जातियों पर भारी बेरोजगारी यात्रा, बैठक, सम्मेलनों को लेकर उठे सवाल

शिवपुरी विलेज टाइम्स समाचार सेवा: कोलारस आसन्न उपचुनावों को लेकर आम मतदाता की लुभावनी घेराबंदी के चलते, विभिन्न राजनैतिक दलों द्वारा अपने-अपने स्तरों पर किये जा रहे विभिन्न समाजों के सम्मेलन, बैठक, घोषणायें, क्रियान्वयन को लेकर अब समुचे कोलारस क्षेत्र में मौजूद भयंकर बेरोजगारी पर भी सवाल उठने लगे है। जिसे देखकर लगता है कि जीत हार की तैयारियों के बीच विभिन्न राजनैतिक दलों को, विभिन्न समाजों के थोकबंद वोट हासिल करने चाकचौबंद लुभावनी घेराबंदी कहीं बेरोजगारी का मुद्दा भारी न पड़ जाये। 

300 से अधिक पोलिंग बूथ वाले इस विधानसभा क्षेत्र में यूं तो न तो कोई ऐसे बड़े शिक्षण, संस्थान है और न ही रोजगार के साधन। लगभग समुची आबादी के जीवोत्पार्जन का अगर कोई माध्यम है तो वह ले देकर खेती, किसानी ही है। मगर गिरते जल स्तर और सूख चुके नदी, नाले, तालाब, कुओं के बीच अब तो खेती, किसानी के भी लोगों के सामने लाले है। अगर यो कहे कि समुची खेती किसानी अब भू-जल स्त्रोत या फिर कुछ स्थानों पर मौजूद नदी, नाले, तालाबों में शेष बचे जल पर निर्भर है, तो कोई अति श्योयोक्ति न होगी। 

मगर इस चिन्ता और विपदा से इतर जिस तरह से जीत हासिल करने राजनैतिक दल वोट के रुप में प्रमुख समाजों के  सम्मेलन और बैठके  कर लोभ लुभावन घोषणाओं और क्रियान्वयन, यात्रा के माध्यम से बेरोजगारी के सबसे अहम मुद्दे को दरकिनार कर रहे है उसके परिणाम, दुष्परिणाम दलों के लिये जो भी हो। मगर इतना तो तय है कि हार या जीत के बीच बेरोजगारी के मुद्दे का अपना एक अहम रोल रहने वाला है। 

ये अलग बात है कि मप्र के मुख्यमंत्री स्वसहायता समूह एवं सेल्प ग्रुपों के माध्यम रोजगार, मार्केटिंग और स्वयं प्रचार एमबेसडर बनने की बात कोलारस सभा और खबरनबीसों के बीच कह गये हो मगर बेरोजगारी समस्या का समाधान फिलहाल कोसो दूर नजर नहीं आता है। 

बहरहाल जो भी हो दल जो भी हो और जीत की महत्वकांक्षा कोई भी पाले, मगर बेरोजगारी को दरकिनार कर, अगर वह स मेलन, बैठक, यात्रा और लोभ लुभावन वादों में ही दल उलझे रहे, तो आसन्न उपचुनाव में परिणाम कुछ भी हो सकते है, जो हार-जीत की दूरी तय करने काफी होगें। 

फिलहाल तो यात्रा, सम्मेलन, बैठकों सहित घोषणा, वादे, क्रियान्वयन और प्रमुख राजनैतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। जिसके चलते रोजगार के लिये भटकते बेरोजगारों ने भी अब लामबंद होना शुरु कर दिया है। अब इस लामबंदी के परिणाम क्या होगें यह आने वाले समय में देखने वाली बात होगी। 

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