प्रमाण, प्रमाणिकता पर हो सवाल

विलेज टाइम्स समाचार सेवा: म.प्र. ग्वालियर मेला ग्राउन्ड से लेकर फूलबाग मैदान तक भू-अधिकार स मेलन से  शुरु हो, जनसंवाद में तब्दील सभा का परिणाम 2018 से पहले या बाद में जो भी हो, मगर इस स मेलन में जन संसद में पधारे 18 प्रदेशों के दूर-दूरान्चल क्षेत्रों से एकत्रित लोगों को देख इतना तो स्पष्ट है। कि मानवीय अधिकारों का अब जवानी जमा खर्च से काम चलने वाला, नहीं।

ये अलग बात है कि विगत 3 वर्ष से कान में तेल डाल बैठी केन्द्र सरकार ने भले ही केन्द्रीय पंचायत विकास खनन मंत्री नरेन्द्र सिंह के माध्यम से अपनी संवेदना दिखाने के कोशिश की। जिन्होंने समस्या सुनने तत्काल केन्द्रीय सचिव को दिल्ली से ग्वालियर भेजा, तो दूसरे दिन जनसंवाद में पूर्व केन्द्रीय मंत्री कांग्रेस सचेतक ज्योतिरादित्य सिंधिया व म.प्र. के मु यमंत्री की प्रतिनिधि बतौर नगरीय प्रशासन मंत्री माया सिंह व आप पार्टी के प्रदेश संयोजक आलोक अग्रवाल सहित देश-विदेश से आये मानव पर्यावरण के कल्याण से जुड़े लोग पहुंचे। जिसमें एक परिषद के संस्थापक सदस्य राज गोपालन पी.वी. गांधीवादी विचार को आगे बढ़ाने वाले सुब्बाराव जी के अलावा हजारों की तादाद में पीडि़त, वंचित, शहरिया, आदिवासी समाज के लोग सम्मलित हुये। 

मगर प्रमाण परिणामों के आभाव में विगत एक दशक से संघर्षरत एकता परिषद का संघर्ष कितना कामयाब होगा कलंकित राजनीति के बीच, जहां न तो नीतियां ही प्रभावी नजर आती, न ही क्रियान्वयन के आभाव में परिणाम। जब तक परिणामों पर सवाल और नीति निर्माण से लेकर क्रियान्वयन तक जबावदेही सुनिश्चित नहीं हो जाती तब मानव जीवन से जुड़े मुद्दे खुशहाली के मार्ग में इसी प्रकार कंटक बने रहेगें। देखना होगा कि सरकारें इस स मेलन और जनसंवाद को कितनी ग भीरता से लेती है। 
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