भारत छोड़ो....... की सफलता या असफलता पर सवाल

व्ही.एस. भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा : अगर चर्चाओं की माने तो खबर ाले ही अपुष्ट हो, मगर भाव गलत नहीं हो सकता। जिस तरह की चर्चाये आज भी लोगों के बीच किवदंती बनी हुई है तो उनके अनुसार तथ्य और सत्य यह है कि 1930 से ही अलग पाकिस्तान गठन का ककहरा भुनने की शुरुआत हो चुकी थी। जो आजादी के लिये चले कई आन्दोलन में परिलक्षित होता रहा और यह स्वभाविक भी है कि महान अखंण्ड भारतर्ष को खण्ड-खण्ड करने वालो के मन में अगर इस तरह की कोई भावना रही भी हो, जैसा कि चर्चाओं में औपचारिक, अनौपचारिक, मगर तथ्यविहीन देखने में आता है। तो निश्चित ही कुछ तो ऐसे लोग रहे होगें जिनकी न तो 1942 के भारत छोड़ों आन्दोलन में कोई सहभागिता, आस्था रही होगी और उनका देश की आजादी में कोई विश्वास। 

मगर इन सब चर्चाओं को दरकिनार करते हुये आखिरकार 1947 में हमारा अखंण्ड भारतवर्ष आजाद हुआ, मगर वह, किन्ही भी कारणों या समय परिस्थिति के चलते अखंण्ड नहीं रह सका और हम आजाद होने से पूर्व ही खंण्ड-खंण्ड हो गये। 

लेकिन आजाद भारत में ऐसा ही एक प्रयास 2017 में भारत छोड़ो की बर्शी पर देश के लिये कंटक बन चुके कुछ मुद्दों से देश को निजात दिलाने देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री ने अपनी त्याग, तपस्या दांव पर लगा, गरीबी, गन्दगी, भ्र्रष्टाचार सहित अन्य विषयों को लेकर भारत के सर्वोच्च सदन अर्थात लोकतंत्र के मंदिर में सभी दलों को एक सूत्र में पिरो संकल्प से समृद्धि के लिये प्रयास किया। मगर वह संसद से निकल गांव, गली तक पहुंच पाता, उससे पहले ही एक जरा-सी चूक ने प्रधानमंत्री के इस महा प्रयास को फलीभूत नहीं होने दिया। क्योंकि उसकी स्क्रिप्ट ऐसी लिखी गयी कि प्रधानमंत्री के उदबोधन के साथ ही सारा भाव और भावनायें धरी की धरी रह गयी और प्रधानमंत्री की सारी मेहनत देखते ही देखते धरासायी हो गयी।  

क्योंकि प्रधानमंत्री के सारगर्वित उदबोधन से देश के उस महान प्रधानमंत्री के  योगदान का उल्लेख छूट गया या फिर छोड़ दिया गया या फिर उदबोधन से गायब रहा। जिसने अपना वैभव, ऐश्वर्य पूर्ण जीवन ही नहीं, अपनी धन, दौलत, परिवार तक को दांव पर लगा भारत के सपूत होने के नाते, अपना उत्तरदायित्व पूरी निष्ठा ईमानदारी से अपनी समझ अनुसार पूर्ण करने का जीवन पर्यन्त प्रयास किया। 

सच तो यह है कि आज ऐसे कितने दल व देश में नेता है जिन्हें पड़ोसी देश से मिले एक मात्र धोखे के चलते या देश की नागरिकों की अकाल मौत पर सदमा तो दूर छींक तक आती हो। मगर स्व. पण्डित जवाहर लाल नेहरु देश के प्रथम प्रधानमंत्री ही नहीं, एक ऐसे नेता थे, जिन्हें सन 1962 के धोखे ने मौत के मुहाने तक पहुंचा दिया था और फिर वह इस सदमे से नहीं उभर सके। 

