खुशहाल, समृद्ध, समस्या मुक्त म.प्र. निर्माण में, वैचारिक सैलाव अहम, लकीर की फकीर, सत्तायें, संस्था, संगठनों से, गांव, गली का भला असंभव

विलेज टाइम्स समाचार सेवा :  अगर हम विगत 2 दशक से विकास और जनसेवा की चर्चाओं पर नजर डाले तो विकास और जनसेवा के नाम सत्ता तक पहुंचने और सत्त...

विलेज टाइम्स समाचार सेवा : अगर हम विगत 2 दशक से विकास और जनसेवा की चर्चाओं पर नजर डाले तो विकास और जनसेवा के नाम सत्ता तक पहुंचने और सत्ता से बाहर होने की जो अठखेलियां म.प्र. में चल रही है, उसे देखकर तो लगता है कि, वह छितड़े विकास या सेवा के नाम गिद्ध भोज से ज्यादा कुछ भी नहीं। अगर हम यो कहे कि हमारी सत्तायें, संगठन, संस्थायें म.प्र. को सक्षम, सफल बनाने में अक्षम असफल साबित हुई तो कोई अतिशंयोक्ति न होगी। 

मगर सत्ता सुख के आगे मानव जीवन मूल्य ही नहीं, स्थापित सिद्धान्तों की धज्जियां उड़ाने वाले जबावदेह लोग इसीलिये भी निरंकुश हो जाते है किसी भी व्यवस्था में जब वहां के नागरिक और जनता जागरुक  नहीं रहते और जबावदेह लोगों पर अन्धा विश्वास कर गांव, गली के लोग अपना खुशहाल जीवन तलाशने में जुटे जाते है और वह अपने संघर्ष पूर्ण जीवन निर्वहन के दौरान यह भूल जाते है कि जिन्हें उन्होंने अपनी आशा-आकांक्षाओं की पूर्ति के लिये अपने जनप्रतिनधि के रुप में चुना है वह उन आशा-आकांक्षाओं पर खरा न उतर अक्षम, असफल साबित हो रहा है। जिसके चलते न तो उनकी आशा-आकांक्षाओं की पूर्ति होती है और न ही संघर्षपूर्ण जीवन में आने वाली समस्याओं का समाधान हो पाता है। और वह एक ऐसे दुष्चक्र का शिकार हो, ऐसा संकट पूर्ण जीवन जीने पर मजबूर हो जाता है। जिसका लाभ उठा सत्ता के लिये लालाहित, संगठित लोग अपने धन, बाहुबल, भ्रामक प्रसार एवं सामाजिक सरोकारो का सहारा ले, विकास व जनसेवा के नाम सत्ता तक पहुंच जाते है और विकास व जनसेवा को भुला सत्ता सुख उठाते है।    

ऐसे में आम नागरिक अपने आपको छला सा मेहसूस करता है और उसे कुछ भी हासिल नहीं हो पाता। जिसका साक्षात उदाहरण है कि जो व्यवस्था पूर्व में थी वह चौपट हो गयी और जो नई-नई व्यवस्थायें अस्तित्व में आयी वह कारगार साबित न हो सकी। 

अब यहां यक्ष प्रश्र यह है कि आखिर, चुने हुये लोग यह कैसे भूल जाते है कि उपजाऊ गांव की भुरभुरी धूल में कितने कांटे और वर्षातों में उफनते नदी नाले में, तो अतिवर्षा या अल्पवर्षा में गांव, गरीब, किसान के कैसे अरमान टूटते है। वह तो यह भी भूल जाते है कि जिन शहर, नगरों की गड्डाहीन, सिकुड़ती गन्दगी भरी गलियों अन्धकार और उजाले  में जलती स्ट्रीट लाइट, चौपट सुनसान बाग-बगीचों से यहां तक पहुंचे है। वहां अब सेवा और विकास के नाम कैसे हुड़दंग मचा है। जिन शहरों, नगरों, नलो, हेडप पों, कुओं, तालाबों में कभी शुद्ध पेयजल रहता था आज वह भी बहुत कुछ राहत नहीं दे पा रहे। 

आखिर इन दल, संगठनों के रहते म.प्र. में बच्चों का भविष्य संघर्षरत बन गया, युवाओं का जीवन रोजगार के अभाव में चकनाचूर हो गया तो किसी का जीवन रोजगार के इन्तजार में बर्बाद हो गया। बुजुर्गो की आर्थिक सामाजिक पीढ़ा बताती है कि उनका सुनहरा भविष्य उस अन्ध विश्वास में किस तरह चौपट हो गया उन्हें पता ही नहीं चला। ऐसे सत्ता संगठनों से अब कैसे उम्मीद की सकती है जो सत्ता के नशे में चूर उन लाल गलीचों पर चल यह भी भूल गये कि कभी पेयजल, मुफ्त प्याऊ लगाने में नगर शहर के लोग गर्व कर, स्वंय को गौरान्वित मेहसूस करते थे। उन नगर, शहरों में अब पेयजल खुले दामों पर बिच रहा है। अवैध कॉलोनियां में विकास तो वैध कॉलोनियां जो 14 फीसदी विकास कर देती है, वह अंधकार, गन्दगी का अंबार लगा है। हो सकता सत्ता सुख के लिये संगठित लोग संगठन इस सच को नकार दे, मगर सच यहीं है। 

अगर ऐसी सेवा विकास के लिये हम आज भी लकीर के फकीर बन, अन्ध भक्तों की तरह ऐसे लोगों के पीछे दौडऩा चाहते है जो दल और संगठनों के नाम अपनी-अपनी दुकाने खोले बैठे है जिनकी पहचान और नाम भले ही अलग-अलग हो, मगर उनके प्रयास और परिणाम अभी भी निरर्थक साबित हो रहे है। अगर वाक्य में ही हम समस्या मुक्त, समृद्ध म.प्र. बनाना चाहते है और दलील दास्ता से म.प्र. को मुक्ति दिखाना चाहते है तो हमें लकीर के फकीर की कहावत को छोड़, सहज, संगठित वैचारिक सैलाव लाना होगा। ऐसे लोग किसी भी संस्था, संगठन, दल या व्यक्ति हो सकते है, तभी म.प्र. समृद्ध व समस्या मुक्त प्रदेश बन सकेगा। 

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खुशहाल, समृद्ध, समस्या मुक्त म.प्र. निर्माण में, वैचारिक सैलाव अहम, लकीर की फकीर, सत्तायें, संस्था, संगठनों से, गांव, गली का भला असंभव
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