बौद्धिक संपदा व सटीक सवाल, जवाब के आभाव का दंश झेलता गुजरात, ऐन वक्त पर गलत ट्रेक पर कॉग्रेस

व्ही.एस. भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा: ये अलग बात है कि राहुल के इकलौते नामांकन के साथ उनका 130 वर्ष पुरानी महान कॉग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना तय हो चुका है। मगर गुजरात के अहम चुनाव के वक्त कॉग्रेस की रणनीति से स्पष्ट हो रहा है कि वह पूर्व की गलतियों से उनके रणनीतकार कोई सबक लेना नहीं चाहते। और जैसा कि कॉग्रेस में विगत 25 वर्षेा से चल रहा है वैसा ही आचार-व्यवहार प्रतिद्विन्दी दलो को लेकर आज भी है।

ये अलग बात है कि तब की समय परिस्थितियां अलग थी मगर आज परिस्थितियां कुछ और है। जब कॉग्रेस सत्ता में थी तब तो सवालों के जबाव देना कॉग्रेस की बाद्वयता थी। मगर विगत 3 वर्षो में सत्ताधारी दल द्वारा जबाव देने के बजाये नये सिरे से निरर्थक सवालो के जबावो का जो सिलसिला कॉग्रेस में शुरु हुआ है वह उ.प्र., उत्तराखण्ड, गोवा, मणीपुर गवाने के बावजूद भी गुजरात में भी नहीं थम रहा है। 

कारण स्पष्ट है कि अधूरी रणनीत, बौद्धिक संपदा और सार्वजनिक, आचार-व्यवहार, व्यान में सहज आक्रमतों का अभाव जिसका लाभ उठा प्रतिद्विन्दी दल आज आधे से अधिक देशों में राज्य सरकारें और केन्द्र में पूर्ण बहुमत की सरकार बना अपना विजय रथ जारी रखे हुये है। 

मगर कॉग्रेस के थिंक टेक, रणनीतकार, प्रवक्ता आज भी प्रतिद्विन्दी दलो के सवालों का अनुकूल जबाव देने में लगे रहते है। आज जब चुनाव सर पर है तब भी कॉग्रेस एक मजबूत विपक्ष की तरह सवाल, जबाव सत्ताधारी दल से करने के बजाये सत्ताधारी दल द्वारा उछाले गये चुनावी रणनीति के तहत वेसर पैर के मुद्दों पर समय खराब कर रही है। जबकि कॉग्रेस को सजग विपक्ष के नाते सटीक सवाल सत्ताधारी दल से करना चाहिए जिससे एक मजबूत लोकतंत्र और जनता के अहम मुद्दें, उसका अमूल्य वोट इस चुनावों आरोप-प्रत्यारोप में न खो जाये। कॉग्रेस के लिये गुजरात सरकार की 22 वर्ष की परफोरमेन्स सबसे अहम मुद्दा होना चाहिए क्योंकि चुनाव गुजरात में है, न कि देश का, यह समझने वाली बात है।  

देखा जाये तो 22 वर्ष में 3 पीढिय़ां सफर कर जाती है, उस पर पक्ष-विपक्ष में सार्थक बहस हो पीडि़त, वंचित, गरीब, मजदूर, किसानों की दशा पर डिवेट हो गांव, गली सहित प्रतिभा संरक्षण, संवर्धन के क्षेत्र में गुजरात में क्या कार्य हुये विपक्ष व पक्ष अपने कर्तव्य, उत्तरदायित्व निर्वहन में कितने सफल, सक्षम साबित हुये। भावी क्या योजनायें है गुजरात के गांव, गरीब, गली, पीडि़त, वंचित लोगों के लिये। 

मगर र्दुभाग्य कि इन सबसे इतर चुनावों के दौरान जो अहम मुद्दों से भटकाने की कोशिश हो रही है वह न तो गुजरात, न ही लोकतंत्र के हित में है। क्योंकि चुनाव राहुल, मोदी के बीच नहीं, चुनाव गुजरात में भाजपा, कॉग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों के प्रत्याशियों के बीच है जिनकी हार-जीत पर सरकार का अस्तित्व निर्भर करेगा। 

बेहतर हो सभी दल जनता के सामने अहम मुद्दे लाये और उसे बताये कि उनकी बेहतरी के लिये उनका या उनकी पार्टी का गुजरात में क्या योगदान है और वह कौन-सा कैसा भविष्य गुजरात के लिये गढऩा चाहते है। तभी हम एक सफल, सक्षम लोकतंत्र बन पायेगें। 
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