सिसकता लोकतंत्र और संवैधानिक दायित्वों पर लगा प्रश्र चिन्ह, सेवा पर भारी सियासत

वीरेन्द्र भुल्ले/विलेज टाइम्स समाचार सेवा। 
जहां राजतंत्र में सत्ता हासिल करने बड़े पैमाने पर मार-काट या फिर संधि समझौते हुआ करते है और युद्ध की स्थिति में जीत हासिल करने वाले राजा-महाराजा, सम्राट, सुल्तान लूटी गयी या हासिल स पदा व माल का बंटबारा कर लिया करते थे। मगर इसके उलट स्वस्थ लोकतंत्र में जिस तरह से सत्ता का दुरुपयोग सत्ता हासिल करने और सत्ता हासिल करने में मददगार लोग पुरुस्कृत हो, सत्ता लाभ उठा रहे है इस तरह के घटनाक्रमों में आज लोकतांत्रिक व्यवस्था पर ही प्रश्र चिन्ह लगा यह यक्ष सवाल लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने रख छोड़ा है, कि क्या यहीं लोकतंत्र है?

           देखा जाये तो लोकतंत्र में लोकतंत्र के तीनों अंगो को संवैधानिक संरक्षण और कानूनी शक्तियां प्राप्त है। जनकल्याणकारी, राष्ट्र कल्याणकारी लोकतंत्र को संचालित करने जिसमें विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका अहम है। तथाकथित लोकतंत्र के चौथे स्त भ को संवैधानिक दर्जा या शक्तियां इसीलिये प्राप्त नहीं शायद संवैधानिक निर्माता यह जानते थे कि जब भी देश में सत्ता उन्मु ा लोकतंत्र आयेगा तब चौथे स्त भ का कोई वैधानिक अस्तित्व उसकी स्वार्थ पूर्ण कार्यप्रणाली के चलते स्वयं ही लोकतंत्र में बजाये जबावदेह भूमिका निभाने के स्वत: ही उत्तरदायित्व विहीन हो जायेगा। 

         सवाल यहां यह नहीं, कि कौन कैसे अपने कत्र्तव्यों का निर्वहन कर रहा है। सवाल यह है कि कौन संविधान की आत्मा अनुरुप अपने उत्तरदायित्व और जबावदेहियों का का निर्वहन कर रहा है। शायद यह भारतीय लोकतंत्र ही नहीं, देश के करोड़ों करोड़ भोले भाले बैवस मजबूर मतदाताओं का दुर्भाग्य ही है। कि पढ़े-लिखे व निर्धारित प्रक्रिया के तहत देश व संविधान की शपथ लेकर प्रशासनिक सेवा में आने वाले लोग भी उन चुनी हुई सरकारों विधायिका के इतने  दबाव में काम करने मजबूर है। जिसकी इजाजत न तो उन्हें मानव होने के नाते उनकी नैतिकता देती है, न ही संविधान। मगर फिर भी यदा-कदा सत्ताधारी दलों के मंसूबे पूर्ण करने अपनी संवैधानिक साख को दांव लगा अपने संवैधानिक दायित्व भूलने वाले आज लोकतंत्र के लिये सबसे बड़ा खतरा बनते जा रहे है। वह यह भी भूल रहे है कि अघोषित तौर पर लोकतंत्र के अन्दर नव लोकतांत्रिक संस्कृति को सत्ताधारी दलों के इसारे पर खाद पानी दें, सींचने का कार्य कर रहे है। कल उन्हें भी उसी व्यवस्था में अपना जीवन निर्वहन करना है। जिस व्यवस्था में देश के मायूस, बैवस, मजबूर मतदाता अपना कंटको से भरा संघर्ष पूर्ण जीवन जीने पर मजबूर है। 

            हालिया उदाहरण म.प्र. के कोलारस विधानसभा उपचुनाव में ही नहीं, देश में जहां-जहां इस तरह की गतिविधियां संचालित है वह विचारण योग्य है। यह देश के प्रबुद्धगण उन नौकरशाहों की भी जबावदेही ाी है जिन्हें भारत के महान संविधान में संरक्षण प्राप्त है। कि कहीं ऐसा न हो, कि जन राष्ट्र कल्याण के नाम हम एक ऐसी व्यवस्था को जन्म दे डाले जहां स्वच्छंद हवा में सांस लेना भी मुश्किल हो जाये।  
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