पराक्रम, साहस, सृजन का आभाव परिणामों में बड़ी बाधा

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा : पारदर्शिता के साथ प्रभावी परिणाम आज की आवश्यकता है। मगर अहम, अहंकार, नकारात्मक, निक मापन आज हमारी मजबूरी बनता जा रहा है। जिसके चलते साहसी, सक्षम सकारात्मक लोग भी अपनी भूमिका समाज और राष्ट्र में निभाने में अक्षम और असफल साबित हो रहे है।     

आज केन्द्र व राज्य सरकार की कई महत्वकांक्षी योजनायें जरुरत मंदों के बीच इसीलिये भी असफल, अक्षम सााबित हो रही है। कि परिणाम पारदर्शिता और प्रमाणिकता से इतर प्रचार-प्रसार तक सीमित रह गये है। प्रमाणिकता का मार्ग तय करने, जहां अहम, अहंकार, निक मापन आड़े आ रहा है तो दूसरी और साहसी, सेवा भावी सृजन में विश्वास रखने वाले लोगों की कमी इस महान मार्ग में कंटक बनी हुई है। आज जब देश के प्रधानमंत्री, युवा तरुणाई के बीच उस ऊर्जा को जगाने में सफल हो रहे है। जो किसी भी राष्ट्र, समाज के उत्थान में माहती भूमिका निभा सकती है, तब न तो उसे सृजन, साहस पराक्रम दिखाने का मौका है और न ही ऐसे सहज, पारदर्शी संसाधन और साधन जिसका उपयोग कर वह अपनी माहती भूमिका निभा सके।  

ऐसे में प्रभावी प्रयासों का असफल होना अच्छे संकेत नहीं। मगर र्दुभाग्य कि हम आज भी लकीर के फकीर बन, समय का रोना रोते रहते है। कोई साल तो कोई 5 तो कोई 10 साल के समय में परिणाम लाने के लिये, कम मानते है। तो कुछ लोकतांत्रिक व्यवस्था पर ही सवाल उठाते है, जो कि सच नहीं।

देखा जाये तो किसी भी व्यवस्था में लोकतांत्रिक व्यवस्था वह महान व्यवस्था है जो न्याय व कानून पर आधारित है। अगर हम वाक्य में ही प्रकृति पुत्र है और उस परमपिता परमात्मा की संतान है तो जिस तरह हमारी जननी पलक झपकते ही बदलाव व परिणाम सामने लाने में हमेशा से सक्षम और सफल रही है, तो हम प्रकृति पुत्र होने के नाते कुछ परिणाम लाने में सफल, सक्षम क्योंं नहीं। क्यों हम परिणाम पाने के लिये चन्द मिनटो, घन्टों दिनों की बात करने के बजाये, हम सालों वर्षो में उलझ जाते है। आखिर क्यों एक व्यक्ति सार्थक परिणाम लाने में असफल अक्षम है जबकि ईश्वर इस दुनिया में हर व्यक्ति को  अकेला भेजता है और अकेला ही वापस बुला लेता है। 

इस तर्क पर लोग कह सकते है कि यह काल्पनिक और आध्यात्मिक बाते हो सकती है मगर प्रकृति के सच जैसे सूर्य, चन्द्रमा को नहीं झुठलाया जा सकता। ठीक उसी प्रकार मानव कर्म को नहीं झुठलाया जा सकता। इसीलिये करने वाला भी एक होता है और परिणाम देने वाला भी एक। सवाल समझ और कार्य कुशलता का है और मनुष्य चाहे तो बगैर एक जैसा खर्च किये मौजूद व्यवस्था में ही अपने बुद्धि कौशल से वर्षो नहीं घन्टो मिनटों कुछ माह में भी सफल, सक्षम परिणाम मानव, जीव जगत कल्याण की खातिर प्रमाणिक तौर पर दे सकता है और यह संभव भी है।  

जरुरत है आज ऐसी सत्ता, परिषदों की जो ऐसे लोगों को तलाश करें, जो साहसी, सफल, सक्षम परिणाम मूलक हो, क्योंकि जिस तरह मोती गहरे समुद्र में सीप के अन्दर, तो हीरे जमीन के अन्दर या पथरों में पाये जाते है। 
जय स्वराज  
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