देश के लिये प्रमाण नहीं, परिणामों की दरकार कहीं देश के दर्द, पीढ़ा का परिणाम तो नहीं, गुजरात चुनाव?

विलेज टाइम्स समाचार सेवा, वीरेन्द्र भुल्ले देश के नेता की नीति, नियत और निर्णयों पर सवाल करना किसी भी राष्ट्र के नागरिकों के लिये दर्दनाक...

विलेज टाइम्स समाचार सेवा, वीरेन्द्र भुल्ले देश के नेता की नीति, नियत और निर्णयों पर सवाल करना किसी भी राष्ट्र के नागरिकों के लिये दर्दनाक ही नहीं, शर्मनाक भी होता है। खासकर तब कि स्थिति में जब परिणाम आशा-आकांक्षा अनुरुप संभावित न हो। मगर प्रमाणों के मद्देनजर परिणामों का अभाव उन कोशिश प्रयासों की अक्षमता, जो अनुभूति एहसास कराने में उन लोगों को अक्षम, असफल साबित हो, जिनके लिये वह परिश्रम, प्रयास और कोशिश की जाती है। ऐसे में गुजरात जैसे परिणाम संभावित होना कोई आश्चर्य की बात नहीं।

इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि गुजरात ही नहीं, समुचे देश की जनता कितनी सजग संवेदनशील और जागरुक है जिसने गुजरात चुनाव के निर्णय से यह साबित कर दिया कि उसकी स्वस्थ लेाकतंत्र में तमाम पीढ़ा, दर्द और सार्थक परिणामों के अभाव में कितनी गहरी आस्था है। इतना ही नहीं, अपने के देश नेताओं के प्रति उसके  मन ही नहीं, दिल में भी कितना गहरा सम्मान है। 

एक ओर गुजरात की महान जनता ने देश के प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा का खयाल रखा, तो वहीं दूसरी ओर देश के प्रमुख विपक्षी दल के नेता का जोश भी बरकरार रखा। यह देश के प्रधानमंत्री के रुप में देश के नेता के प्रति गुजरात ही नहीं देश की जनता की आस्था ही है। जो विषम परिस्थितियों में भी उनके दल को सरकार बनाने का मौका मिला। वहीं विपक्षी दल के नेता को भी इतना वोट मिल गया कि वह जनता के निर्णय अनुसार विपक्ष की प्रभावी भूमिका गुजरात में निभाते हुये अपना आगे का प्रदर्शन जनता के अहम मुद्दे और ताकतवर संगठन खड़ा कर देश भर में प्रभावी विपक्ष की भूमिका निभाये। 

मगर कहते है लोकतांत्रिक व्यवस्था में सबसे बड़ी जबावदेही सत्ताधारी दल की होती है फिर वह राज्य हो या केन्द्र सरकार क्योंकि जनता वोट के माध्यम से अपनी आस्था व्यक्त कर उसे सत्तात्मक निर्णय लेने का मौका देती है। और विपक्ष को सरकार की गतिविधियों पर नजर रख जन व राष्ट्र हित के मुद्दों पर सहयोग करने का। सो जनाकांक्षाओं की पूर्ति और जनता का बेहतर भविष्य, दोनो से ही, जनता को अपेक्षित रहता है। 

आज जब देश की जनता की आशा-आकांक्षायें चरम पर है और युवा तरुणाई बेहतर भविष्य के इन्तजार में पथराई आंखों से अपनी सरकारों को निहार रही है। ऐसे में प्रमाण कम और परिणामों की जिज्ञासा ज्यादा बढ़ जाती है। जिसकी पूर्ति करना सरकार का धर्म भी है और कर्तव्य भी। मगर अफसोस कि अच्छी निर्णय क्षमता और ईमानदार छवि को कायम रखने वाली प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व वाली सरकार देश की आशा-आकांक्षा अनुरुप अहम परिणाम देने में असफल अक्षम साबित हो रही है,जो देश के लिये दुर्भाग्य पूर्ण है। खासकर वह प्रत्यक्ष परिणाम जिसके लिये देश वर्षो से पीड़ा, दर्द और आभावों का दंश झेलता चला आ रहा है जो सारी अव्यवस्था व सामाजिक आर्थिक, राजनैतिक भ्रष्टाचार की जड़ है। 

