मिजाज के विरुद्ध महत्वकांक्षा, सड़े सिस्टम से सफलता की उम्मीद और क्रियान्वयन में कोताही बनी कलंक क्या देश में एक भी ऐसा राष्ट्र भक्त नहीं, जो देश को स्पर्शी, पारदर्शी परिणाम दे सके

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा : जो गलती देश व देश के सिस्टम के मिजाज के विरुद्ध सन 1977 में पूर्व प्रधानमंत्री स्व. श्रीमति इन्दिरा गांधी ने राष्ट्रहित में परिवार नियोजन को लागू कर, की थी। कहीं वहीं गलती मोदी सरकार ने देश में नोटबंदी और आनन फानन में जीएसटी लागू करके तो नहीं कर दी। अब स्व. इन्दिरा गांधी जी का देश हित में लिया निर्णय कितना व्यक्तिगत या सामूहिक था या फिर मोदी सरकार का निर्णय कितना व्यक्तिगत या सामूहिक रहा यह तो वहीं जाने। मगर स्पर्शी, पारदर्शी परिणामों को लेकर जो बहस फिलहाल देश भर में शुरु हुई है वह देश के आम नागरिकों को निश्चित ही विचलित करने वाली है। 

देखा जाये तो राष्ट्र हित में जिस आशा आकांक्षा के साथ मोदी नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार एक से एक जन व राष्ट्र सेवा से जुड़ी योजनायें लाई। नोटबंदी हुई, जीएसटी आया मगर आज देश की गिरती आर्थिक सेहत और बेरोजगारी की ओर बढ़ती आवाम अब धैर्य खोती दिखाई दे रही है। क्योंकि केन्द्र की मोदी सरकार को 3 वर्ष पूर्ण हो चुके है। मगर स्पर्शी पारदर्शी परिणाम आज भी काफी दूर नजर आ रहे है। ऐसे में यहां यह यक्ष सवाल अवश्य बनता है। कि मोदी सरकार के व्यक्तिगत या सामूहिक निर्णयों में कहीं वहीं गलती तो नहीं हुई, जो स्व. इन्दिरा गांधी जी के कार्यकाल के दौरान हुई थी। 

शायद पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी का सार्वजनिक मंच से यह स्वीकारना कि वह दिल्ली से एक रुपया डालते है और वह 10 पैसे के रुप में जनता तक पहुंच पाता है। देश के एक प्रधानमंत्री के मुंह से निकली देश के सड़े सिस्टम की वह सच्चाई थी जिसे सहज स्वीकारने के बजाये उनके इस व्यान का विपक्षी दलों द्वारा उनका मजाक उड़ाया गया। 

शायद 500-1000 की नोटबंदी पर सदन में चर्चा के दौरान वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पर चर्चा के जबाव के दौरान कटाक्ष करते हुये व्यंगात्मक लहजे में ही सही, मगर आज के हालातों के मद्देनजर शायद सही ही कहा था कि बाथरुम में रेनकोट पहनकर कैसे नहाया जाता है, यह तो मनमोहन सिंह से अच्छा कोई नहीं बता सकता है, हो सकता है कि मोदी जी के मुंह से अनायास या फिर जानबूझकर सच निकल गया हो, जो आज सच साबित होता दिखाई देता है। 

ये अलग बात है कि इस सच को, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मोदी सरकार के बगैर तैयारी निर्णय पर 2 फीसदी विकास दर कम होने की बात सदन में कही थी और वह आज सच भी साबित हुई है। वहीं पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह सरकार में हुये सूचना अधिकार, वन भूमि अधिकार, शिक्षा, स्वास्थ, रोजगार के अधिकार के अलावा खादन्न का अधिकार वह स्पर्शी व पारदर्शी, परिणाम मूलक, निर्णय रहे, जिससे न तो विश्व मंदी के दौर में भी भारत की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई, न ही शहरी, ग्रामीणी क्षेत्रो में विकास और जनकल्याण से जुड़ी हितग्राही मूलक, सेवा, सुधार के क्षेत्र में विकास अवरुद्ध हुआ। यह भी सच है कि आन्तरिक व बाह सुरक्षा और संरचनात्मक  रोजगार के क्षेत्र में बहुत कुछ व्यवस्थागत प्रदर्शन सहयोगी दलों के गठबन्धन की मजबूरी व कॉग्रेस के ही लग्जरी मानसिकता के स्वार्थो के चलते नहीं हो सका। 

यह भी सही है कि बाह सुरक्षा या आन्तरिक सुरक्षा को लेकर डॉ. मनमोहन सरकार की नीति आक्रमक नहीं रही, कारण वैचारिक बौद्धिक निष्ठा का अभाव साथ ही गठबन्धन राजनीति का वह दंश जो निर्धारित मुद्दों पर सरकार बनाते है। और सरकार में बैठते ही अपनी मनमानी पर उतर आते है। जिसमें भ्रष्टाचार की वह सारी सीमायें तोड़ दी जाती है जो किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार नहीं होती। कारण कि कॉग्रेस को जनता ने बड़ी हार का सबक दे, सत्ता से बाहर कर दिया। 

अब दूसरा यक्ष सवाल यहां देश के सामने यह है कि इतने सशक्त प्रधानमंत्री के नेतृत्व और देश के लिये आईकॉन संगठन के सरकार को संरक्षण तथा बड़े-बड़े विद्ववानों थिकंटेकों के बीच एक भी ऐसा महान इन्सान सरकार या शासन में नहीं रहा, जो स्पर्शी, पारदर्शी परिणाम देश के सामने रख पाये। जबकि जनधन, प्रधानमंत्री बीमा, अटल पेन्शन, मेकइन इंडिया, ग्रीन, स्र्टाटप, स्केल इंडिया, मुद्रा कोष जैसी धमाकेदार योजनायें रही, जो देश के लिये मील का पत्थर साबित हो सकती है। और समुचे विश्च में एक स्पष्ट संदेश नये भारत के रुप में दे सकती है। मगर निष्ठा के साथ कर्तव्य निष्ठा का आभाव और क्रियान्वयन में कोताही वह स्पर्शी, पारदर्शी परिणाम नहीं दे सकी जिसके लिये प्रधानमंत्री ही नहीं, देश को भी आशा आकांक्षायें थी। शायद मोदी सरकार का सिस्टम के मिजाज के विरुद्ध योजनाओं का क्रियान्वयन ही रहा कि बगैर पूर्व तैयारी के नोटबंदी, जीएसटी ने देश को बेवजह परेशान किया। नोटबंदी से जो होना था सो हो गया। मगर अब जिस तरह से जीएसटी को लेकर लोगों को परेशानी और रोजगार घट रहे है अगर ऐसा ही कुछ और दिन चलता रहा तो देश की स्थिति और गंभीर भी हो सकती है। 

देखा जाये तो मोदी से अभी भी देश को बड़ी उम्मीदे है अगर जल्द ही प्रधानमंत्री जी ने या उनकी थिंकटेक टीम ने सही समाधान नहीं ढूंढा, तो वह दिन दूर नहीं, जब स्वराज के लिये संघर्षरत देश मायूस और निराश हो जाये। शायद प्रधानमंत्री जी ने सही ही कहा है कि उनके लिये दल से बढक़र देश है और देश अकेले भू-भाग से नहीं, वहां रहने वालो की आस्था विश्वास और समर्पण से बनता है। जिनके लिये देश की सुरक्षा उसकी समृद्धि, खुशहाली अन्तिम लक्ष्य होता है।  

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