निर्जीव तकनीक से जीवन्त भावनाओं का मल्टी नेशनल इलाज.............. तीरंदाज?

व्ही.एस.भुल्ले : भैया- मने तो पहले ही बोल्या हारे महान देश में हारे महान माननीयों से बड़ा कोई मूड़धन्य विधा, विद्ववान नहीं हो सकता, क्योंकि जब वह दिखते है तो स्वर्ग से आये किसी देवता से कम नहीं, जब वह बोलते है तो साक्षात सरस्वती उनकी जीवाह पर उतर आती है और जब वह हंसते है तो मानो उनके मुख से फूल झड़ते है। जब भी वह जनकल्याण, जनसेवा में जुटते है तो इस पृथ्वी पर मानो उनसे बड़ा कोई कुबेर, सेवा भावी नहीं। अगर ऐसे में उन्होंने जीवन्त या निर्जीव तकनीक के माध्यम से मल्टी नेशनल मान्यताओं के अनुरुप किसी जुगाड़ तकनीक को इजात किया है, तो इसमें हर्ज ही क्या? 

अगर संकल्प से समृद्धि के लिये सॉशल मीडिया सहित मंचों से चीख-चीख कर फ्री फोकट में देश के अबोध मासूम, मजबूर लोगो से सुझाव विचार चर्चा का ऑफर दिया जा रहा है। तो यह हारे महान माननीयों की महानता है बरना मुफलिसी में किसी को पूछता कौन है और फुरसत किसे। 

भैये- मने भी तो यहीं बोल्यू कि विगत 13 वर्षो से प्रदेश तो 3 वर्षेा से भारत निर्माण हो रहा है। अरबों, खरबों का जनधन फूकने के बाद भी किसी को आज तक ऐसा कुछ हासिल नहीं हुआ है जिस पर या तो गर्व मेहसूस किया जा सके या स्वयं को गौरांवित मेहसूस किया जा सके। वो तो सौभाग्य है थारे जैसे मासूम अबोध, मजबूर लोगों का जो सॉशल मीडिया ही नहीं खुले मंचों से खुला ऑफर दें, थारे जैसे मासूम अबोध, मजबूर लोगों को देश, प्रदेश निर्माण के लियेे पूछा जा रहा है। 

भैया- हारी पीढ़ा यह नहीं कि प्रदेश और देश में किसको क्या मिला या नहीं मिल रहा है हारा दर्द तो यह है कि सन 1947 में शिक्षा, स्वास्थ और मानव विकास का जो आंकड़ा था वह अब हारी किसी भी सरकारों के किसी भी आंकड़े से विगत 70 वर्षो की आजादी के बाद भी देखने नहीं मिल रहा है। सुना है देश भर में भगवा लहरा रहा है, वहीं दूसरी ओर गांव, गली, गरीब, किसान, पीडि़त, वंचितों का कचूमर निकला जा रहा है।

शायद सन 1835 की ब्रिटेन संसद में मैकाले सच ही बोल्या, कि अगर विश्व के इस खुशहाल, संपन्न राष्ट्र को लंबे समय तक गुलाम बना राज करना है तो इसकी संस्कृति और शिक्षा नीति बदलनी होगी, क्या वह वाक्य में ही हमारी संस्कृति और शिक्षा नीति बदलने में कामयाब रहा, जो हमें खुशहाल संपन्न बनाती थी। फिर मल्टी नेशनल इलाज किस मर्ज की दवा है। 

भैये- तने तो बावला शै, कै थारे को मालूम कोणी कि मल्टी नेशनल क पनियां होती है जिनके अपने कुछ व्यापारिक नियम सिद्धान्त होते है जिन्हें लेकर वह अन्य देशों में अपना व्यापार करती है। और बगैर किसी की परवाह किये मोटा मुनाफा कमाने में भी कामयाब रहती है। जिनके लिये मोटा मुनाफा भगवान होता है। सो अगर कोई मल्टी नेशनल मंसूबो के तहत कुछ कर रहा है तो थारे को क्या? 

भैया- तो क्या हारी काठी यूं ही मुफलिसी की तरह इस दुनिया से उठ जायेगी और हारी काठी पर भी जवानी मे ही मखाने और चिल्लर की बौछार हो जायेगी। मने तो पहले ही बोल्या था कि इतनी सारी योजनाओं के साथ सीधे पैकेज के माध्यम से अन्तेष्टी तेरही, पटा, पिंण्डदान योजना चला दो और हारे जैसे गांव, गली, गरीब, पीडि़त, वंचितों को ऐसी सेवा से मुक्ति दिला दो। मगर भाया हारे पर हारे महान लोकतंत्र की इस बेरहम व्यवस्था में किसी को तरस नहीं आया, सो मने भी ब्लेक इन व्हाइट, श्याम श्वेत धीमी गति का साप्ताहिक अखबार निकालने का बीड़ा उठाया। 

भैये- मुये चुपकर गर टिड्डी दल के किसी भी राष्ट्र भक्त ने सुन लिया तो थारी, तो थारी हारी हवा भी बीच सडक़ पर निकाल दी जायेगी फिर थारे को बचाने न तो कोई लिमिटेड, न ही प्रायवेट लिमिटेड पार्टी नजर आयेगीं। क्योंकि वह तो पहले ही घपले घोटालों से जूझ रहे है ऐसे में कौन थारी सुनेगा और हाथो हाथ थारी मदद के लिये सामने खड़ा होगा। 

मने तो लागे भाया तीरंदाज सही बोल्या कि जब इस महान लोकतंत्र में बड़े-बड़े बाबा जोगी और तथाकथित बने भगवान सीधे सीखचों के पीछे जा रहे है। और उनके चैले छर्रे सीधे-सीधे शासन को धमका रहे है। सो मने तो समझ लिया थारा इसारा, मने तो अब बाबा तो बाबा उनके चैले छर्रो के खिलाफ भी मुंह नहीं खोलूंगा और न ही अब सॉशल मीडिया को देखूगां। रहा सवाल केडर आड़ो का तो उनसे से तो आंखें में आंख डाल, सीधे माफी मांग लूंगा। और मल्टी नेशनल व्यवस्था के तहत मल्टी कलर भले ही न बन सकू, मगर धीमी गति का श्याम स्वेत साप्ताहिक ब्लेक इन व्हाहट निकालने का तमगा अवश्य ले, लूंगा। रहा सवाल हारे दुसाहसी व्यवहार के चलते जाती रही हारी पत्रकार होने की शासकीय मान्यता या अधिमान्यता का, तो जब भी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की कृपा होगी वह भी हासिल हो जायेगी। मगर सच बोलू तो कोई कितने ही जतन निर्जीव तकनीक में जान फूंकने, जनकल्याण के लिये भले ही कर ले, मगर बगैर जीवन्त संपर्क के गांव, गली, गरीब, पीडि़त, वंचितों की हालत में सुधार नहीं पायेगा, बोल भैया कैसी रही। जय जय श्रीराम  
जय स्वराज 

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