काश सरकार के रणनीतकारों ने अहम मुद्दों पर शुरुआत की होती तो 3 वर्ष का समय तो बहुत होता है नोटबंदी, जीएसटी की तरह ही उन क्षेत्रों में परिणाम इतने सार्थक होते जिनकी अनुभूति देश ही नहीं, स्वयं प्रधानमंत्री को भी होती। साथ ही वह एहसास भी गांव, गली, गरीब, पीडि़त, वंचितों के बीच होता जिसकी उम्मीद उन्हें प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली सरकार से थी।  

मगर ऐसा क्यों नहीं हो पा रहा, यहीं यक्ष सवाल समुचे देश के सामने आज है। जबकि विगत 3 वर्षो में विदेश नीति से लेकर आन्तरिक, बाह सुरक्षा सहित किसान, गरीबों की आर्थिक सुरक्षा में प्रधानमंत्री के नेतृत्व में बड़े निर्णय हुये। मगर क्रियान्वयन के अभाव में वह परिणाम नहीं दे सके, जो देश के लिये अवश्यम भावी थे। और जो निर्णय नये भारत निर्माण में सार्थक हो सकते थे, खासकर वह अहम क्षेत्र सरकार के निर्णयों से अछूते ही रहे, जो अहम थे। कारण सरकार के रणनीतकारों का सारा फोकस विगत 3 वर्षो में देश की विखरी व्यवस्था को समेटने की जल्दबाजी और चुनाव दर चुनाव जीत का जुनून पर ही बना रहा। 

काश उन उपेक्षित क्षेत्रो में भी कार्य शुरु हुये होते, जिनका जिक्र विभिन्न मौको पर स्वयं प्रधानमंत्री जी अपने भाषणों में करते रहे है। अगर सरकार के रणनीतकार प्रधानमंत्री जी की मंशा अनुरुप उन क्षेत्रो  में भी अपना कौशल दिखाने में सफल होते तो आज जीत हार के लिये प्रधानमंत्री जी को पुन: गुजरात तक का सफर तय न करना पड़ता। बहरहाल अभी भी समय है और शक्तिशाली सरकार की निर्णय शक्ति भी मौजूद। जरुरत है प्रधानमंत्री जी को एक दूरद्रेष्टा और जौहरी की तरह हीरों को बगैर किसी नफा नुकसान के दलगत राजनीति से इतर राष्ट्र की खातिर अहम निर्णय ले, व्यवहारिक शुरुआत उन विधा, विद्ववानों के साथ करने की जो दूर सुदूर गांव, गली, कस्बो, शहरों में उपेक्षित तिरस्कृत पड़े है। सिर्फ इसीलिये कि न तो उनकी किसी दल या सत्ता में पहुंच है, न ही उनके हुनर को कोई पहचानने वाला। अगर उन बिखरे रत्नों को समेट एक धागे में पिरोने में प्रधानमंत्री जी अपनी कार्यशैली अनुरुप सफल रहे, तो निश्चित ही नये भारत निर्माण को पर लगते देर न होगी और परिणाम भी ऐसे होगें जो इस महान राष्ट्र के लिये सार्थक सफल ही नहीं, ऐतिहासिक होगेंं। जिन पर आने वाली पीढ़ी गर्व भी कर सकेगी और स्वयं को गौरान्वित भी मेहसूस करेगी।  
जय स्वराज 

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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Village Times: देश के लिये प्रमाण नहीं, परिणामों की दरकार कहीं देश के दर्द, पीढ़ा का परिणाम तो नहीं, गुजरात चुनाव?
देश के लिये प्रमाण नहीं, परिणामों की दरकार कहीं देश के दर्द, पीढ़ा का परिणाम तो नहीं, गुजरात चुनाव?
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