सत्ता भूख के आगे दम तोड़ता सिस्टम, सियासत का शिकार, विकास कल्याण, सेवा से जुड़ी संस्थायें

वीरेन्द्र भुल्ले/विलेज टाइम्स समाचार सेवा
नैसर्गिक विकास को छोड़ जिस तरह से सत्ता हासिल करने हमारे लोकतंत्र में सियासी दौर चल पड़ा है उससे इस दौर को शुरु करने वाले दलो को कुछ वर्षो के लिये सत्ता तो मिली और सत्ताधारी दलों व सियासी दलों ने मय अन्डी बच्चों से उसे भोगा भी, तो कुछ आज भी भोग रहे है। मगर आज तक न तो आम जन सहित उन दलों का कोई ऐसा बड़ा भला हो सका, जिसे हमारे महान इतिहास में कोई स्थान मिल सके या फिर लोग ऐसे दलों की सत्ताओं का उसे स्वर्ण काल  कह उसे याद रख सके। 

           कुछ इस तरह का दौर हमारे महान लोकतंत्र में चला कि कुछ दल सत्ता भोग चुके तो कुछ सत्ता सुख भोग सतत सत्ता में बने रहना चाहते है। ऐसे दलों व लोगों को शायद यह मुगालता है। कि वह 21वी सदी में भी देश के भोले भाले, मायूस, मजबूर, बेहाल लोगों की लोकतांत्रिक बाध्यता का लाभ सत्ता, धन, बाहुबल, सं या बल और भ्रामक प्रचार नैतिक, अनैतिक दावों से उठा, सतत सत्ता में बने रहेगेें। अपने व अपनी आने वाली पीढ़ी के सपने साकार कर उनके लिये स्वर्ग तैयार करके जायेगें। मगर ऐसे लोग स्व निर्मित उस सत्ता के आगे उस सत्ता को भूल जाते जिसने मानव को बैवस पेड़, पौधे जो स्वयं की रक्षा करने में अक्षम है या वह पशु-पक्षी, जानवर जो अपनी जान बचाने भाग सकते है। या जो अक्षम है को संरक्षण सुरक्षा के साथ प्रकृति, मानव कल्याण का कार्य सौंपा है। उससे विमुख हो जो लोग जनकल्याण सर्वकल्याण की जगह सेवा के नाम जिस तरह के कृत्यों को वह अपना कत्र्तव्य समझ रहे है उससे स्वर्ग नहीं नरकीय माहौल ही तैयार हुआ है और हो रहा है। संस्थायें अपना मूल कत्र्तव्य दायित्व भूलने के साथ अपना नैसर्गिक स्वभाव भी बदलने पर मजबूर है। 

           अगर ऐसे में संस्थायें अपना नैसर्गिक स्वभाव बदल रही है और वह विकास कल्याण, सेवा की जगह सत्ता भूख मिटाने सियासी केन्द्रों में अघोषित तौर पर तब्दील हो रही है। तो यह भारतीय लोकतंत्र जनतंत्र के लिये बड़ी त्रासदी और एक महान राष्ट्र के लिये शर्मनाक होगा। 

           आखिर क्यों ऐसे संगठन दल इस महान देश में ऐसा बीज बौना चाहते है जिसमें खादन, फसल, शुद्ध पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ तो दूर की कोणी खरपतबार भी न उग सके। आज सत्ता के लिये जिस तरह से दलों की महत्वकांक्षा पूर्ति हेतु विकास, कल्याण, सेवा से जुड़े संस्थान अपने मूल संवैधानिक दायित्व छोड़ सरकारों के इशारों पर कार्य कर रहे है वह किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिये शर्मनाक ही नहीं, खतरनाक है। जिसके परिणाम उन पीडि़त, वंचित, बैवस लोगों को तो भोगना ही पड़ेगें जैसा कि वह जनसेवा, राष्ट्र सेवा के नाम सत्ताधारियों को वोट देकर, अब तक भोगते आ रहे है। मगर वह शिक्षित, समझदार लोग जो सत्ता के लिये या सत्ता के इशारे पर सब कुछ दांव पर लगाने में आज संकोच नहीं कर रहे वह भी उस बैवसी मजबूर कर देने वाली संस्कृति के प्रभाव से अछूते नहीं रह सकते। क्योंकि उन्हें भी आज नहीं तो कल इसी समाज व राष्ट्र में रहना है। जो सत्ता में अन्धे हो सिस्टम को सैया पर लेटा नई संस्कृति समाज का निर्माण करने में जुटे है। और जो अपने संवैधानिक दायित्व कत्र्तव्य भूल ऐसे सत्ताधारी दलों का साथ दे रहे है। 

            बेहतर हो कि हम अपने महान लोकतंत्र, अपनी महान संस्कृति और उस महान भू-भाग को पहचाने जहां बड़ी-बड़ी देश की विभूतियों व्यक्तित्वों ने अपनी त्याग तपस्या अनगिनत कुर्बानियां दे, जिसे अक्षुण रख समुचे विश्व में स मान दिलाया है। कहीं स्वार्थ में उलझे हम कोई ऐसी संस्कृति और समाज अपनी आने वाली पीढ़ी को विरासत में न छोड़े जिसके लिये हमें ही नहीं, उन्हें भी शर्मिन्दा हो, पछताना पड़े। 
जय स्वराज 
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