स्वयं सिद्ध, स्वार्थो में स्वाहा होते संस्कार और संस्कृति, धर्नाजन की बारुद से खेलता राष्ट्र

विलेज टाइम्स समाचार सेवा : जिस तरह की अन्धी दौड़ धर्नाजन को लेकर विगत 3 दशक से देश ही नहीं कई प्रदेश, व्यक्ति, परिवार, समाज में शुरु हुई है अब उसका वीभत्स चेहरा धीरे-धीरे बतौर व्यवस्था और व्यक्ति, परिवार, समाजों के रुप में साफ नजर आने लगा है। आज स्वयं सिद्ध स्वार्थो ने हमें इतना अंधा कर दिया जिसके सामने संस्कृति, संस्कारों की जलती होली तक हमें दिखाई नहीं देती, कभी-कभी तो लगता है कि स्वयं सिद्ध स्वार्थो ने आज इस महान राष्ट्र को धर्नाजन के बारुद पर ला  खड़ा कर दिया है, जिसके आगे बड़े से बड़े सार्थक प्रयास भी आज नाकाफी साबित हो रहे है। अगर वाक्य में ही आज हम ऐसी स्थिति में पहुंच चुके है तो निश्चित ही हमें समृद्धि खुशहाली की कल्पना करना बैमानी है। क्योंकि समाज में पसरा भ्रष्टाचार, बैमानी और स्वयं सिद्ध स्वार्थो का बोल वाला अब व्यक्ति, परिवार, समाज, व्यवस्था में सर चढक़े बोल रहा है।

अगर ऐसे में संवैधानिक व्यवस्था या राज सत्ता पर कुव्यवस्था को लेकर कोई सवाल करता है तो सबसे पहले राष्ट्र की प्रथम सीढ़ी व्यक्ति, परिवार, समाज पर सवाल करना लाजमी होगा जो अपने कर्तव्य भूल अधिकारों की अंधी दौड़ में स्वयं सिद्ध स्वार्थ के चलते या उन स्वार्थवत सत्ताओं के चलते व्यक्ति, परिवार, समाज के बीच ऐसा कोई मूल भूत ढांचा नहीं खड़ा हो सका जिससे लोगों के जीवन मूल्य, संस्कार, संस्कृति और स यता का संरक्षण कर, राष्ट्र को खुशहाल व समृद्ध बनाया जा सकता था।

सच तो यह है कि बिलासिता के बढ़ते बाजार ने व्यक्ति, परिवार, समाज की सोच कोई ही निढाल कर दिया। बल्कि हमारे जीवन मूल्य, सिद्धान्त, संस्कार, संस्कृति को भी इस बेरहमी से कुचल दिया जिससे हमारे बीच ही एक इतना बड़ा वर्ग प्रदाता, उपभोक्तता के रुप में भ्रष्ट, लालची और बेईमान के रुप में खड़ा हो गया और यहीं हम महान भारत वासियों का र्दुभाग्य रहा। 

देखा जाये तो आज न तो हमारे बीच हमारी महान संस्कृति जो हमारी अनादिकाल से बड़ी संरक्षक रही, न ही हमारे वह संस्कार जो मार्गदर्शक हुआ करते थे और न ही वह स्वाभिमान जो हमारी सबसे बड़ी दौलत थी और न ही हमारा वह अभिमान, पहचान रही, जो हमें हमारे जीवन मूल्यों और प्राकृतिक सिद्धान्तों से हासिल थी, न तो अब हम आध्यात्म बचे, न ही वह तकनीक, जो अब हमारे जीवन चक्र को समृद्ध और खुशहाल बना सकता था।  

बहरहाल अगर आज भी हम बारुद के ढेर पर बैठ, खुशहाल जीवन के विनाश को नहीं देख पा रहे, तो तय मानिये कि हमारे द्वारा स्वयं  सिद्ध स्वार्थो में डूब इकट्टी की जाने वाली अकूत दौलत, न ही वह वैभव हमारे महान राष्ट्र व्यक्ति, समाज, परिवार, व्यवस्था को कभी समृद्ध खुशहाल बना पायेगें। 

क्योंकि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अगर किसी राष्ट्र के लिये व्यक्ति, परिवार, समाज अहम कड़ी होती है तो उस भू-भाग का भी अस्तित्व भी अहम होता है जहां लोग मिल-जुलकर स्थापित व्यवस्था में रहते है। आखिर हम अपने-अपने कत्र्तव्य उत्तरदायित्वों के निर्वहन के दौरान यह क्यों भूल रहे है कि सभी को जीवन पर्यन्त इसी भू-भाग पर मिल-जुलकर रहना है क्योंकि वैभव, धन, दौलत कभी स्थाई नहीं रहतेे, मगर जीवन एक स पूर्ण सत्य है जिसे हम या तो अपने द्वारा ज्ञान या अज्ञानता बस कुव्यवस्था के बीच जी ले, या फिर स्वयं सिद्ध स्वार्थो को छोड़ प्राकृतिक सिद्धान्त अनुरुप सुव्यवस्था का निर्माण कर जी लें, जो हमारी आने वाली नस्लों के लिये हमारी ओर से बड़ी विरासत और तोहफा होगा फैसला हम महान भारत वासियों को लेना है। 
जय स्वराज 
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