खिलवाड़ का खामियाजा अतिवर्षा, वृष्टि, बाढ़, भूस्खलन, भूकंप, नैतिक पतन- मुख्य संयोजक स्वराज

विलेज टाइम्स : जिस तरह से जीवन की अन्धी दौड़ ने प्रकृति से जो खिलवाड़ किया है उसके परिणाम अब धीरे-धीरे कभी अतिवर्षा, वृष्टि, सूखा, बाढ़, भूस्खलन, भूकंप,  नैतिक पतन के रुप में सामने आने लगे है। जो इस बात की गवाह है कि जो मानवीय भूल जाने-अन्जाने या जानबूझकर स्वार्थ के लिये की गई उसमें, सुधार या समझ की गुजांइश अभी भी दूर-दूर तक फिलहाल दिखाई नहीं देती है। क्योंकि मानव जगत आज भी अहम, अहंकार में डूब अज्ञानता बस स्वयं स्वार्थो के लिये हिंसक हो, प्रकृति से लडऩे का असफल प्रयास करने में लगा है। 

जिसका कारण जिस तरह से मानव जगत का जीवन की अंधी दौड़ में नैतिक पतन हुआ है उससे उसकी चेतना शनै-शनै शून्यता: की ओर बढ़ चिंतन शून्य होती जा रही है। परिणाम कि इससे हमारी प्राकृतिक व्यवस्था, सिद्धान्त, जीवन मूल्य एवं हमारी जीवन निर्वहन की व्यवस्थागत संस्थायें भी प्रभावित हुई है। मगर मानव अभी भी इन भीषण विभीषकाओं से सबक लेने तैयार नहीं। 

जिस तरह से हमारे महान देश में अल्प, भीषण वर्षा, बाढ़, भूस्खलन और भूकंप का दौर शुरु हुआ है कम से कम उससे तो यहीं अन्दाज लगाया जा सकता है। बात चाहे प्रकृति, समाज, संस्थागत व्यवस्थाओं की हो सभी ओर निराशा का भाव दिखाई पड़ता है। क्योंकि जिस प्रकृति की रक्षा, संरक्षण, संवर्धन की जबावदेही मानव को प्रकृति ने सौंपी थी उसी तरह समाज की रक्षा, संरक्षण, संवर्धन का कार्य प्राकृतिक सिद्धान्तों के अनुरुप सौंपी थी। जो जीवन मूल्योंं को सांक्षी मार्गदर्शक मान प्रकृति एवं मानव कल्याण के लिये कार्य कर, जीवन को संपन्न व खुशहाल बना सके। 

 मगर मानवीय चूक ने न तो प्रकृति का ख्याल रखा, न ही मानव जगत सहित जीव, जगत का याल रखा। देखा जाये तो प्रकृति की विपदा तो अल्प, अतिवर्षा, बाढ़, भूस्खलन, भूकम के रुप में तो नजर आती है। मगर जो श्राषदी मानव जगत के अन्दर चल रही है वह जब तब सामने आती है। मगर अब उसकी विभीषका भी इतने बड़े पैमाने पर बढ़ गई है कि उसके आगे क्या हमारे जीवन मूल्य, धार्मिक व सामाजिक पर परायें और पारिवारिक संस्कार भी नाकाफी नजर आते है और यह बीमारी धीरे-धीरे घटने की बजाये बढ़ती ही जा रही है। क्योंकि न तो अब ऐसे चरित्रवान दिव्य मार्गदर्शक ही नजर आते, न ही ऐसी सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिक, नीति, सिद्धान्त और न ही प्रकृति प्रदत्त सिद्धान्तों पर चलने वाला वह समाज और परिवार जिनसे मानव ही नहीं, समुचे जीव-जगत का  जीवन स पन्न खुशहाल बनता है। 

आज एक बार फिर से यह सबसे बड़ी जवाबदेही महान भारत पर आनपढ़ी है क्योंकि इसका निदान अनादिकाल से इसी महान भू-भाग से होता रहा है। और हम उन महान पूर्वजों की संतान है जिन्होंने मानव ही नहीं समुचे जीव जगत को कई मर्तबा ऐसी परिस्थितियों को निकाल, लोगों का जीवन संपन्न खुशहाल बना भारतवर्ष का लोहा समुचे विश्व में मनवाया है। क्योंकि अगर हम आध्यात्म है तो हमारी महान संस्कृति समुचा विज्ञान और तकनीक है जो पीढ़ी दर पीढ़ी हमारी रगो में रक्त बनकर दौड़ता रहा है। अगर हम हमारी सांस्कृतिक विरासत से प्राकृतिक सिद्धान्त अनुरुप, संस्कारों के बल संपर्क स्थापित कर पाये, तो निश्चित ही एक दिन हम इन तमाम समस्या बाधाओं को पार कर एक बार फिर से अपने महान भारत का वह ओहदा समुचे विश्व में स्थापित कर पायेगें जिसके लिये भारतवर्ष को जाना जाता है। 
जय स्वराज 
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