जब तक समाज, सिस्टम, सत्ता में न्याय, सम्मान, स्वाभिमान का अभाव रहेगा, तब तक सुधार असंभव

विलेज टाइम्स समाचार सेवा | स्वयंमेव हम कितनी ही सफलता, असफलता के इतिहास क्यों न गढ़ ले, मगर सुधार के अभाव में परिणाम हमेशा शून्य ही रहेगें। गुलामी के दौर में हमारी स पदा की कितनी ही लूट अत्याचार क्यों न हुये हो, मगर तब भी हम समृद्ध और सफल, सक्षम थे। क्योंकि तब हमारे बीच न्याय, स मान, स्वाभिमान का भाव जिन्दा था। मगर आजादी की चकाचौंध में हमारे समाज, सिस्टम सत्ता के अन्दर निहित स्वार्थ, प्रबल महत्वकांक्षाओं के चलते न्याय, स मान, स्वाभिमान का जो सत्यानाश हुआ उसने हमारी समृद्धि, खुशहाली को तो दफन कर ही दिया, साथ ही अनौपचारिक तौर पर ऐसी मूल्य विहीन व्यवस्था को समृद्ध कर दिया। जहां अहम, अहंकार, स्वार्थ, महत्वकांक्षा और चालाक चापलूस, मक्कारों की अघोषित गैंग, देश की प्रतिभा, विधा, विद्ववान, प्राकृतिक स पदाओं संस्कृति, संस्कारों का पतन कर, नैतिक पतन के माध्यम से नई-नई संस्कृति, व्यवस्थाओं को जन्म देने में लगी है। 

कहते है कि जब भी योग्यता के अभाव में प्रबल महत्वकांक्षायें सफल होती है वहां स्वार्थी, चालक, चापलूस, चाटूकारों की पूरी मण्डली मौजूद होती है और समाज, सिस्टम, सत्तायें असहाय, अक्षम, असफल साबित हो, पतन का रास्ता सुनिश्चित करती है। आजकल हमारे समाज, धर्म, राजनीति, सत्ता, सिस्टम में यहीं संस्कृति जड़े जमाती जा रही है। जिसका परिणाम कि सक्षम, विधा, विद्ववान तो अपना जीवन जी ही रहे है। मगर समाज, सत्ताओं के संरक्षण के अभाव में वह अपने वह कर्तव्य, जबावदेहियों का निर्वहन करने में अक्षम, असफल साबित हो रहे, जो उनका दायित्व है। 

आज समाज और सत्ता में सत्य के लिये नई संस्कृति के चलते स्थान कम हो रहा है। उसके पीछे योग्यता के अभाव में प्रबल महत्वकांक्षाओं की सफलता ही है। जिसमें समाज, सत्ता ही नहीं, नई संस्कृति को अस्तित्व में ला नव संस्कारों को जन्म देना शुरु कर दिया। जो किसी भी स य समाज और न्यायप्रिय सत्ता के लिये घातक है। योग्यता के आभाव में सफल प्रबल महत्वकांक्षाओं से प्राप्त न्याय, स मान, संरक्षण कभी जन या राष्ट्र कल्याणकारी कार्य नहीं होता। बल्कि इससे निर्मित सिस्टम, व्यवस्था में असफल आयोग्य व्यक्ति अपनी मिथक महत्वकांक्षा पूर्ति हेतु मक्कार, चालक, चापलूस, चाटूकारों के समूह को संरक्षित स र्बधित करता है। जिनसे समाज व राष्ट्र का कल्याण अस भव होता है या फिर ऐसी स्थिति में वह महत्वकांक्षियों का ऐसा समूह संरक्षित होता है जो अपनी सामूहिक महत्वकांक्षा पूर्ति हेतु एक अयोग्य व्यक्ति को सफल व्यक्ति का चोला पहना अपनी महत्वकांक्षाओं की पूर्ति करता है।  

मगर दोनों ही स्थिति में विनाश उन अबोध युवा, बुजुर्ग, विधा, विद्ववान, मेहनतकस, संघर्षरत आशा-आकाक्षांओं का होता है। जिनके कल्याण, संरक्षण, संवर्धन के लिये समाज, संस्थायें, सत्ता, सिस्टम अस्तित्व में आते है। और आजादी से पूर्व या आजादी के बाद कई पीडिय़ां शायद बगैर कोई शिकायत किये समाज, राष्ट्र, सत्ताओं के लिये पीडि़त, वंचित, संघर्षरत रह मरती, कटती, शहीद होती रही कि कभी तो उनकी आने वाली पीढ़ी उनके नौनिहालों को वह समृद्धि, खुशहाली नसीब होगी जिसके लिये वह अपनी कुर्बानी दे, अपने बेहतर वर्तमान को स्वाहा कर रहे है। 

कभी तो एक ऐसा समाज, सत्तायें, सिस्टम होगें जब बगैर भेदभाव पूर्ण न्याय सम्मान स्वाभिमान के बीच स्वच्छन्द जीवन निर्वहन के लिये पृष्ठ भूमि तैयार कर, वह उनके नौनिहालों को स्वच्छन्द सहज, विकास, वैभव निर्माण का मौका देगें। मगर र्दुभाग्य कि हम ऐसा कुछ नहीं कर सके और योग्यता के अभाव में प्रबल महत्वकांक्षाओं के पीछे चलते-चलते आज यहां तक पहुंच गये। कि न तो धर्म, राजनीति, समाज, व्यापार, प्रतिभाओं के साथ न्याय कर सके। न ही कोई ऐसा सिस्टम बना सके जहां हमारी संस्कृति, संस्कार, शिक्षा, प्रतिभा, विधा, विद्ववान सरंक्षित स मानित हो, जिस पर वह गर्व कर, स्वयं को गौराान्वित मेहसूस कर सके। 
जय स्वराज
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