के सामने रखने में सफल हो सकी और न ही कोई ऐसी डिटेल, डीपीआर प्रस्तुत कर सकी जिस पर हमारा महान राष्ट्र गर्व कर स्वयं को गौरान्वित मेहसूस कर सके। 

विज्ञान तकनीक व छवि चमकाऊ कानसेप्ट के माध्यम से रोजगार समस्या का हल ढूंढने वाली सत्तायें व संस्थायें इन 40 वर्षो में न तो कोई स्थाई रोजगारों का सृजन कर, बढ़ती आबादी के अनुपात: में रोजगार उपलब्ध करा पायी, न ही वह ऐसे साधन जुटा कोई ऐसी संरचना ही देश के सामने रख पायी। जिसकी लयबद्धता के सहारे देश में रोजगार का सृजन हो पाता। 

सत्ताओं के अहम, अहंकार और दलगत भावनाओं के आगे दम तोड़ता ज्ञान, विज्ञान, विधा, विद्ववान के लिये न तो देश में कोई ऐसी प्रभावी संस्था पैठ बना पायी जो ज्ञान, विधा, विद्ववानों को संरक्षित, संर्बधित कर, उन्हें ऐसा कोई प्लेट फोर्म मुहैया करा पायी जिससे खाली हाथों को स्थाई रोजगार मिल सके। वर्तमान हालात यह है कि भारत जैसे पवित्र, महान, समृद्धशाली देश में यूं तेा रोजगार कोई समस्या है, न ही बढ़ती जनसंख्या। 

अगर सत्तायें निहित स्वार्थ छोड़, दलगत भावनाओं से ऊपर उठ ज्ञान विधा, विद्ववानों का मान-सम्मान कर, उनके स्वाभिमान की रक्षा करना सीख जाये तो हम भारत वासियों का प्राकृतिक स्वभाव भी सृजन कर्ता के रुप में रहा है। देखा जाये तो हम महान भारतवासियों के सामने ऐसा कोई कारण नहीं, जो करोड़ों हाथों को हाथों हाथ दो-चार वर्ष ही नहीं, बल्कि कुछ माह या एक वर्ष के अन्दर ही करोड़ों स्थाई रोजगार मुहैया कराये जा सकते है। जिसके लिये न तो निवेशकों की आवश्यकता है, न ही उन धन कुबेरों की जरुरत जिनका नैसर्गिक स्वभाव ही लाभ कमाना होता है न कि कल्याण। इस विकट बेरोजगारी समस्या निदान के लिये मात्र एक व्यक्ति ही काफी जो पूरे संकल्प के साथ राष्ट्र व जनसेवा कर, देश व देश वासियों लिये कुछ कर दिखाने का मादा रखता हो। मगर दुर्भाग्य कि नई व्यवस्थागत संस्कृति के चलते हम सबकुछ होने के बावजूद भी दर की दर ठोकरे खाने पर मजबूर है। 

अगर वाक्य में ही सत्तायें बेरोजगारी का समाधान और विश्व गुरु बन महान राष्ट्र के मान-सम्मान, स्वाभिमान के लिये कार्य कर, देश के करोड़ों करोड़ जन व राष्ट्र की सेवा करना चाहती है। तो सत्तायें ही नहीं, सत्ता प्रमुख और उनके रणनीतकारों को राष्ट्र व जन की खातिर उन नगीने, नवरत्नों की खोज कर उन्हें राष्ट्र निर्माण की मुख्य धारा से जोड़ जबावदेहियां सुनिश्चित करनी होगीं जिसके लिये अनादिकाल से समुचे विश्व में भारतवर्ष को जाना जाता है। तभी हम महान भारत वासियों की सक्षमता, सफलता सिद्ध होगी। बरना हमारी सत्तायें अपने नैसर्गिक स्वभाव अनुरुप उन बैंक, संस्था, निवेशक, कुबेरपतियों के ही मुंह ताकती रहेंगी। जिनका नैसर्गिक स्वरुप और संरचना सिर्फ और सिर्फ नैतिक, अनैतिक लाभ प्राप्ति के लिये होता है,न कि राष्ट्र और जनकल्याण की दृष्टि से। व्यवसाय और कल्याण दोनों विपरीत ध्रुव है। जिनके बीच सन्तुलन का कार्य ही सत्ताओं और सत्ता प्रमुखों की जबावदेही रही है और सच्चा कर्तव्य निर्वहन भी। 
जय स्वराज 
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