स्वकेन्द्रित अंहकार और स्वार्थो की बेबसी नैतिक पतन का मार्ग प्रस्त करती सत्ता उन्मुख संस्कृति

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा : जिस तरह प्रकृति में क्रिया की प्रतिक्रिया स्वभाविक है उसी तरह समाज व सार्वजनिक जीवन में उसका होना अवश्यम भावी है। मगर हमारे महान लोकतंत्र के महान भारत भू-भाग पर एक मर्तवा फिर से जिस तरह स्वकेन्द्रित अंहकार और स्वार्थो की बेबसी स्पष्ट दिखाई दे रही है। उससे यह संकेत साफ है कि सत्ता उन्मुख संस्कृति पूर्व उदाहरणों से सबक न ले, आज भी नैतिक पतन की ओर अग्रसर है।  

जिसके चलते संपन्न, खुशहाल भारत का सपना अभी भी कोसो दूर दिखाई पड़ता है आज जिस तरह से आध्यात्म, ज्ञान, विद्या, विद्वानो की अनदेखी कर, उन्हें तिरस्कृत कर अंधे कुयें में धकेलने का जो जाने अनजाने में असफल प्रयास हो रहा है। उसे देखकर दुख भी होता है और दर्द भी, जिस महान संस्कार व संस्कृति की दम पर हम स्वयं को गौरवशाली और गौरान्वित मेहसूस करते थे आज उसका पतन, देख हम स्वयं को ठगा सा मेहसूस करते है। निहित स्वार्थो के नंगे नाच के चलते जिस तरह स्वार्थ में डूबे लोगों ने जिस तरह से मुंह बन्द कर रखे है, उससे साफ है कि अब महान भारत की बागडोर स्वकेन्द्रित अहंकार के हाथ जाती दिखाई पड़ती है और स्वार्थ में डूबे तथाकथित जनसेवक सगठन शान्त दिखाई देते है, जो किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिये घातक है और आने वाली नस्ल के लिये खतरनाक। 

बेहतर हो कि समस्त देश वासी अपने निहित स्वार्थ, अंहम, अहंकार भुला अपनी महान संस्कार, संस्कृति, संस्थाओं को पुर्नजीवित करे, न कि क्रिया की प्रतिक्रिया देने के चक्कर मे अपने जीवन मूल्य, नैसर्गिक सिद्धान्तों को भूल प्रतिशोध के चलते अपने ही महान आध्यात्म विद्या, विद्ववानों को तिलांजली दे, एक ऐसा असफल प्रयास करे जिससे न तो हमारे महान भारत और न ही इस राष्ट्र के महान नागरिकों का कोई भला होने वाला है 
जय स्वराज
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