शाप से कब मुक्त होगा मध्यप्रदेश, शिव की सेवा से, कैसे लड़ेगी कॉग्रेस

वीरेन्द्र भुल्ले/विलेज टाइम्स समाचार सेवा। अपने सिर्फ एक वादे पर 12 वर्ष में सौ फीसद सफल रहे, जो उन्होंने मु यमंत्री बनने के साथ ही किया था कि वह म.प्र. की सेवा में, दिन रात एक कर देगें और अन्य नेताओं की तरह वह कभी मोटे नहीं होगेंं। सो उनका बॉडी फिगर जो 12 वर्ष पूर्व था वह आज भी मौजूद है। उन्होंने अपने शरीर पर मोटापा हावी नहीं होने दिया। ये अलग बात है कि उन्होंने दूसरा अहम वादा भी पूरी सिद्धत से तमाम बाधाओं के बावजूद भय, ाूख, भ्रष्टाचार मुक्त प्रदेश व युवाओं को स मानजनक रोजगार के लिये म.प्र. की जनता से किया था और कहा था कि वह भय, भूख, भ्रष्टाचार मुक्त म.प्र. के लिये भ्रष्टाचार खात्में की शुरुआत ऊपर अर्थात गंगोत्री से करेगें। 

            इन 12 वर्षो में नि:संदेह उन्होंने भय मुक्त प्रदेश बनाने जहां डकैत मुक्त म.प्र. बनाने में सफलता हासिल की तो, दूसरी ओर भू ा से लडऩे 1 रुपये किलो अनाज, 1 रुपये किलोनमक की व्यवस्था, म.प्र. की लगभग 5 करोड़ से अधिक आबादी के लिये कर, भूख से लडऩे का प्रमाण दिया है। तो वहीं म.प्र. के इतिहास में पहली मर्तवा शासन के प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारियों को सेवा से बर्खास्त कर ही नहीं, उन्हें जेल तक पहुंचा व आये दिन लोकायुक्त के छापों में पकड़े जा रहे अधिकारी, कर्मचारियों पर जो कार्यवाही भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था के लिये नजीर बनी है वह समुचे म.प्र. के सामने है। 

           मगर म.प्र. के बेरोजगार हाथों को स मानजनक रोजगार मुहैया कराने के सवाल पर वह मंच से या विज्ञापनो के माध्यम से जो भी कहे। मगर रोजगार को लेकर शिव सरकार, स्पष्ट सार्थक विजन, डिटेल, डीपीआर के अभाव में सवालों के घेरे में आज भी है और रन्नौद में सवाल के दौरान हुआ भी वहीं कि वह धन्यवाद के अलावा, म.प्र. के युवाओं को स मानजनक रोजगार मुहैया कराने के वादे का सार्थक जबाव नहीं दे सके। जिसकी आशा-आकांक्षा म.प्र. के 7 करोड़ से अधिक लोगों को शिवराज से थी। 

            कारण साफ है कि सार्वजनिक स्वभाव में सरल मगर सियासी अन्दाज में उतने ही स त शिवराज दलीय निष्ठा और लोकतांत्रिक आस्था के चलते सतत सत्ता में बने रहने वाले मु यमंत्री तो बन गये। मगर 18-18 घन्टे की कड़ी मेहनत एवं 12 वर्ष तक जनसेवा के कार्य करने वाले शिवराज न तो स्थापित जनसेवक बन सके, न ही प्रभावी शासक। अब एक नेकदिल नेता के साथ सियासत या सत्ता में, इसे सियासी अन्याय कहा जाये या फिर उनके सार्वजनिक राजनैतिक जीवन का प्रार्दुभाव, जबकि उन्होंने कई मर्तवा अहम मौकों पर अपने मंत्री मण्डल के अहम सहयोगियों का नैतिकता बस मंत्री मंडल से बाहर का रास्ता दि ााने में कभी कोई कोताही नहीं बर्ती। बल्कि सरकार की मंशा को नैतिक जामा पहनाने का अपने चातुर्य रणकौशल से पूरा करने का भरसक प्रयास किया और वह कई जनहित की योजनाओं के माध्यम से अपनी सरकार के राजनैतिक मंसूबे पूरे करने में भी सफल रहे।  

