बौद्धिक संपदा की रक्षा एवं विश्वास का बड़ा संकट खतरनाक दिशा में बढ़ता देश

व्ही.एस.भुल्ले, विलेज टाइम्स समाचार सेवा : कहते है खतरनाक वातावरण अच्छी-अच्छी विधा, संस्कृति और राष्ट्रों को निगल जाता है। अगर वातावरण शुद्ध और संरक्षित न हो। र्दुभाग्य हमारे इस महान भू-भाग और हमारे महान लोकतंत्र का कि एक मर्तबा फिर से हम उसी त्रासदी की ओर बढऩे जा रहे है। जिससे मुक्ति के लिये हम सेकड़ों हजारों वर्षो से हमारे पूर्वज संघर्ष करते आये है। और अगर ऐसा ही रहा, तो हम ही नहीं हमारी आने वाली नस्ले भी इसी तरह संघर्षरत बनी रह सकती है। 

क्योंकि जिस तरह से सत्य पर परदेदारी की नई संस्कृति की शुरुआत इस महान भू-भाग पर होती दिखाई देती है, उससे तो यहीं अंदाजा लगाया जा सकता है। क्योंकि न तो अब विधा, विद्वान संरक्षित-रक्षित स्वयं को मेहसूस करते है और न ही प्रकति सुरक्षित नजर आती है। जुनून भरे माहौल में स्वयं सिद्ध विद्वान राष्ट्र भक्तों की फौज में अब न तो सत्य का कोई स्थान दिखता, न ही उस महान संस्कृति के दर्शन होते जिसके आधार पर भारतवर्ष महान कहा जाता है।

आज हमारे आचरण, व्यवहार, संस्कृति, सिद्धान्त, संस्कार अनुशासन को लेकर हमारे सामने कई सवाल खड़े है। वह सवाल धर्म, समाज, राजनीति तक ही अब सीमित नहीं रहे। हमारी महान लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी वह सवाल खड़े हो गये है, जिनकी समीक्षा अब आवश्यक है। 

कहते है किसी भी राष्ट्र और उसकी राज्य व्यवस्था के लिये उसके अंगो पवित्रता सत्य के प्रति समर्पण और जनकल्याण सहित विधा, विद्ववानों का संरक्षण संवर्धन अहम होती है। चूंकि आज भारतवर्ष की व्यवस्था लोकतांत्रिक है लिखित संविधान उन्मुख है। जिसे संचालित रखने संविधान में विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका को असीमित अधिकार प्राप्त है। जो देश की 125 करोड़ जनता की भाग्य विधाता भी व्यवस्था के तौर पर मानी जाती है। 

आज जब धर्म को बदनाम कर लाखों लोगों को बरगलाने वाले एक स श के खिलाफ संविधान की न्याययिक संस्था कार्यपालिका की जांच उपरान्त देश के प्रधानमंत्री के निर्देश पर 15 वर्ष बाद कड़ी सजा का ऐलान करती है तो दिग्भ्रमित लाखों की तादाद में सुनियोजित तरीके से एक जगह एकत्रित हो उपद्रव करने लोगों की जान जोखिम में डालने लोकतांत्रिक मान्यताओं व्यवस्था को नष्ट, भ्रष्ट करने एक जगह न्यायपालिका के निर्णय का विरोध करने कैसे एकत्रित हो जाती है। और विरोध में फैसला आने पर कानून की परवाह किये ऐसा तांडाव मचाती है कि समुचे देश की 125 करोड़ की जनता ही नहीं, विश्व विरादरी भी सहम जाती है। और एक मर्तवा फिर से सरकार व नौकरशाही यानी कार्यपालिका कि लापारवाही पर संज्ञान ले, फुल बैंच में यह टिप्पणी करने मजबूर हो जाती है। 

कि ढेरा सच्चा सौदा प्रमुख दुष्कर्म के आरोप बाबा गुरमित सिंह को दोषी करार दिये जाने के बाद हुये उपद्रव ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। इस उपद्रव में सरकार की नाकामी साफ जाहिर हुई है। इस पर हरियाणा और पंजाब हाईकोर्ट ने हरियाणा की मनोहर लाल खट्टर सरकार को जमकर फटकार लगाई। कोर्ट की फुल बैंच ने कहा कि सरकार ने हालात के सामने सरेन्डर कर दिया। केन्द्र सरकार को फटकार लगाते हुये देश के प्रधानमंत्री के बारे में कहा कि  वह देश के प्रधानमंत्री है न कि बीजेपी के। 

जब केन्द्र के वकील ने कहा कि हरियाणा की हिंसा राज्य का विषय है इस पर कोर्ट ने कहा कि क्या हरियाणा भारत का हिस्सा नहीं। यह तो वह तथ्य है जो देश के समुचे समाज में आज चर्चा का विषय बन रहे है। मगर इससे बड़े र्दुभाग्य की बात तो यह है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने भी हरियाणा मुख्यमंत्री पर कोई कार्यवाही न करते हुये यह साबित कर दिया कि शायद उनके लिये उन्हीं की पार्टी के मूल्य सिद्धान्त, नैतिकता एक छोटे प्रदेश की सरकार ही नहीं, मात्र एक पार्टी के मुख्यमंत्री के आगे कोई मायने रखते। 

चर्चा तो यहां तक है कि आज जिस तरह से स्वयंभू विधा, बुद्धिमान राष्ट्रभक्तों की मण्डली, विधा, बुद्धि को प्राकृतिक सिद्धान्तों के विरुद्ध बांधने का असफल प्रयास कर, नई निर्जीव संस्कृति को भाड़े की ऐजेन्सियों के सहारे प्रयास कर रही है और स्वयं को बड़ा विद्ववान महापुरुष बताने की कोशिश में जुटी है वह आने वाले दिनों में विनाश के बड़े कारण साबित होगें। जिस तरह के परिणाम न्याय उपरान्त जोगी बाबाओं के सामने आ रहे है आज नहीं तो कल क्षेत्र, प्रदेश, देश का स्वयं को सर्वेसर्वा महान बताने वालो के भी परिणाम देश के सामने हो, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। मगर तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। 

बेहतर हो कि देश का भला करने वाले दल वह देश भक्त वह इन्सान एक हो, सत्य के साथ खड़े हो क्योंकि दुनिया के सत्यों में एक सत्य प्रमाणिक रुप से अनादिकाल से सूर्य और चंद्रमा का उदय और अस्त है जिस तरह किसी भी जीव, मानव का जन्म और मृत्यु तय है। जीवन की परिक्रमा चक्र भी उसी सत्य के समान है जिस तरह सूर्य और चंद्रमा अपनी परिक्रमा करते है सत्य यह है कि अगर सूर्य, चंद्रमा निर्धारित समय से अपनी परिक्रमा प्राकृतिक सिद्धान्तों के अनुरुप न करें, तो असत्य कैसा होगा इसका अन्दाजा हमें लगा लेना चाहिए क्योंकि सत्य, सत्य होता है और सत्ता आनी जानी। अगर सत्य की रक्षा के लिये कई सत्तायें भी कुर्बान हो जाये तो इन्सानियत की रक्षा के लिये हमें यह चूक नहीं करना चाहिए चूंकि विश्चास व प्रकृति की रक्षा के लिये मात्र एक व्यक्ति को पद त्याग करना है न कि समुची सरकार और दल को जो नये भारत निर्माण के लिये संकल्पित है। वरना प्रकृति सक्षम और सफल साबित हुई हमेशा सत्य की रक्षा में।  
जय स्वराज
SHARE
    Your Comment

0 comments:

Post a Comment