मौका दिया है, तो मदद भी करें, देश जबावदेही में लापरवाही इंसानियत के खिलाफ

व्ही.एस.भुल्ले : जब जबावदेह लोग इसे पढ़ रहे होगें तो निश्चित ही, मुख्य लाइने पढऩे के बाद उनके मन में कई सवालात अवश्य हो सकते है। मगर वह लोकतांत्रिक व्यवस्था के सच से मुंह नहीं मोड़ सकते। समस्त देश वासी जानते है कि हम एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंग है जिसकी व्यवस्था अनुसार हम हमारे चुने हुये जनप्रतिनिधियों के माध्यम से बहुमत के आधार सरकार व विपक्ष को चुनते है। जिसके अपने-अपने कर्तव्य और जबावदेहियां होती है। साथ ही देश की हर उस संस्था व नागरिक की जबावदेही भी लोकतंत्र में सुनिश्चित होती है जो भारतवर्ष को समृद्ध, खुशहाल होने के साथ विश्व विरादरी के मार्गदर्शक के रुप में देखना चाहते है तो फिर सवाल उठता है दिक्कत कहां है? 

देखा जाये तो सबसे बड़ी परेशानी हमारे स्वार्थ, उताबलेपन में है। बगैर सोचे समझें उन शंका कुशंकाओं और आरोप-प्रत्यारोपो मे है जो हमें हमारे ही द्वारा हमारे कल्याण राष्ट्र के लिये चुने हुये लोगों पर विश्वास व्यक्त नहीं करने देती। 

जो संस्कृति विगत 40 वर्षो में भारतीय राजनीति में निहित स्वार्थो के चलते पोषित हुई है, उसने विश्चास के  पक्के रंग को भी आज बदरंग कर रखा है। अगर देश ने देश के प्रधानमंत्री को 5 वर्ष राष्ट्र व जनसेवा सहित उनके कल्याण का मौका संवैधानिक तौर पर दिया है और विपक्ष को तर्कपूर्ण सकारात्मक सवाल करने का मौका मिला है, तो फिर आय दिन की हाय तौबा प्रधानमंत्री और उनकी सरकार की नीतियों को लेकर क्यों? 

कौन नहीं जानता कि 5 वर्ष के लिये बनने वाली सरकार को भी तो संवैधानिक दायरे में रह, जन व राष्ट्र कल्याण के लिये सेवा करनी होती है। इतना नहीं पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा बनाई नीतियों का क्रियान्वयन या समीक्षा भी करनी होती है। 

अगर देश के प्रधानमंत्री 20-20 घन्टे देश सेवा में जुट 2019 में देश के सामने उनकी सरकार की उपलब्धियों का रिर्पोट कार्ड प्रस्तुत करने की बात प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने से पूर्व कर चुके है, तो विपक्ष ही नहीं देश के हर उस जबावदेह नागरिक को इन्तजार करना उसकी जबावदेही है और जरुरत पढऩे पर प्रधानमंत्री जी का सकारात्मक साथ देना भी जरूरी है जो हमारी महान संस्कृति का भाग है। 

जिस तरह से देश में जनधन खाते, बीमा, मुद्रा, कौशल विकास, स्टार्टव, डिजीटल, ग्रीन इण्डिया सहित स्वच्छता सिंचाई, शिक्षा, मेकइन इण्डिया, उज्जवला की बात कही है योजनायें लागू भी की है। यह सब कुछ राष्ट्र व जन कल्याण सहित आम नागरिक के कल्याण हेतु ही तो है। हो सकता है किन्हीं भी कारणों बस परिणाम उन आशा, आकांक्षाओं के अनुरुप फिलहाल सामने न हो, मगर परिणाम न मिले यह संभव नहीं। 

ये अलग बात है कि अपनेे राजनैतिक मातृ संगठन ही नीत और सामूहिक संचालन सहित हमारी लोकतांत्रिक संवैधानिक व्यवस्था की मजबूरी भी परिणाम प्रभावित करने का अहम कारण हो सकते है, मगर वह ऐसी बाधा हो जिससे पार न पायी जा सके, यह भी संभव नहीं। जरुरत आज सभी को मिलकर प्रधानमंत्री जी नीतियों और उनकी कड़ी मेहनत को मदद करने की है क्योंकि राष्ट्र व जन कल्याण, सेवा का मौका उन्हे देश ने चुनकर दिया है। इसीलिये लाख दुष्वारियों के बाद देश के विपक्ष, संवैधानिक संस्थाओं और भारतवर्ष के हर महान नागरिक की जबावदेही बनती है कि वह जन व राष्ट्र कल्याण की योजनाओं में बढ़ चढ़ कर अपनी भूमिका अदा करें। 

क्योंकि प्रधानमंत्री किसी दल विशेष की धरोहर नहीं, वह पूरे सवां अरब नागरिकों का प्रतिविंब है। यह सही है कि मदद करने वालो की सं या लाखों, हजारों, सेकड़ों में न हो, मगर कुछ लोग तो ऐसे होगें जो राष्ट्र व जन कल्याण की खातिर अपनी माहती भूमिका निभा सकते है। फिलहाल अभी भी देश के महान नागरिकों के पास डेढ़ वर्ष का समय शेष है जो बहुत होता है। बशर्ते हम प्रधानमंत्री जी तरह अपने कर्तव्य जबावदेहियों की पराकाष्ठा करने तैयार रहे तो कोई कारण नहीं जो हमारे सामने परिणाम न हो। 
जय स्वराज          
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