फर्म, लिमिटेड, प्रायवेट लिमिटेड से निकल, बहुराष्ट्रीय राजनैतिक व्यवस्था में तब्दील होता लोकतंत्र वोट की नीति निगलती तंत्र

व्ही.एस. भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा : लोकतांत्रिक व्यवस्था के जनको ने कभी सपने में भी न सोचा होगा कि जिस अन्याय, अत्याचार, अनाचार से मुक्ति दिलाने व राजशाही, तानाशाही, सामंत व साम्राज्यवादी व्यवस्था को सबक सिखाने तथा हर अंतिम व्यक्ति की सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित कर, उनका जीवन स पन्न, खुशहाल और सुरक्षित बनाने वह जिस लोकतंत्र की कल्पना कर रहे है वहीं लोकतंत्र कभी वोट नीति के चलतेे अपने अस्तित्व के लिये इस तरह कलफेगा। उन्होंने यह भी कभी न सोचा होगा कि लोकतंत्र में भी अघोषित तौर पर फर्म, लिमिटेड, प्रायवेट लिमिटेड और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की तरह तथाकथित दलों की व्यवस्था होगी। जिसमें जनसेवा, राष्ट्र सेवा के नाम अघोषित तौर पर जनधन की चोरी और सेन्ध मारी जैसी घटनायें व्यवस्था के नाम पर आम होगी। व्यवस्था में विकास कल्याण के नाम  अब तो सरेयाम लूट, डांके चल रहे है मगर लोग ही नहीं देश, प्रदेश, शहर, नगर, गांव, गली, गरीब, किसान, पीडि़त, वंचित सभी मजबूर और चुप है। क्योंकि अब हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में तथाकथित विपक्ष के नाम कुछ बचा नहीं, मीडिया के नाम मीडिया हाउस मैनेज है, शेष को कुचल उनका मुंह बन्द हो रहा है। वहीं लोगों को राष्ट्र जनसेवा के नाम मूर्ख बनाया जा रहा है जैसी कि लोगों के बीच आजकल चर्चा है। लेकिन इस बीच जो महारथ म.प्र. व छत्तीसगढ़ की लोकतांत्रिक व्यवस्था में समुचे देश में हासिल की है, खासकर कभी पश्चिम बंगाल, उड़ीसा की लोकतांत्रिक व्यवस्था के बाद इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था का समुचे विश्व में सातवां अजूबा ही कहा जायेगा। 

वर्तमान हालातों के मद्देनजर अब तो सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि आजादी के 40 वर्ष पश्चात अस्तित्व में मौजूद राजनैतिक दल जहां अघोषित तौर पर फर्म, लिमिटेड, प्रायवेट लिमिटेडो के नक्शे कदम पर चल राष्ट्र व जनसेवा के नाम जनधन की चोरी, सेन्ध मारी न रोक, अपना अस्तित्व खो चुके है। अब उनका सामना ऐसी अघोषित बहुराष्ट्रीय व्यवस्था से हो रहा है, जो दल के रुप में राष्ट्र व जनसेवा के नाम अपने संगठित प्रयासों से सत्ता सुख भोग अपने छोटे से छोटे भागीदार को व्यवस्थागत जनधन लूट से रोकने में अक्षम साबित हो रही है। जो स्वयं का प्रभुत्व, पूंजी, सत्ता ही नहीं, समाज शिक्षण संस्थाओं में अपना वैचारिक अधिपत्य चाहती है और वह कामयाब भी है। मगर लोकतंत्र के नाम देश में दुर्गति उन महान नागरिकों की हो रही है, जो घोषित, अघोषित तौर पर अपना जीवन निर्वहन करने टेक्स के रुप में शासन को अरबों खरबों रुपया देते है। 

जिससे राष्ट्र व जनसेवा के माध्यम से सरकार शासन स मल्लित प्रयास कर उनका जीवन, दिव्य, भव्य, संपन्न, खुशहाल बनाने की दिशा में कार्य करें। मगर र्दुभाग्य कि राष्ट्र जनसेवा के नाम जो हालात हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के बन रहे है, वह बड़े ही अराजक और खतरनाक है। जिस तरह से मानवीय मजबूरी और सामाजिक शैक्षणिक  कमजोरियों का लाभ उठा, लोग बहुराष्ट्रीय पैटर्न पर लोकतंत्र चलाने का प्रयास कर रहे है, उसके घातक परिणाम आज नहीं कल अवश्य इस लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने होगें।  

अगर ऐसे में देश के प्रबुद्ध वर्ग, पूंजीपति व नागरिको तथा राष्ट्र भक्तों की जबावदेही अधिक बन जाती है। साथ ही जबावदेही, उन समझदार बच्चों, छात्र, छात्राओं, युवा और ऐसे अभिभावकों की भी अधिक हो जाती है जो स्वयं व अपने बच्चों का भविष्य भव्य व दिव्य होने के साथ अपना और अपने बच्चों का जीवन, स पन्न, खुशहाल, सुरक्षित देखना चाहते है। 

क्योंकि जो लोग धर्म, संप्रदाय, जाति, भाषा, क्षेत्र का भय दिखा, बहुराष्ट्रीय पद्धति अपना सत्ता हासिल या कायम कर अपना सम्राज्य खड़ा करना चाहते है, वह अब बहुत आगे निकल चुके है। और जो विपक्ष के नाम मुंह रसगुल्ला दांवे मजबूरी में चुप इसीलिये बैठे है कि भाग्य से सत्ता को मक्खन उन्हीं के मुंह से गिरेगा तो वह मुगालते में है और जो तथाकथित मीडिया हाउस अपने निहित स्वार्थो के चलते सामाजिक सुपारी किलर की भूमिका में नजर आते है। ऐसे में शेष दम तोड़ती मीडिया और सत्ता शासन, मीडिया की जुगलबन्दी के चलते लोकतांत्रिक व्यवस्था में अब वह दम नहीं बचा, जिसके लिये वह जानी जाती है। 

ये अलग बात है कि हरियाणा के घटनाक्रम से भी मीडिया नाम ने सीख लेते हुये कोई सबक नहीं लिया और आज भी उसका व्यवहार व्यवस्था का भोपू बन, प्रतिष्ठा किलरों के समान है। देखना होगा कि गांधी, लोहिया, जयप्रकाश जी की तरह अब कौन दल के रुप में इन बहुराष्ट्रीय प्रबन्धनों के सामने आता है। मगर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम उन पीढिय़ों के वंशज और उस महान भू-भाग के निवासी जिन्होंने बड़े-बड़े बलशाली सम्राज्यवादी, पूंजीवादी व धूर्त शासकों का शासन देखा है और अपने नैतिक तथा चारित्रिक बल के आधार पर उन्हें जमीदोष किया है। जरुरत आज इस बात की है कि जो इस महान राष्ट्र व इस महान राष्ट्र के नागरिकों के सुरक्षित स पन्न खुशहाल जीवन की आशा, आकांक्षा रखता है उसे इस तरह के कृत्यों से बच राष्ट्र को महान बनाने की ओर अग्रसर होना चाहिए ।
जय स्वराज 
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