दल और दलालों की जकड़ में जाता जनतंत्र

वीरेन्द्र भुल्ले/विलेज टाइम्स समाचार सेवा। 
यूं तो जनतंत्र, लोकतंत्र की परिकल्पना संविधान निर्माताओं ने स्वस्थ मजबूत लोकतंत्र के माध्यम से सभी को सत्ता में आम नागरिक की सहज सहभागिता और सामूहिक जि मेदारी की गरज से राष्ट्र व जनकल्याण की खातिर की थी। जिससे सत्ता में हर आमो खास से लेकर गांव, गली, गरीब सभी की भागीदारी सुनिश्चित हो सके। अगर आज के परिवेष में यो कहे कि दलों के रुप में अघोषित सत्ता माफियाराज ने विगत 30 वर्षो में उस जनतंत्र, लोकतंत्र की कल्पना को ही तार-तार कर चारों खाने चित कर एक ऐसा अघोषित माफियाराज सत्ता व संगठनों में खड़ा कर लिया। जिनमें अब आम गांव, गली, गरीब, पीडि़त, वंचित, किसान, मजदूरों को सत्ता की पहुंच से दूर कर बाहर ही कर दिया तो कोई अति संयोक्ति न होगी। जिन्हें आज मौका होना चाहिए था लोकतंत्र में सत्ता की भागादारी में उनका अब दुर्भाग्य से सत्ता में कोई बर्चस्व नहीं बचा और 70 वर्ष के आजादी के ल बे सफर में जनतंत्र का सपना आज दल और दलालों की जकड़ में पहुंच गया। 

               अगर यो कहे कि अब आम गरीब मतदाता सिर्फ और सिर्फ वोट देने की मशीन अब इस लोकतंत्र में अघोषित तौर पर बनकर रह गया तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। क्योंकि जिस ठसक से चुनावों के दौरान चुनाव जीतने राजनैतिक दल ल बे चौड़े लोक लुभावन वादे व घोषणायें करते है और छोटी-मोटी आशा-आकांक्षा पूर्ति कर अपना कत्र्तव्य जबावदेही निभाने में अपना सौभाग्य समझते है उससे बैवस मजबूर जनता सन्तुष्ट तो हो जाती है मगर उन हको को कुछ क्षण के लिये भूल जाती है जो उसके स्वच्छंद जीवन निर्वहन के अंग व आने वाली पीढ़ी के लिये अहम होते है। गरीब जनता के भोलेपन को अपनी चालाकियों से भुनाने वाले दल और सत्ता के दलाल सत्ता के मद में यह भी भूल जाते है कि जिस जनतंत्र को वह अपने निहित स्वार्थ और महत्वकांक्षा पूर्ति के लिये नया स्वरुप देने पर तुले है। कभी उसी जनतंत्र में उन्हें भी रहना है, जिसमें आज बैवस मजबूर लोग अपना जीवन निर्वहन करने पर मजबूर है, उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि आज नहीं तो कल, उन्हीं आभावों के बीच जीवन जीने वाले लोगों के साथ रहना, जीना, मरना है जो आज बैवस, मजबूर नजर आते है, तो फिर ऐसे लोकतंत्र की नई नींव र ा वीभत्स जनतंत्र की जकड़ स्वस्थ लोकतंत्र में क्यों? 

              क्यों उस जनतंत्र को जिन्दा र ाने की कोशिश चुनावों में नहीं की जाती जिसके आधार पर हमारे पवित्र  सदनों में बहुमत के आधार पर फैसले और निर्णय होते है तथा चुने हुये जनप्रतिनिधियों द्वारा राष्ट्र जनकल्याण के लिये वोट के आधार पर सरकारे चुनी जाती है। वहां भी मतदान निष्पक्ष और चेतना के आधार पर चुने हुये जनप्रतिनिधि करते है। मगर वहीं मतदान, चुनावी मैदान में अपनी प्रतिष्ठा क्यों कायम नहीं रख पाते। यहीं यक्ष सवाल आज समुचे लोकतंत्र के सामने है। 

            जिस तरह से महंगे चुनावों की स्वीकार्यता वैधानिक स्वरुप में आज है, वहीं स्वस्थ लोकतंत्र के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा और कंटक बन चुकी है और आम गांव, गली, गरीब की सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित करने की दिशा में बाधा, बेहतर हो कि आम मतदाता और लोकतंत्र में आस्था रखने वाले इस अहम मुद्दे पर विचार करे, बरना धन, बाहुबल और अहम अहंकारी सत्ताओं के हाथो खेलता हमारा महान लोकतंत्र कहीं, दल दलालो का, जनतंत्र के नाम वह घातक हथियार न बन जाये। जिसके बज्र प्रहार से जनतंत्र की आत्मा तो चकनाचूर हो ही रही है। जो व्यक्ति, परिवार, समाज ही नहीं, गांव, गली, कस्बा, नगर, प्रदेश, देश की सरकारों को भी प्रभावित कर, अपने आगोस में लेने तत्पर नजर आती है। अगर ऐसा ही कुछ जनतंत्र और लोकतंत्र के नाम चलता रहा, तो अघोषित रुप से नवनिर्मित लोकतंत्र हमारे महान जनतंत्र के लिये कल भस्मासुर साबित न हो इसकी गारन्टी नहीं दी जा सकती। 

            बेहतर हो कि सत्ता दल, समाज इस ग भीर समस्या पर संवेदनशील विचार करें, बरना ऐसा न हो कि समय अपनी दुर्त गति बढ़ जाये और राम राज की कल्पना रखने वाली हम गांव, गली, गरीब, पीडि़त, वंचितों की जमात सिर्फ इसी मुगालते में रह जाये, कि कल हमारा बेहतर होगा। 
जय स्वराज  
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