न उम्मीद के बीच, उम्मीद किरण कॉग्रेस: कड़े परिश्रम की दरकार

वीरेन्द्र शर्मा, विलेज टाइम्स समाचार सेवा:  ये अलग बात है कि डूबती कॉग्रेस को दो हजार के दशक में उभारने का कार्य निवृतमान कॉग्रेस अध्यक्...

वीरेन्द्र शर्मा, विलेज टाइम्स समाचार सेवा: ये अलग बात है कि डूबती कॉग्रेस को दो हजार के दशक में उभारने का कार्य निवृतमान कॉग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपने अथक परिश्रम से किया हो और वह केन्द्र में दो मर्तवा कॉग्रेस नेतृत्व में सरकार बनवाने में भी सफल रही हो। मगर वह 19 वर्ष तक उस सियासत पर पकड़ बनाने में सफल नहीं हो सकी, जो राजनीति के अहम हुनर के रुप में एक एक मजे हुये राजनेता में होना चाहिए जिसका राजनीति के धुरंधरों ने भरपूर फायदा उठाया।
  
मगर परिवारिक त्रासदियों के बीच देश की आवो हवा और जटिल सियासी दांव पेचो से अनभिज्ञ सोनिया के सामने उस समय दो ही सवाल रहे। एक कॉग्रेस जैसी प्रतिष्ठित पार्टी जिसे पण्डित नेहरु, शास्त्री, इन्दिरा, राजीव ने अपने खून पसीने और कुर्बानियों से आजाद भारत में सीचा, उसकी प्रतिष्ठा कायम रखना। दूसरी गांधी परिवार की मुखिया और देश की बहु होने के नाते अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूरी निष्ठा ईमानदारी के साथ करना, जिन्हें उन्होंने बखूबी निभाया भी। मगर वह यूपीए सरकार और संगठन में वह धमक कायम नहीं रख सकी। जो किसी भी सरकार और संगठन को बनाये रखने अहम होता है। कारण उनकी नैक नियत और विश्वास में गहरी आस्था। मगर इसके उलट सियासी उस्तादों ने अपनी-अपनी महत्वकांक्षा पूर्ति की खातिर न तो यूपीए सरकार, न ही संगठन को कहीं का छोड़ा। जिसके लिये कॉग्रेस न ही सोनिया गांधी कहीं से कहीं तक जिम्मेदार ठहरायी जा सकती।  

बहरहाल अब नये कॉग्रेस अध्यक्ष के रुप में कमान अब राहुल के हाथ में है, जिन्होंने गुजरात में कड़ा परिश्रम कर एक उम्मीद की किरण, न उम्मीद के बीच जगाई है। मगर राहुल की ताजपोशी के साथ जो ऊर्जा का संचार या बदलाव कॉग्रेस में होना था उसकी सुगबुगाहट दूर-दूर तक नजर नहीं आती। अगर कॉग्रेस राहुल के नेतृत्व में जुड़ाव के रास्ते दरवाजे अभी भी इसी तरह बंद रख, उसी दौहराव के लिये तैयार है जो प्रदर्शन संगठनात्मक क्षमता के रुप में अभी तक रहा है तो वह कॉग्रेस के लिये दुर्भाग्य पूर्ण ही माना जायेगा।

जैसा कि वह 1998 से ही नहीं, 2014 की कड़ी हार के बाद से करती चली आ रही है। अगर राहुल वाक्य में ही कॉग्रेस का वह वैभव गौरव स्थापित करना चाहते है तो उन्हें निष्क्रीय पड़े कॉग्रेस के अनुवांशिक संगठनों का सीधा नेतृत्व कर उनमें जान फूंकना पड़ेगी। और कॉग्रेस में आस्था रखने वालो से सीधा संपर्क संवाद बगैर उन ठेकेदारों के जो स्वयं को अपने-अपने क्षेत्रों में जनाधार वाला नेता समझते है। और जिनका न तो क्षेत्रीय नेता और न ही कॉग्रेस संगठन को पुर्नजीवित करने में कोई योगदान है। और जो अभी तक देश भर में कांग्रेस के वफादारों के रुप में अपना अक्स स्थापित करते आये है। उनसे भी 20-20 वर्षो का हिसाब किताब राहुल को लेना होगा कि उन्होंने विगत 20 वर्षो में कितने वैचारिक नेता, कार्यकर्ता खड़े किये, कितने प्रशिक्षण और जनसेवा के कार्यक्रम चलाये। 

बहरहाल राहुल को करने को बहुत कुछ है, मगर उन्हें दिल्ली के काकस के बाहर भी स्वयं को उन लोगों के बीच ले जाना होगा जो विगत 20-25 वर्षो से उपेक्षित रह, सिर्फ इस इन्तजार में वैचारिक आधार थामे हुये है कि कभी तो उन्हें सुना समझा जायेगा। उन्हें समुचे देश में एक ऐसा कारवां खड़ा करना होगा जिसकी कॉग्रेस में गहरी आस्था हो, निश्चित ही राहुल को समुचे देश में स्व. राजीव गांधी की तरह एक ऐसा अभियान चलाना पड़ेगा जिससे हर आम और खास जुड़ सके। वरना उम्मीद न उम्मीद का क्या वह तो आती जाती रहेगी। अगर जल्द ही नये कॉग्रेस अध्यक्ष का एहसास आशा-आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतरा तो 2019 कोई ज्यादा दूर नहीं, न ही म.प्र., छत्तीसगढ़, राजस्थान, कर्नाटक के आसन्न चुनाव जिसमें कॉग्रेस को अपना अस्तित्व ही नहीं, वजूद भी दिखाना होगा जिससे देश में लोकतंत्र को जिन्दा रख, देश के गांव, गली, गरीब, किसान की आवाज को बुलंद कर, उन्हें उनके हक दिला सत्ता में बराबर की भागीदारी दिला उनके साथ न्याय किया जा सके। 

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तीरंदाज,311,व्ही.एस.भुल्ले,505,
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न उम्मीद के बीच, उम्मीद किरण कॉग्रेस: कड़े परिश्रम की दरकार
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