कल्याण, कर्तव्य के प्रति वचन बद्धता और बेमिशाल सोच के धनी थे सर मोक्ष गुण्डम विश्वेसरैया सर की बेमिशाल सोच, आज भी जिन्दा है ग्वालियर-चंबल में

व्ही.एस.भुल्ले,  विलेज टाइम्स समाचार सेवा   :  कहने को विहावान जंगल, सिन्ध, पार्वती, कूनो, बेतवा नदियों से पटा बुन्देलखण्ड सहित ग्वालियर-च...

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा : कहने को विहावान जंगल, सिन्ध, पार्वती, कूनो, बेतवा नदियों से पटा बुन्देलखण्ड सहित ग्वालियर-चंबल का भाग इन नदियों की कल-कल धाराओं से कभी अछूता नहीं रहा। मगर देश ही नहीं विश्व में याति प्राप्त इन्जीनियरों के भगवान के रुप में अपनी बेमिशाल सोच को मानव ही नहीं समुचे जीव-जगत के कल्याण की पहचान बनाने वाले सर विश्वेसरैया ने समुचे ग्वालियर-चंबल ही नहीं, बुन्देलखण्ड को अपनी नई सोच और इन्जीनियरिंग के बल नई पहचान ही नहीं दी, बल्कि उसके वांझ, पठारी, ककड़ीले, जंगली भूभाग को हरा भरा कर उत्पादन योग्य, जीवन निर्वहन योग्य बनाने में माहती भूमिका इन्जीनियर के रुप में अदा की। ग्वालियर-चंबल, बुन्देलखण्ड के पहाड़ी पठारी, ककड़ीले विहावान जंगलों और खतरनाक जानवरों व के बीच बेहतर जीवन निर्वहन के लिये सिंधिया राजवंश के तत्कालीन महाराजा श्रीमंत माधौराव सिंधिया के आग्रह पर उन्होंने ग्वालियर-चंबल सहित बुन्देलखण्ड में फैली बेतवा, सिन्ध, पार्वती, कूनों के वेशन में सिंचाई एवं पेयजल उपलब्ध कराने बारिश के पानी के बेहतर प्रबंधन के लिये सर्वे कर बांध के रुप में बड़ी-बड़ी सरंचनायें ही नहीं, मौजूद प्राकृतिक संसाधनों के बीच व्यवहारिक तकनीक के सहारे बेमिशाल इन्जीनियरिंग की सौगातें इस क्षेत्र को दी। ककेटों, पहसारी, तिघरा, हर्षी से लेकर सिन्ध पर मोहनी, मड़ीखेड़ा व बेतवा पर माता टीला, राजघाट बांध गांव-गांव, नगर, शहर वह नाम है जो सर विश्वेसरैया की इस क्षेत्र में इन्जीनियरिंग में नई सोच की मिशाल है। 

इतना ही नहीं देश में बने दो आर्काकार बांधों में से 1 बांध दक्षिण प्रदेश के आन्ध्रप्रदेश तो दूसरा बांध सां या सागर के रुप में शिवपुरी शहर में मौजूद है। तत्कालीन महाराज श्रीमंत माधौराव सिंधिया के आग्रह पर ही सर मोक्ष गुण्डम विश्वेसरैया ने विहावान जंगलों और जानवरों के बीच ककड़ीले, पथरीले, पठारी क्षेत्र में जीवन सरंक्षित करने कृषि उत्पादन व हरा-भरा बनाये रखने जनसं या के हिसाब से मानव व पशु पक्षियों का पेयजल उपलब्ध कराने व कुंआ बावडिय़ों सहित भूमि का जल स्तर सामान्य बनाये रखने हर गांव, नगर व जिला मुख्यालयों सूवातों पर बड़े बांध,  तालाबों स्टॉप डेम बनाये जाने की शुरुआत कराई जिनमें से आज भी इन क्षेत्रों में हजारों बड़े-छोटे तालाब तथा तिघरा, पेहसारी, हर्षी, ककेटो, मोहिनी, मड़ीखेड़ा, माताटीला, राजघाट, समोहा के रुप में आज भी जिन्दा है। 

आज से लगभग 25 वर्ष पूर्व इन्जीनियरिंग के रुप में शिवपुरी को सेवा देने वाले तत्कालीन अभियन्ता संघ के अध्यक्ष आर.एन. सिंह कहते है कि भारत ही नहीं विश्व के कई देश खासकर ग्वालियर-चंबल, बुन्देलखण्ड क्षेत्र के लोग कभी भी सर की इन्जीनियरिंग के योगदान को कभी नहीं भुला सकते। जो उन्होंने इन्जीनियर होने के नाते नई सोच के साथ इस क्षेत्र को दिया।  

वे कहते है आज की इन्जीनियरिंग और इन्जीनियरों को उनसे प्रेरणा लेना चाहिए वहीं अभियंता संघ के अध्यक्ष एच.पी. वर्मा तथा पी.आई.यू के संभागीय परियोजना यंत्री सी.पी. वर्मा कहते है वह हमारे प्रेरणा श्रोत है हमारी कोशिश रहती है कि हम मानव कल्याण में अपनी वचन बद्धता, संकल्प को कर्तव्य निर्वहन के दौरान कायम रख सके। पी.डब्लू.डी के सहायक यंत्री एम.के द्विवेदी, जेपी शर्मा कहते है कि वह हमारी धरोहर है जो हमें कर्तव्य निर्वहन के दौरान इन्जीनियरिंग और इन्जीनियर के रुप में ताकत देते है। 

वहीं नगरपालिका के आर.डी. शर्मा जिला शिक्षा केन्द्र के सतीश निगम कहते है वह हम यंत्रीयों के लिये अवस्मरणीय है। इन्जीनियर ओ एच शर्मा, हसरुद्वीन और हुसैन का मानना है कि सर का इन्जीनियरिंग के क्षेत्र में योगदान हर इन्जीनियर के जीवन की वह कड़ी है जो उसे वचन बद्धता के प्रति सचेत करती रहती है। परिणाम कि इन्जीनियरिंग से मानव ही नहीं समुचे जीव-जगत के कल्याण का भी आज मार्ग प्रस्त हो रहा है। वहीं सहायक यंत्री मुकेश जैन, मिटठन रघुवंशी कहते है कि इन्जीनियरिंग मानव सेवा का वह माध्यम है जो जमीनी स्तर पर विकास का मार्ग प्रस्त करता है। 

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कल्याण, कर्तव्य के प्रति वचन बद्धता और बेमिशाल सोच के धनी थे सर मोक्ष गुण्डम विश्वेसरैया सर की बेमिशाल सोच, आज भी जिन्दा है ग्वालियर-चंबल में
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