राहुल की स्वीकार्यता में बड़ी बाधा, सियासत या संस्कार?

वीरेन्द्र शर्मा/विलेज टाइम्स समाचार सेवा। जब देश के प्रधानमंत्री कड़ी मेहनत, संघर्ष के बल पर चाय बैचने से लेकर देश के सर्वोच्च शक्तिशाली प्रधानमंत्री पद तक पहुंच राष्ट्र की सेवा कर सकते है तो जिन राहुल गांधी के  पूर्वज आजादी की लड़ाई में जेल जा सकते है व परदादा स्व. पं. जवाहर लाल से लेकर दादी स्व. इन्दिरा गांधी पिता स्व. राजीव इन्दिरा गांधी देश के प्रधानमंत्री वन राष्ट्र सेवा कर, देश को अन्तराष्ट्रीय याती के साथ देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत कर, गरीब, पीडि़त, वंचितों को अधिकार तक आधुनिक भारत निर्माण की सिला रख उसकी मजबूत शुरुआत कर सकते है। तो उसी परिवार मे जन्में, पले, बड़े कई बार के सांसद राहुल ने जिन सियासतदारों रणनीतकारों के बीच राजनीति का ककहरा पड़, राजनीति की शुरुआत की आखिर उसी पढ़ेे लिखे संस्कारवान, नेकदिल इन्सान राहुल की स्वीकार्यता पर देश में सवाल क्यों? 

यहीं सवाल आज समुचे देश में यक्ष बना हुआ है जबकि आसन्न चुनाव हिमाचल, गुजरात, राजस्थान, म.प्र., छत्तीसगढ़ जैसे अहम प्रदेश, राहुल के नेतृत्व में अप्रत्याशित परिणाम देने तैयार है। मगर वह किसी भी कीमत पर कोई ऐसे सियासी लोगों और रणनीतकारों को झेलने स्वीकारने कतई तैयार नहीं, जो सेवा के नाम अस्वीकार्य सियासत और सत्ता भोगते है। ऐसी स्थिति में लोग विपक्षी दलो की ओर अनमने मन से चल देते है। और असफलता का सारा ठीकरा राहुल के सर फूट जाता है। जिसका भरपूर लाभ विपक्षी दलों को विगत 15 वर्षो से मिल रहा है। अगर यहीं हाल रहा तो आगे भी विपक्ष इसी तरह फलता-फूलता रहेगा। 

जबकि समझदार लोग समझते है कि राहुल शुरु से ही स्वच्छ, पारदर्शी और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के प्रबल पक्षधर रहे है। जिसका बड़ा नुकसान भी विगत वर्षो में उन्हें सियासी तौर पर उठाना पड़ा है, साथ ही कमजोर होते संगठन और सत्ता को कई प्रदेश ही नहीं, देश में भी जाते देखा है। मगर उन्होंने न तो अपने सिद्धान्त, न ही राष्ट्र, जनहित के मुद्दे व जीवन मूल्यों सेे कभी समझौता नहीं किया।

ये सही हो सकता है कि राष्ट्र की मीडिया, प्रबुद्ध जनो से उनका सीधा संवाद, स पर्क इस बीच न रहा हो, मात्र एक टेलीफोन न न बर और ईमेल आईडी से चलने वाला उनका ऑफिस दूर-दूरांचल देश के क्षेत्रों में बैठे लोगों को वो रेन्सपोन्स न दे सका हो, जो देश के प्रधानमंत्री के कार्यालय व निवास के फोन न बर एप, ईमेल आइडी पर देश के साधारण से साधारण व्यक्ति को मिलता है। और देश की जनता को वह लक्षेदार भाषण भी राहुल के भाषणों में सुनने नहीं मिलते, जिस पर वह तालियां ठोकने तैयार रहे।

हो सकता है देश व आम जन के दिल को छूने वाली भाषा, मुद्दों का रणीतकारों के बीच सियासत के चलते अ ााव रहा हो, या फिर मेनेजमेन्ट और छवि चमकाऊ निर्जीव प्रचार क पनियों के दौर में वह जीवन्त एहसास लोगों को राहुल में न दिखा हो, ऐसे कई कारण हो सकते है। मगर यह स पूर्ण सच नहीं हो सकता है, यह मात्र कयास भर हो।  

अगर फिलहाल की स्थिति में जो हाल राजस्थान, छत्तीसगढ़ और म.प्र. का बना हुआ है वह बड़ा ही दर्दनाक है। कॉग्रेस के सियासी लोग रणनीतकार विगत 10 वर्षो से यह क्यों स्वीकारने तैयार नहीं कि पार्टी बचेगी तभी तो राजनीति चलेगी जब पार्टी ही नहीं बचेगी तो राजनीति कैसे चलेगी। और इन प्रदेशों में कॉग्रेस के पास राहुल को मजबूती देने इस मर्तवा अन्तिम मौका है। 

अगर बगैर समय गवायें राहुल छत्तीसगढ़ सहित राजस्थान में म.प्र. में भूपेश, सचिन, सिधिंया जैसे कर्मठ जनप्रिय नेताओं को संगठन को मजबूत बना, सत्ता की ओर सभी वरिष्ठों को साथ ले, कूच करने का लोकतांत्रिक तरीका सहित स्वयं के संरक्षण में मौका नहीं देते है तो यह राहुल जैसे नेकदिल इन्सान के लिये अपने सिद्धान्त व जीवन मूल्यों की राजनीति करने वाली कॉग्रेस व देश के साथ अन्याय होगा, जो कॉग्रेस ही नहीं लोकतंत्र में आस्था रखने वालो के लिये दर्द और दुख की बात भी होगी। 
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