अराजकता की ओर अग्रसर म.प्र. में स्वास्थ और शिक्षा

विलेज टाइम्स समाचार सेवा : अरबों रुपया फूकने के बावजूद अराजकता की ओर अग्रसर शिक्षा और स्वास्थ सेवा की समस्या ने क्या आम क्या खास गांव, गली, गरीब, पीडि़त, वंचित, किसान, मजदूर सभी को झंझकोर दिया है। कलफते बिलखते लोगों के सामने ले देकर अब सिर्फ और सिर्फ एक सेवा ही सवाल है कि जनकल्याणकारी सेवा भावी सत्तायें सरकारें ऐसी हो  होती है। सवाल आज उनके भी सामने आज यक्ष यहीं है कि जो गाड़े पसीने की कमाई टेक्स के रुप में सुविधा सेवा जुटाने वह सरकारों को देते है। जिससे सरकार और नौकरशाह, कर्मचारियों को 20 हजार से लेकर लाख रुपये से अधिक के वेतन भत्ते बंटते है आखिर वह इतने निर्दयी कैसे हो सकते है। 

मगर सच यह है कि म.प्र. में शिक्षा या स्वास्थ सेवा के नाम ऐसी ही हो रहा है आय दिन अखबारों में छपने वाली स्थानीय खबरों में स्कूल में ताले शिक्षकों का स्कूल न जाना, माध्यमिक स्कूल के छात्रों को मु यमंत्री, प्रधानमंत्री अस्पताल की जगह घर पर मरीजों का इलाज, स्वास्थ सेवा के नाम मोटा धन खड़ा कर सरकारी कॉलेजों से डाक्टर को सरेयाम अंगूठा दिखाना इतना ही नहीं शिक्षा के नाम बड़ी इन्डस्ट्रीज में तब्दील प्रायवेट स्कूलों द्वारा दिशा निर्देशों का पालन न कर शिक्षा के नाम पालकों की लूट अराजक व्यवस्था के ही साक्षात उदाहरण है। 

मजे की बात यह है कि म.प्र. की सक्षम सरकार इन माफियाओं के आगे या फिर फ्री में हजारों की पगार हर महिने हासिल करने वालो के आगे अक्षम और असफल नजर आती है। कहते है जिस ग्राम, नगर, शहर, जिला, संभाग, प्रदेश की अगर शिक्षा और स्वास्थ जैसी अहम सेवायें अराजक स्थिति में पहुंचे जाये अंदाजा लगाया जा सकता है। 

बेहतर हो सरकार और सरकार के मुखिया मानव जीवन से जुड़ी पनपती विकट समस्या पर संवेदनशीलता के साथ संज्ञान ले, तभी कुछ सुधार हो सकता है। वरना बिलखती कलफती जनता ने संज्ञान लिया तो वह न तो सरकारों न ही लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिये उचित होगा जैसा कि आय दिन अस्पताल  में देखने मिलता है। 
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