           अगर उनके 12 वर्ष की सेवा या शासन की समीक्षा की जाये, तो आज भी उनकी सरकार पर कई यक्ष सवाल आज भी अनुत्तरित है। और आक्रोशित विपक्ष सरकार को उखाड़ फैकने का दम भर रहा है वह भी तब की स्थिति में जबकि शिवराज के समर्थन में संगठन के लगभग 50 अनुवांशिक संगठन स पन्न व समर्थ स्थिति में गांव, गली तक सक्रिय है। और कॉग्रेस विगत 14 वर्षो से ही नही, आम कॉग्रेसी भी विगत 25 वर्षो से सत्ता से दूर है। जिसमें कॉग्रेस सहित उसके अनुवांशिक संगठनों की हालत यह है कि वह क्षेत्रीय क्षत्रपों के ब्रान्ड भर बनकर रह गयेे है। 

         अगर यो कहे कि शिवराज की सतरंगी शाही सेना के आगे निहत्थे कॉग्रेसी व जागीरो में बटे उसके अनुवांशिक संगठन कैसे शिव की सेना से लड़ेगें यह तो कॉग्रेस ही जाने। जहां एक ओर समुचे प्रदेश में फिर से शिवराज के नेतृत्व में ााजपा की मोर्चाबंदी शुरु हो चुकी है। वहीं कॉग्रेस 2013 की करारी हार के बाद भी आज तक अपना म.प्र. में सर्वमान्य या आलाकमान द्वारा निर्धारित सेनापति ही सिद्ध नहीं कर सकी। जो लड़ाके कॉग्रेस की ओर से शिवराज को छोड़, भाजपा के अहम अहंकारी अन्याईयों के खिलाफ लडऩा चाहते है वह कॉग्रेस आलाकमान के विगत 20 वर्षो से बन्द दरवाजे पर इस आशा-आकांक्षा के साथ बैठे है कि कभी तो कोई सेनापति 24 अकबर रोड से म.प्र. फतेह के लिये निकलेगा और फिर म.प्र. में अहंकारियों के खिलाफ रण भीषण होगा। 
          ये अलग बात है कि कॉग्रेस का निजाम तो बदल गया मगर दरबारियों की धाक और कॉग्रेस किले के दरबाजे आज भी बन्द है जो 1998 में थे। बहरहाल शिवराज के नेतृत्व में म.प्र. सरकार पूरे चुनावी मोड में आ चुकी है। मगर सरकार व संगठन के समन्वय के बीच अगर 12 वर्ष की सत्ता के अनुभवी शिवराज ने एक अच्छे सेवक के साथ शासक वाली कार्यप्रणाली नहीं अपनाई जिसे मूर्त रुप देने विगत 2 वर्ष से सरकार व संगठन में वह संघर्षरत है। तो कुछ भी हो सकता है फिलहाल म.प्र. जीत का मुगालता किसी को नहीं पालना चाहिए। 

         अगर शिवराज स्पष्ट विजन और डिटेल, डीपीआर के साथ दलगत राजनीति से थोड़े ऊपर उठ गांव, गली, किसान, मजदूर, गरीबों की ाातिर जनसेवा, राष्ट्र सेवा से जुड़े, विधा, विद्ववान को सत्ता के लालचियों, स्वार्थियों से इतर जोड़ उन्हें स मान देने में सफल होते है तो निश्चित ही यह शिवराज की 12 वर्ष की कठिन तपस्या और त्याग का प्रमाणिकता और प्रमाण के लिये टर्निंग पॉइन्ट होगा और स्व. पण्डित जी के सपनो को म.प्र. की धरती पर मुक्कमबल उतारने का इतिहास होगा। जब तक म.प्र. के जीवन दायनी के श्राफ से म.प्र. को मुक्ति की दिशा में मु यमंत्री नहीं बढ़ेगें तब तक तमाम पुण्य तपस्या अधूरी ही रहेगी और लाख परिश्रम के बावजूद भी, यह महान म.प्र. कभी खुशहाल, समृद्ध नहीं बन सकेगा। शुरुआत शिवराज को ही करनी है और साधना भी उन्हीं को, अगर वह म.प्र. को अपने श्रम और साधना से म.प्र. को श्राफ मुक्त करा पाये, जो 4 माह के अल्प समय में भी हो सकता है तो यह म.प्र. के लिये कल्याणकारी सुख, समृद्धि और खुशहाली के मार्ग पर ले जाने के लिये उनका और उनकी सरकार का ऐतिहासिक और अहम कदम होगा जिसकी बेहाल म.प्र. को बड़ी आशा-आकांक्षा है। 
जय स्वराज 
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