न तो संस्कृति सुरक्षित रही, न ही संस्थायें , यक्ष सवालों की जद में सत्तायें

वीरेन्द्र भुल्ले: जिस तरह का क्षरण हमारी संस्कृति और संस्थाओं में विगत 40 वर्षो में देखने सुनने में आया है उसको लेकर सत्ताओं पर कुछ यक्ष सवाल होना स्वभाविक थे। जो आज समुचे राष्ट्र ही नहीं, लोकतांत्रिक संस्थाओं के सामने है। जिसमें समय-समय पर माननीय न्यायपालिका के मुख्य लोगों के सवाल बने तो कभी वहीं सवाल हमारे लोकतांत्रिक संस्थाओं के दायरे में भी देखें सुने गये, तो कभी स्वयं ही लोकतंत्र के सारे स्तंभ स्वत: ही सामने आ गये। 

देखा जाये तो आज लोकतांत्रिक व्यवस्था में अव्यवस्था के पनपने का वह चरमोत्कर्स है जिसकी संभावना आज नहीं तो कल प्रत्याशित थी ही, क्योंकि जिस तरह से हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था का नया स्वरुप आजकल आम लोगों से दो-चार हो रहा है और हमारी असुरक्षित संस्कृति विभिन्न समाजों के अन्दर तार-तार नजर आने लगी है। उसके चलते आम जन के बीच मायूस, मजबूरी, बेबसी के चलते सवाल-जबाव भले ही न हुये हो। मगर हमेशा हमारी विधायिका, कार्यपालिका और सामाजिक ताने-बाने को लेकर सवाल बने रहे, जिन्हें बुंलद करने वाले लोग सत्ता में आते, जाते रहे। 

मगर दुर्भाग्य बस भारतीय लोकतंत्र के वह स्तंभ न तो और अधिक लोकतांत्रिक और मजबूत हो सके और न ही वह अपनी अनुभूति लोगों को पूरी प्रमाणिकता के साथ करा सके जिससे एक मजबूत और महान लोकतंत्र बनता है और संस्थायें स्वयं के आचरण पर गर्व कर स्वयं को गौरान्वित मेहसूस करती है। सत्ताओं के संरक्षण के आभाव में हमारी महान संस्कृति भी हमसे विमुख होती रही। परिणाम कि हम हमारे महान लोकतंत्र का गुब्बारा फुला कितनी ही ऊंचाई पर क्यों न उड़ाते रहे। मगर जब गुब्बारा उड़ाने वाले हाथ हमारी विधायिका, कार्यपालिका ही कमजोर हो और अपने दायित्वों से विमुख व्यवहार करने लगे तथा लोकतंत्र के स्तंभो को असफलता पूर्वक सत्ता नियंत्रित करने की कोशिश करे, तो व्यवस्था कितनी ही सुदृड़ क्यों न हो, उसमें कमजोरी का भाव स्वत: ही प्रकट होने लगता है। 

ऐसे में सर्वाधिक जबावदेही किसी भी लोकतंत्र में उन चुने हुये जनप्रतिनिधियों की होती है जिन्हें किसी भी राष्ट्र की जनता अपने अमूल्य मत से चुनकर, अपना प्रतिनिधित्व करने लोकतंत्र के मंदिरों तक भेजती है। जबावदेही उन राजनैतिक दलों की भी उतनी ही होती है जो संगठित रुप से सत्ता हासिल कर, सरकार बना लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत और समाज को संस्कारिक और सुदूड़ बनाने नीतियां बनाती है। जबावदेही उन नौकरशाहों की भी एक मजबूत लोकतंत्र में उतनी होती है जितनी कि सरकार की। क्योंकि देश के नौकरशाहों को हमारे महान लोकतंत्र में संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। जिस तरह विधायिका आम जनता के प्रति उत्तरदायी होती है उसी तरह नौकरशाही भी संविधान के प्रति उत्तरदायी होती है। उसका कर्तव्य होता है कि वह संविधान का संरक्षण करें और देश की जनता और समाजों को सरकार की नीतियों और संविधान की मंशा अनुरुप उन्हें संरक्षण प्रदान करे। 

मगर दुर्र्र्भाग्य हमारे लोकतंत्र का, कि हम इन 40 वर्षो में राष्ट्र व समाज सहित देश के लोकतंत्र को मजबूत बनाने से पहले ही खंड-खंड होने के रास्ते पर चल पड़े। बेहतर हो कि देश को चलाने वाले लोग, दल, नौकरशाह देश के लोकतंत्र और महान संविधान सहित देश की सवा अरब जनता के कल्याण एकता, मजबूती, समृद्धि, खुशहाली की दिशा में अविल ब सार्थक शुरुआत कर, अपने-अपने कर्तव्य, उत्तरदायित्वों का निर्वहन करें और देश की संस्कृति और संविधान के लिये अपनी-अपनी जबावदेही सुनिश्चित करें। क्योंकि यह वक्त समय गबाने का नहीं, बल्कि बड़ा दिल रख, देश को समृद्ध, खुशहाल बनाने का है, देश के संचालकों संविधान के संरक्षकों और संस्कृति को स र्बधित करने वालों को सोचना होगा। कि हजारों सेकड़ों वर्ष की गुलामी और अनगिनत कुर्बानियों के बाद हमें एक लोकतांत्रिक व्यवस्था और हमारा अपना महान संविधान हमें हासिल हुआ है जिसकी रक्षा करना हर व्यक्ति, परिवार, समाज, दल, संगठन, संस्था का धर्म ही नहीं कर्म भी है। कि हम उसकी रक्षा कर, उसे मजबूती प्रदान करें, तभी हम और हमारी आने वाली पीढ़ी खुशहाल, संपन्न, जीवन, निर्वहन कर पायेगीं। 
जय स्वराज   
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