नीत, नियत का अभाव और अहंकारी आत्म विश्वास, निढाल नौजवानों से निर्माण की उम्मीद

वीरेन्द्र भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा: किसी भी राष्ट्र को अपने नौनिहाल, नौजवानों से निर्माण की बड़ी उम्मीद एक स्वभाविक सोच है और यह यथार्थ भी। जिनका किसी भी परिवार, समाज, वैभवशाली राष्ट्र निर्माण और राष्ट्र जन की समृद्धि, खुशहाली में बड़ा योगदान होता है। मगर इस उम्मीद के बीच उन युवाओं, नौजवानों के पालक, संरक्षकों का मार्गदर्शन और संरक्षण सबसे अहम होता है। आज जो देखों वह नौजवानों, युवाओं में वहीं सारी स भावनायें देखता है। जिसमें उसके निहित स्वार्थ, महत्वकांक्षायें पूर्ति हो सके फिर वह व्यक्ति, परिवार, समाज, संगठन, संस्थायें हो या फिर सियासी दल और राजनेता। 

मगर युवा नौजवानों के विकास में उनका क्या क्या योगदान होना चाहिए इस सवाल का उत्तर उन लाखों करोड़ों युवा, नौजवानों को कोई नहीं देना चाहता जो गांव, गली, नगर, कस्बा, जिला, जनपद, संभाग, मण्डल, प्रदेश ही नहीं, देश को समृद्ध, खुशहाल बना सकते है। जो सुनहरे भविष्य की कल्पना कर संरक्षण संसाधनों के आभाव में अपने सपनों को तिल-तिल मरता देख इस आशा-आकांक्षा में बैठे है। कि राष्ट्र की उम्मीद पर वह कब खरा उतर उसे पूरा करने का गौरव हासिल कर राष्ट्र को वैभव और गौरवशाली बना सके। 

मगर युवाओं, नौजवानों की दहाड़ उनका पुरुषार्थ सार्थक स्पर्शी शिक्षा नीत और संसाधनों के अभाव में दम तोड़ रहा है। क्योंकि सत्ता कबाडू नीतियों के अलावा संरक्षकों के पास न तो कोई स्पष्ट नीति है, न ही नियत है और न ही कोई स्पष्ट विजन, डीपीआर। कारण सत्ता के घोड़े पर सवार राजनीति के अलावा जबावदेह लोगों को कुछ सोचने की फुरसत नहीं, वहीं रणनीतकार अपने-अपने ऐजेन्डे भुनाने सत्ता के ओहदेदारों को सिकन्दर का मुगालता दिला सियासी घोड़ों पर दौड़ायें जा रहे है। 

अब ऐसे में बंगले से निकल मंत्रालय में घंटो बैठ योजना बनाने व उन योजनाओं को अमली जामा पहनाने वालो को क्या पता कि गांव, गली के गरीब, किसान, मजदूर और नगर, महानगर के युवा, नौजवानों का व्यवहारिक धरातल पर विजन क्या? उसकी अपनी डी.पी.आर क्या है। उन्हें कैसे संरक्षण, संसाधनों की आवश्यकता है। कौन सी शिक्षा उनका और इस राष्ट्र का भला कर सकती है आखिर उसके जीवन और राष्ट्र के प्रति उसकी क्या आस्थायें व त्याग है। 

देखा जाये तो टिड्डी दल नीत का व्यवहार न तो जीव जगत न ही, मानव जगत के लिये उत्तम है। जिस तरह से उपेक्षित, ईर्षा बस साम, नाम, दण्ड, भेद की नीत के तहत आत्मसात करने के बजाये उन्हें समूल नष्ट करने की कुचेष्टा क्षेत्र, समाज, धर्म, जाति के नाम पर आजकल खुलेयाम चल रही है। इससे न तो इस महान राष्ट्र का भला होने वाला है, न ही राष्ट्र कभी समृद्ध, खुशहाल, शक्तिशाली बनने वाला है। और इन परिस्थितियों में बैवस मजबूर गैर संरक्षित संसाधन विहीन युवा नौजवान अपने सपने पूरे कर, राष्ट्र में चाहते हुये भी कोई बड़ा योगदान देने वाला है। 

जब परमपिता परमात्मा ने ही सृष्टि निर्माण के वक्त ही कोई भेदभाव नहीं रखा व प्रकृति अनुसार हर स्थिति में अपने जीवन निर्वहन के साथ कर्तव्य निर्वहन का दायित्व हर जीव को सौंपा है तो कोई एक विचार, व्यक्ति, समाज सर्वश्रेष्ठ सर्वगुण संपन्न कैसे हो सकता है। जो सनातन संस्कृति का सत्य और भाग भी है। 

बेहतर हो कि हम समस्त राष्ट्र वासी सहिष्णुता के साथ एक दूसरे की विशिष्टता, गुणवत्ता, प्रकृति अनुसार सृष्टि के सृजन को आगे ले जाये। जिसमें सब अपनी योग्यता अनुसार समाज और राष्ट्र को समृद्ध, खुशहाल बना, खुशहाली के जीवन का मार्ग प्रस्त करते हुये वैभव, गौरवशाली, खुशहाली राष्ट्र निर्माण कर, इस महान भू-भाग के वैभव को लौटा सके। जो कई महान विभूतियों सहित महान व्यक्तित्वों की कर्म स्थली रहा है। जिस पर आज हर भारत वासी को गर्व है। आज सभी का कर्तव्य है कि हम संरक्षण के साथ संसाधनों की व्यवस्था भी युवा, नौजवानों की आशा-आकांक्षा अनुरुप पूर्ण निष्ठा ईमानदारी के साथ करे और अपने-अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर हम महान भारतवासी, राष्ट्रवादी होने का परिचय दें और युवाओं की आशा-आकांक्षाओं से जुड़े सपनों को पूरा कर, राष्ट्र की समृद्धि, खुशहाली का सपना पूर्ण करे। तभी हम एक अच्छे और सच्चे राष्ट्रवादी, भारतवासी कहला पायेगें। जय स्वराज 

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