जिस व्यक्ति ने अपने वैभव ऐश्वर्य पूर्ण जीवन के दिन अंग्रेजो की जेलो में अपने महान राष्ट्र व पीडि़त, शोषित, वंचित नागरिकों के लिये बितायें हो। और प्रधानमंत्री के रुप में राष्ट्र के लिये समर्पित लोगों को चुनाव हारने के बावजूद भी सदन तक पहुंचाना व विपक्षी और अलोचक के रुप में उनके कड़वे वचन होने के बावजूद उन्हें सुनना उनकी महान कार्यशैली में सुमार रहा है। ऐसे व्यक्ति के नाम मात्र तक से देश के सर्वोच्च सदन में परहेज महान भारतीय पर परा, संस्कृति, संस्कारों का अंश कदाचित नहीं हो सकता। 

अगर दूसरे शब्दों में कहे कि पण्डित नेहरु केवल आजाद भारत के ही नेता नहीं थे, बल्कि जिन सदस्यताओं के लिये अन्तराष्ट्रीय स्तर पर हम संघर्षरत है। उन संगठनों की सहज सदस्यता के आग्रह को उन्होंने ठुकरा दिया था। और इसके उलट उन्होंने अलग से गुट निरपेक्ष आन्दोलन, पंचशील के सिद्धान्त जैसे विषयों को अन्तराष्ट्रीय मंच पर रख, भारत का मान बढ़ाते हुये एक अन्तराष्ट्रीय नेता का ओहदा हासिल किया था। 

इतने बड़े आदम कद नेता ही नहीं देश के पहले प्रधानमंत्री का सोशल मीडिया हो, या फिर कोई मंच से दुष्प्रचार देश की समझ से परे है। हो सकता कुछ श्रुटियां फैसले, निर्णयों में समय परिस्थिति अनुसार रही हो। और जैसा कि मनुष्य के बारे में कहावत भी है कि अगर कोई मनुष्य है तो कमी होना स्वभाविक है। हो सकता है कि जो दोषारोपण या दुष्प्रचार देश में चला या चल रहा है उसके लिये वह दोषी ही न हो, मगर किसी प्रतिशोध बस किसी व्यक्ति का सुनियोजित षडय़ंत्र के तहत दोषी करार दे, नई संस्कृति, इतिहास गढऩे की कोशिश आखिरकार इन्सानियत के खिलाफ ही है। जिससे न तो किसी व्यक्ति, दल, संगठन और राष्ट्र, का भला होने वाला है और न ही हमारी आने वाली पीढ़ी को कोई अच्छा संदेश जाने वाला है। हो सकता है इसी तरह की समय परिस्थिति आजादी से पूर्व रही हो, जैसी कि आजाद भारत में देश के लोगों को देश के सर्वोच्च् सदन में देखने, सुनने मिले। यहीं भारत छोड़ों....... की असफलता का कारण बनी हो।   

बहरहाल जो भी हो, अगर वाक्य में ही हम, हमारे महान राष्ट्र उसकी संस्कृति पर पराओं को स्थापित कर, भारत को महान समृद्ध, खुशहाल राष्ट्र बनाना चाहते है तो हमें ऐसी औछी हरकते छोड़, प्रधानमंत्री जी से त्याग, तपस्या की सीख लेते हुये की उनकी भावना अनुसार व्यापक तौर पर बड़ा दिल रख अपनी कठिन त्याग, तपस्या के बल पर नये भारत निर्माण की शुरुआत, एक जुट होकर करनी चाहिए, तभी हम समृद्ध, खुशहाल, राष्ट्र बन पायेेगें और अपनी आने वाली पीढिय़ों का भविष्य भी सुरक्षित कर, विरासत में एक महान राष्ट्र दे पायेगें।  

क्योंकि भारत की सभ्यता, भव्यता, दिव्यता, समृद्धि, खुशहाली की हामी रही है हमारी संस्कृति, संस्कार जो अनादिकाल से विभिन्न धर्म, जाति, भाषा को आत्मसात करती आयी है। और महान भारतवर्ष की पहचान हमेशा से एक अक्षुण समृद्ध, खुशहाल राष्ट्र की रही है। 
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