लूटने बांटने तक सीमित रही सत्तायें, निक मे तंत्र और नौकरशाही का दंश झेलती जनता

व्ही.एस.भुल्ले,   विलेज टाइम्स समाचार सेवा :  किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिये इससे बड़ी शर्मनाक, हास्यपद बात और कोई हो नहीं सकती कि उ...

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा : किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिये इससे बड़ी शर्मनाक, हास्यपद बात और कोई हो नहीं सकती कि उसका तंत्र ही अपने निक मेपन के चलते उसकी संवैधानिक व्यवस्थाओं का मजाक उड़ाये। हालिया मसला देश के प्रधानमंत्री द्वारा देश में चलाये गये स्वच्छता अभियान को लेकर संज्ञान में है। ये सच है कि टूट चुकी सामाजिक संरचनाओं के चलते समाज में आये बदलाव के कारण मानव जीवन की प्रवृतियों में कई प्रकार के बदलाव आये है जिसके लिये भी पूर्ववर्ती सरकारों की वोट कबाड़ू नीति और तंत्र सहित नौकरशाही में पनपे निक मापन ही सीधे तौर पर जबावदेह कहे जा सकते है। 

क्योंकि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था ने संवैधानिक तौर पर सारी व्यवस्था के सारे अधिकार सरकार और नौकरशाहों को दे रखे है। जनता तो सिर्फ सरकार व नौकरशाहों को धन की व्यवस्था टेक्स के रुप में औपचारिक अनौपचारिक तौर पर करती है, जिससे सारी योजनायें और सरकार सहित नौकरशाहों की वेतन भत्तों की व्यवस्था होती है। 

मगर जब नौकरशाही, तंत्र व सरकारें बगैर व्यवस्था जुटाये इस तरह के अभियान चलाती है या फिर नीतियां बनाती है तो वह या तो हंसी का पात्र बनती है या फिर योजनायें ही निस्तनाबूत हो जाती है। जिसको दो उदाहरणों के माध्यम से समझना जरुरी है। आज जो सरकारे और उनके नौकरशाह व तंत्र जनता के गाड़े पसीने की कमाई से प्राप्त टेक्स के रुप में धन से मोटी-मोटी पगार, गाड़ी कोटिया व आलीशान ऑफिसों में बैठ सुख सुविधाओं का लुफत उठाते है। 

अगर इन्हीं के कार्यालयों में बने सार्वजनिक शौचालय, मूत्रालयों की हालत देखी जाये जो मीटरों दूर से बदबू मारते नजर आयेगें। वहीं सार्वजनिक स्थलों पर मौजूद या मिट चुके, नगर निगम, नगरपालिका के शौचालय, मूत्रालयों को ले तो उनमें कभी सफाई नहीं होती। ऐसे में आम नागरिक कार्यालय या सार्वजनिक स्थल पर कहां शौच करने जायेे। यहीं यक्ष प्रश्र अगर जि मेदारों से कोई पूछ ले तो वह इतने कुटिल और बेशर्म जबाव देने से नहीं चूकते जिससे समुची सभ्यता, संस्कृति ही नहीं, लोकतांत्रिक व्यवस्था भी शर्मा जाये।  

दूसरा उदाहरण हालिया विज्ञान प्रतिभा खोज प्रतियोगिता का है सरकारें और इससे जुड़े जि मेदार नौकरशाह व सरकारें राष्ट्र के लिये प्रतिभायें तो चाहते है और झूठी बाहबाही हासिल करने उन्हें 25000 रुपये इनाम भी देना चाहते है। मगर उनकी शर्त है कि विज्ञान खोज प्रतियोगिता में 25000 हजार का इनाम पाने, इस प्रतियोगिता में भाग लेने वाले छात्र-छात्रायें, स्वयं का लेपटॉप, स्वयं इन्टरनेट साथ लेकर आयें अर्थात 25000 हजार का ईनाम पाने छात्र-छात्राओं के पास लगभग 40,000 हजार रुपये हों, तब वह  लेपटॉप, इन्टरनेट के साथ प्रतिभा खोज प्रतियोगिता में भाग ले पायेगें।
  
आखिर क्या गरीब, क्या अमीर के बच्चे इतने मंहगे लेपटॉप, इन्टरनेट खरीद इस प्रतिस्पर्धा में भाग ले पायेगें। इससे बड़ा हास्यपद और शर्मनाक उदाहरण हमारी सरकारों और योजना बनाने वाले नौकरशाहों का और क्या हो सकता है। 

जिस प्रदेश में दो समय के भोजन के लियेे संघर्षरत आम नागरिक नैसर्गिक सुविधा हासिल करने मजबूर हो वह अपने बच्चों को वैज्ञानिक, इन्जीनियर बनाने 40,000 हजार रुपये कहां से लायेगें। किसी भी सरकार और नौकरशाही का इससे बड़ा निक मापन और अपने ही नागरिकों के साथ कोई दूसरा मजाक हो नहीं सकता। और न ही किसी सरकार का अपने नागरिकों पर इस तरह का अविश्चास हो सकता है।  

जबकि देखा जाये तो स्वयं की सुख सुविधाओं में पानी की तरह जनता के गाड़े पसीने की कमाई बहाने वाली ऐसी सरकारों नौकरशाहों को ऐसी नीतियां बनाने पर शर्म आनी चाहिए और प्रदेश के मुख्यमंत्री व देश के प्रधानमंत्री जी को ऐसे मंत्री और नौकरशाहों को घर बैठाना चाहिए जो राष्ट्र सेवा के नाम राष्ट्र की प्रतिभाओं का दमन और राष्ट्र के महान नागरिकों को अपमानित करते नहीं थकते। 
जय स्वराज  

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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Village Times: लूटने बांटने तक सीमित रही सत्तायें, निक मे तंत्र और नौकरशाही का दंश झेलती जनता
लूटने बांटने तक सीमित रही सत्तायें, निक मे तंत्र और नौकरशाही का दंश झेलती जनता
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