मदद में अव्वल मुख्यमंत्री की पीढ़ा, तो जनधन, समय बर्बादी का गुनाहगार कौन

वीरेन्द्र शर्मा, विलेज टाइम्स समाचार सेवा : इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि पीडि़त, वंचितों के बीच सीधे सौ फीसद आर्थिक मदद वाली योजनाओं का कीर्तिमान स्थापित करने वाले नेकदिल मुख्यमंत्री के मन में आखिरकार कुछ तो ऐसा रह गया जिसकी पीढ़ा वह खुले मंच से करने से नहीं चूक रहे। किसी भी सरकार को 15 वर्ष का समय इतना बड़ा होता है कि वह एक पूरी की पूरी नई पीढ़ी तैयार कर, एक बड़े बदलाव की नींव रख, समृद्ध खुशहाल प्रदेश की नींव रख, एक ऐसी नजीर प्रस्तुत की जा सकती थी जिसे लोग सदियों याद रखते और मानवता दुंआयें देती।  

अब इसे हम म.प्र. का सौभाग्य कहे या र्दुभाग्य कि एक नेकदिल मुख्यमंत्री की कड़ी मेहनत और दरियादिली के बावजूद म.प्र. में पीडि़त, वंचितों की मदद को छोड़, कुछ ऐसा नहीं हो सका, जिस पर हम गर्व महसूस कर सके। हो सकता है नेकदिल मु यमंत्री की कुछ मजबूरी उनके मातृ संगठन के प्रति उनकी पहली जबावदेही या लोकतांत्रिक व्यवस्था के कटू सच के चलते रही हो। या फिर सतत सत्ता के लिये मशीन बनने की होड़ ने उन्हें यह सोचने समझने का मौका ही नहीं दिया कि वह इस प्रदेश को ऐसा क्या कुछ दे सकते थे जो पीडिय़ां उन्हें याद रखती। मगर इसके उलट म.प्र. की महान जनता ने उन्हें विगत 12 वर्षो में बहुत स्नेह और बड़ी तादाद में आज भी इन्सानियत के नाते उनकी मदद की सराहना करते लोग नहीं थकते। जो समय वे समय उनसे कड़े सवाल भी करते रहे और उन्हें यह संदेश भी देते रहे कि प्रदेश के लिये क्या बेहतर हो सकता था। मगर सरकार के सामूहिक संचालन ने उन्हें यह मौका ही नहीं दिया कि वह कुछ ऐसे स्थाई निर्णय ले पाये, जिनके दीर्घगामी परिणाम म.प्र. को मिल सके।  

ये अलग बात है कि वह विपक्ष के संगीन आरोपों के जबाव देते वक्त अपने उन शुभचिन्तकों को भी आड़े हाथों लेते रहे, जो म.प्र. ही नहीं, प्रदेश के मुख्यमंत्री की मेहनत त्याग-तपस्या देख उनका भला सोचते थे। कौन नहीं जानता डायल 100, लाडली लक्ष्मी, कन्यादान, तीर्थदर्शन, उत्कृष्ट छात्र-छात्राओं के लिये 75 प्रतिशत अंक लाने पर फ्री उच्च शिक्षा, मजदूर, किसानों के लिये सीधे लाभ की योजना, स्वसहायता समूह, जननी, मातृशक्ति जैसी अन्य योजनाओं में लोगों को सीधा लाभ मिला है। 

वहीं अधोसंरचना निर्माण में भी काफी कार्य हुआ मगर शिक्षा, स्वास्थ ही नहीं रोजगार के लिये वह ऐसा कोई उदाहरण प्रस्तुत नहीं कर सके, न ही उघोग, कौशल निर्माण में  ऐसी कोई लकीर खींच सके जिसकी चर्चा की जा सके। मगर समय-समय पर विपक्ष विहीन प्रदेश में मुख्यमंत्री जी को जब तब जिन संगीन आरोपों का सामना करना पड़ा, हो सकता है उसके लिये वह सीधे तौर पर दोषी न हो। मगर सरकार के मुखिया के तौर पर वह निषकलंक नहीं कहे जा सकते। 

निश्चित ही आज नहीं तो कल, जो कमी म.प्र. के कल्याण में रह गई है, उनका उनके खाते में आना तय है। अगर मुख्यमंत्री चाहते तो सुरक्षित म.प्र. उघोग, रोजगार के लिये संरक्षित म.प्र. शिक्षा और स्वास्थ सेवाओं में अब्वल म.प्र. बना सकते थे। मगर कहते है कि सामूहिक जबावदेही और मातृ संगठन के प्रति समर्पण, लोकतंत्र में संवैधानिक व्यवस्था भी किसी मुख्यमंत्री के लिये अहम होती है। जो उसकी सोच और सार्वजनिक जीवन को भी प्रभावित करती है। जो व्यक्ति की सफलता असफलता का पैमाना तय करती है। फिलहाल अभी भी मुख्यमंत्री के पास 1 वर्ष का समय शेष है देखना होगा कि ऐसे में वह कितना कुछ म.प्र. के लिये कर पाते है। क्योंकि संभावनायें समय पर और परिणाम सोच और मेहनत पर निर्भर करते है तय उस नेकदिल मुख्यमंत्री को करना है जिसने मातृ संगठन और पीडि़त, वंचितों के लिये मेहनत की पराकाष्ठा की है। 
जय स्वराज 
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