लोकतंत्र पर हावी होता भीड़तंत्र

व्ही.एस. भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा: राजसत्ताओं में सरंक्षित, सामूहिक लूट की संस्कृति लोकतंत्र के लिये खरतनाक तो है ही, बल्कि अराजक...

व्ही.एस. भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा: राजसत्ताओं में सरंक्षित, सामूहिक लूट की संस्कृति लोकतंत्र के लिये खरतनाक तो है ही, बल्कि अराजकता की ओर बढ़ता देश आज का सबसे बड़ा सवाल है। बढ़ते भीड़तंत्र के बीच सबसे बड़ी उम्मीद किसी भी लोकतांत्रिक देश में उस देश के नागरिकों को उनके द्वारा चुनी हुई सरकारों से होती है। और उसके द्वारा बनाई जाने वाली नीति कानूनों से होती है। ऐसी ही उम्मीद हमारे महान राष्ट्र के नागरिकों ने सत्ता के सरंक्षण में संगठित लूट-पाट से तृस्त होकर 14 वर्ष पूर्व 10 साल सत्ता में रही कॉग्रेस सरकार के अहम अहंकार के चलते उसे उखाड़ नई सरकार चुनते वक्त की थी।

मगर 13 वर्षो के बाद भी आज जनता हताश है निराश है क्योंकि राजसत्ताओं के संरक्षण में सामूहिक लूट का कांरवा घटने के बजाये चर्माेत्कर्ष की ओर अग्रसर है और राजसत्ताओं में औपचारिक, अनौपचारिक तौर पर भागीदारी करने वालों के साथ उनके अधनीनस्त संस्थाओं उनसे जुड़े संगठन या जनता की आवाज बुलन्द करने वालों का, मानसिक व्यवहार अकूत दौलत कमाने की ओर बड़ा है, न कि घटा है। 

ये अलग बात है कि केन्द्र सरकार इस तरह के आरोप-प्रत्यारोप से अछूती है। मगर केन्द्र की महत्वकांक्षी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के आभाव ने आज कई ऐसे सवाल खड़े कर दिये है, जिन्हें झुठलाया नहीं जा सकता। देखा जाये तो किसी भी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को चलायमान रखने में राजसत्ता के अधीन राजकोष का विकास और कल्याणकारी योजनाओं के सफल क्रियान्वयन का बड़ा योगदान होता है वह भी तब की स्थिति में जब लोगों का मुख्य धन्धा खेती, किसानी, मजदूरी हो और बड़े स्तर पर रोजगार देने वाले प्रायवेट संस्थानो का आभाव हो, ऐसे में राज सत्ताओंसे जुड़े संस्थायें, संस्थान ही रोजगार का बड़ा माध्यम होती है। 

फिर चाहे वह निर्माण, सप्लाई क्षेत्र हो या फिर संविदा आधार पर सेवा, सुरक्षा का क्षेत्र हो। सभी दूर आज सत्ता, संस्थायें, सत्ता संगठनों से जुड़े लोगों का औपचारिक अनौपचारिक कब्जा इस बात के स्पष्ट संकेत है, कि कहीं न कहीं तो कोई खामी है। किसी भी राष्ट्र के लिये सबसे दर्दनाक बात तो यह होती है कि राजसत्ता के इसारे पर संवैधानिक संस्थायें ऐसी-ऐसी नीतियां अमल में ला उनके क्रियान्वयन में जुट जाती है। जिससे उनका स्वरुप संवैधानिक न होकर किसी दल, संगठन विशेष के रुप में लोगों को नजर ही नहीं आता, बल्कि यह एहसास भी कराता है। कि मौजूद राजसत्ता उनके कल्याण और विकास में अक्षम साबित हो रही है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिये खतरनाक है। कई रोजगार उन्मुख निर्माण, सप्लाई व अनुबन्ध सेवा से जुड़े संस्थानों के हालात यह है कि अघोषित, अनौपचारिक तौर पर मानों पूरा का पूरा संगठित की गिरोह काम कर रहा हो। 

जिसमें चुने हुये परिषद सदस्य, पदाधिकारी, मंत्री तक स्वयं को असहज और अक्षम महसूस कर रहे हो। कारण सतत सत्ता की लालसा में राजसत्ता द्वारा दोषियों पर शसक्त प्रभावी कार्यवाही एवं प्रभावी मूल्यांकन का न होना है। अगर सेवा के नाम अकूत दौलत इकठ्ठा करने वाले जब संगठित झुंठ की तरह आम जनता पर गुर्राने लगे और सत्ता के संरक्षण में रीत-नीत को दरकिनार कर, कानूनन अपना हक जता, आम नागरिक के जीवन को कंटक पूर्ण बनाने लगे तो ऐसे में अराजकता पनपना स्वभाविक मानवीय और प्राकृतिक गुण भी है। जिसे समझना राजसत्ताओं का धर्म भी है और कर्म भी।

अगर केन्द्र सरकार अपने प्रभावी अधिकारों का इस्तेमाल कर, राजसत्ताओं के संरक्षण में ऐसी संस्थाओं, संगठनों जो उससे औपचारिक, अनौपचारिक रुप से जुड़े है, या उन संस्थाओं ने सेवा देने वालो के ऐसे नाते रिश्तेदारों, शुभचिन्तकों की आय व स पत्तियों खंगाली जाये तो विगत वर्षो में लोकायुक्त, आर्थिक अनवेषण व्यारो के छापों में मिली संपत्ति बौनी साबित होगी। जनता के वोट से मिली ताकत के सरंक्षण आम नागरिकों को आतंकित कर उनके जीवन को नरक बनाने वाले शायद सत्ता के नशे में यह भूल जाते है। कि वह जनता के वोट से सत्ता या संवैधानिक संस्थाओं में रहते कितनी ही अकूत दौलत अहंम, अहंकार को भुना ले, मगर एक दिन रहना तो उन्हे भी उसी समाज और व्यवस्था में है जिसका निर्माण वह घोषित-अघोषित रुप में कर्तव्य विहीन हो, करने में दिन रात जुटे हो। 

हो सकता है जब वह सेवा मुक्त हो और शेष जीवन के लिये उन्हें उसी व्यवस्था और समाज में लौटना पड़े तब निश्चित ही नहीं, उनके पास सिवाय सहने के करने बहुुत कुछ नहीं होगा। इसीलिये मानवता का तकाजा है कि सभी राजसत्तायें उनसे औपचारिक, अनौपचारिक रुप से जुड़ी संस्थायें, संगठन और व्यक्ति विचार करे कि क्या उचित है और समय रहते, ऐसी व्यवस्था तथा समाज का निर्माण करें, जिसमें सभी सुकून, शान्ति से शेष जीवन का निर्वहन खुशहाली के साथ कर पाये। 
जय स्वराज         

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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Village Times: लोकतंत्र पर हावी होता भीड़तंत्र
लोकतंत्र पर हावी होता भीड़तंत्र
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