म.प्र. में सेवको के बदलते सुर यूं तो लोकतंत्र में जनता भगवान बाकी सब सेवक ही होते है

जनधन का उलीचा तो राजतंत्र से लेकर परतंत्र और अब लोकतंत्र में भी लग रहा है, मगर आज कल जनसेवा के नाम जो धन उलीचने सहजने का जो प्रचलन लोकतंत्र में चल निकला है उसे देख लोकतंत्र के भगवानों में दर्द भी है और वे दुखी भी है तथा पीडि़त भी। क्योंकि कुछ नस्ल तो काबिल होते हुये भी अवसर के अभाव में नकारा साबित हो ली। मगर आने वाली नस्ल जिस तरह से भूत, भविष्य की चिन्ता किये बगैर जिन्दा रह, जीवन निर्वहन के लिये तैयार हो रही है वह चेतन, शून्य तो होगी ही साथ ही समाज, प्रदेश और राष्ट्र सहित मानवता के लिये खतरनाक होगी। 

जो किसी भी सभ्य समाज के लिये शर्मसार करने काफी होगी। अब तो हालात यहां तक आ पहुंचे कि न तो युवा पीढ़ी, न ही संघर्षरत पीढ़ी, न तो सच सुनने तैयार है, न ही सच कहने, स्वयं की महत्वकांक्षा पूर्ति में डूब सुनहरे सपने देखने वाली इस पीढ़ी का भविष्य क्या होगा वह तो भविष्य के गर्भ में है। मगर इतना तय है कि जिस नव संस्कृति, संस्कारों का समाज में जन्म हो रहा है वह काफी डराने वाली होंगें।  

ऐसे में सेवकों के रहते जो जनसेवा के नाम जनधन तो जनधन, वर्तमान मौजूद या आने वाली पीढिय़ों के भविष्यों का जो उलीचा हो रहा है वह किसी से छिपा नहीं। ऐसे में दो वर्ग समाज में अघोषित तौर पर ऐसे तैयार हो रहे है जिसमें एक वर्ग जो केवल स्वयं के जीवन निर्वहन के लिये अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना चाहते है। तो दूसरी ओर वह प्रबुद्ध गढ़ है जो स्वयं के स्वार्थ और अनावश्यक महत्वकांक्षा के चलते अपने कत्र्तव्य जबावदेहियों से विमुख हो, केवल धन और अर्थहीन वैभव वर्चस्व चाहते है। 

मगर यहां यक्ष प्रश्र यह है कि उस महान कॉम और उस महान भू-भाग का क्या होगा जो कभी समृद्ध और खुशहाल हुआ करता था। क्योंकि जनाकांक्षा और जनता के अस्तित्व पर ही किसी भी राजसत्ता का अस्तित्व निर्भर करता है और मानवीय सभयता, फैसला हम भारत के महान शिल्पियों की संतानों को लेना है। 
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