बेहतर प्रदर्शन छोड़, बेवजह के मुद्दों में उलझते दल सशक्त प्रधानमंत्री की कड़ी मेहनत पर सवाल

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा : कहते है मुखिया मजबूत हो, तो मुकाम अवश्य हासिल होता है, क्योंकि मजबूत मुखिया के रहते, सरकारों को सरंक्षण तो मिलता ही है साथ ही कल्याणकारी निर्णयों का देश के नागरिकों को लाभ भी मिलता है। एक से एक योजनाओं के निर्णय उसके बावजूद भी सार्थक परिणामों का सामने न आना इस बात का प्रमाण है कि सरकार के सहयोगी एवं प्रधानमंत्री के सहयोगी वह भूमिका सरकार में अदा नहीं कर सके, जिसकी स्वयं प्रधानमंत्री ही नहीं, समुचे देश के गांव, गली, गरीब, किसान, पीडि़त, वंचितों को थी। अब ऐसे में प्रधानमंत्री के कुशल नेतृत्व वाली सरकार को संघीय व्यवस्था में कहां दिक्कत आयी यह तो वह राज्य सरकारें ही जाने, जिनके कंधो पर अपने-अपने प्रदेश के चंहुमुखी विकास और जनकल्याण का भार था। आखिर राज्य सरकारों से कहां चूक हुई, कहां राजनैतिक स्वार्थ आड़े आये, यह तो भविष्य ही तय करेगा। मगर देश ही नहीं, आम, गांव, गली, गरीब, किसान, पीडि़त, वंचितों को शायद सबसे अधिक निराशा उन राज्यों से हाथ लगी जहां प्रधानमंत्री के दलों की 15-15 वर्षो से या विगत 10 वर्षो से सरकारें है। 
        
प्रधानमंत्री जी ने जहां ताबड़ तोड़ विदेशों की यात्रा कर, देश का परचम समुचे विश्व में स्वाभिमान के साथ लहराया, तो दूसरी ओर उन्होंने देश के आन्तरिक विकास और जनकल्याण से जुड़ी ताबड़-तोड़ योजनाओं की शुरुआत की। जिसमें कुछ योजनाओं को वह जमीनी स्तर तक पहुंचाने के लिये अपनी टीम के साथ संघर्षरत रहे। उसके बावजूद भी वह इतनी जबरदस्त योजनाओं के रहते, वह प्रत्याशित परिणाम व उस ऐहसास की अनुभूति आम जनता को नहीं करा सके, जिसकी उन्हें आशा और आकांक्षा थी।  

ये अलग बात है कि प्रधानमंत्री जी समुचे विश्व ही नहीं, देश के अन्दर भी यह विश्वास कायम करने में कामयाब हुये कि वह सबका साथ और सबका विकास चाहते है। मगर उनके मातु संगठन और सहयोगियों के व्यवहारिक प्रतिबिंब ने प्रधानमंत्री जी की भावनाओं को शायद पार-घाट नहीं लगने दिया। 

अगर प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व वाली सरकार के मंत्री या पार्टी के अन्दर विकास उन्मु ा जनकल्याण की भावना रखने वाले लोग विगत 3 वर्षो में प्रधानमंत्री का मान, उनकी कड़ी मेहनत का स मान रखने 18 घन्टे की कड़ी मेहनत के बजाये अगर 2 घन्टे भी ठीक से मेहनत कर लेते, तो प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली इस सरकार का नाम उन सुनहरे अक्षरों मेंं अंकित होता जिसे देश की सवा सौ करोड़ जनता वर्षो-वर्षो तक याद रखती।

मगर र्दुभाग्य कि 3 वर्ष गुजरने के बाद भी ऐसा नहीं हो सका। अभी भी सरकार के मंत्री एवं दल के नेताओं के पास एक वर्ष का समय शेष हैे जिसमेंं वह बेहतर प्रदर्शन कर, प्रधानमंत्री जी की कड़ी मेहनत और उनकी राष्ट्र व जनकल्याणकारी नीतियों के परिणाम लाये जा सकते है। जिससे जब वह 2019 में लोगों के बीच जाये तो वह जनता को अपना परर्फोमेन्स कार्ड बता सके, कि उन्होंने 18-18 घन्टे मेहनत करने के बावजूद देश व देश के लोगों के लिये क्या कुछ करने का प्रयास किया है और उनके प्रयास परिणामों के रुप में यह सामने है। यह देश का सौभाग्य ही कहा जायेगा कि एक लंबे अन्तराल के बाद देश को समर्पित, कड़ी मेहनत कर निर्भीक राष्ट्र व जनहित में निर्णय लेने वाला प्रधानमंत्री देश को मिला है। अब निर्णय सरकार के मंत्री, दल और विपक्षी दल सहित उन विधा, विद्ववानों को लेना है, जो राष्ट्र के बारे में चिन्तन तथा जीव-जगत ही नहीं, मानवता की सेवा को अपना धर्म मानते है। 
जय स्वराज
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