पद गरिमा के विरुद्ध आचरण लोकतंत्र की हत्या और जनता के साथ अन्याय

वीरेन्द्र भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा जिस तरह से चुनाव जिताने-हराने, सरकारें बनवाने या हटाने का क्रम देश व राज्यों में संवैधानिक पद गरिमा के विरुद्ध आचरण, कर्तव्य जबावदेहियों के निर्वहन से चल निकला है, वह लोकतंत्र की हत्या ही नहीं, जनता के साथ अन्याय भी  है। वोटो की खातिर राष्ट्र व जनाकाक्षांओं के साथ हो रहे इस खिलवाड़ पर जिम्मेदार, जवाबदेह लोग भले ही चुप रहे। लोकतांत्रिक व्यवस्था पर अन्ना हजारे की भावना से भले ही दल अपने निहित स्वार्थो के चलते सहमत न हो, मगर संविधान दिवस पर आयोजित कार्यक्रमों और विज्ञापनों में छपी लाइने पढ़, हर नागरिक को पद, गरिमा विरुद्ध आचरण कर्तव्य, जबावदेही समझने काफी है। 

बहरहाल देखा जाये तो हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार और कार्यपालिका का कार्य राष्ट्र व जनहित में नीति और कानून बनाना और उनका क्रियान्वयन करा, आम जन के जीवन को सुरक्षित, समृद्ध और खुशहाल बनाना है। जिससे लोगों की आशा-आकांक्षाओं की पूर्ति के साथ राज्यों और राष्ट्र को समृद्ध, खुशहाल बनाया जा सके। तथा देश के राजनैतिक दलों की जबावदेही कर्तव्य होता है कि वह अपने वैचारिक आधार के साथ उनकी सरकारों के राज्य, राष्ट्र व जनहित में किये जाने वाले कार्यो के आधार पर अपना जनाधार बनाते हुये संगठन मजबूत करे और चुनावों में जनता को बता वोट के माध्यम से अपनी सरकार व प्रत्याशियों की जीत को सुनिश्चित करें। 

मगर लगता है कि अब हमारे लोकतंत्र में इस अपेक्षित सत्य से इतर संवैधानिक पदों पर बैठे सरकारों के मुखिया उनके सहयोगी मंत्री सुबह से ही चुनावों के दौरान राजनैतिक सभाओं में निकल पड़ते है। और पार्टी जन उनके पीछे, जबकि होना यह चाहिए कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोग राज व्यवस्था और सरकार के जनकल्याणकारी कार्यो का बखान करना चाहिए। न कि अपने संगठनों का राजनैतिक मंचों से चुनाव प्रचार करना चाहिए जिससे लोकतांत्रिक मर्यादायें को जिन्दा रहे सके। 

चुनावी मंचों से संवैधानिक शपथ लेने वाले सरकार के मुखिया मंत्रियों को सिर्फ सरकार की उपलब्धि उसकी नीतियों और कानून निर्माण की ही बात करना गरिमा पूर्ण है। अगर सरकार पर कोई वैधानिक आरोप हो तो जबाव देना भी जरुरी है, न कि अपने दल के पक्ष में वोट हासिल करने राजनैतिक भाषण, आरोप-प्रत्यारोप करना। 

आखिर किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कैसे संभव है सरकार के मुखिया या मंत्री को अपने दल विशेष के लिये वोट मांगना। जबकि वह तो समुचे राज्य, राष्ट्र के संवैधानिक मुखिया होते और शपथ लेते वक्त भी बगैर किसी भेद भाव के आचरण करने की बात शपथ के दौरान दोहराते है। 

बहरहाल इस तरह की गलतियां पूर्ववर्ती सरकारें, संगठन करते आ रहे है, तो जरुरी नहीं उन्हें दोहराया जाये। बल्कि उसमें सुधार करते हुये एक मजबूत गौरव पूर्ण आदर्श लोकतांत्रिक व्यवस्था की बात होना चाहिए। आखिर हम राजनीति के नाम दोहरा आचरण कैसे जनता के प्रति रख सकते है। आज के समय में पक्ष-विपक्ष दोनों को समझने वाली बात है। साथ ही वोट देने वाली जनता को भी समझना होगा कि सरकार उसके मुखिया मंत्रियों से उनके कर्तव्यों जबावदेहियों से स बन्धित सवाल करें, न कि राजनैतिक, तभी हम सच्चे और अच्छे लोकतंत्र कहला पायेगें। 
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