वोट की नीति निगलती, लोक-तंत्र अराजक स्थिति में अक्षम हुआ तंत्र

व्ही.एस.भुल्ले :  हरियाणा का सिरसा, पंचकुला में बेकाबू भीड़ का नंगा नाच तो मात्र खतरनाक वोट नीति की एक नजर भर है जो देश के सामने है। अभी त...

व्ही.एस.भुल्ले : हरियाणा का सिरसा, पंचकुला में बेकाबू भीड़ का नंगा नाच तो मात्र खतरनाक वोट नीति की एक नजर भर है जो देश के सामने है। अभी तो भारत के महान लोकतंत्र के सामने ना जाने कितने ऐसे जघन्य घटनाक्रमों को देश के सामने आना है। जो वोट नीति से पोषित हो न जाने देश के कितने क्षेत्रों में दीमक की तरह लोकतंत्र को निगलने में लगे है। आज व्यथित देश को ही नहीं, देश की 125 करोड़ आवाम को सबका साथ, सबका विकास का नारा बुलंद करने वालो की राष्ट्र भक्त मंडली से बड़ी उम्मीद थी, जो पानी पी-पीकर देश को आजाद करने वाली महान विभूतियों की भूमिका उनकी त्याग तपस्या पर सवाल खड़े कर, उन्हें कोसती थी या जिस प्रतिशोध की राजनीति के चलते वह स्वयं को उनके समकक्ष रखने तक से नहीं चूकती थी। 

बहरहाल समुचा देश ही नहीं समुचा विश्व इस हकीकत से वाकिब है कि खुदीराम बोस से लेकर सुभाषचन्द्र बोस और भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, विश्मिल सभी ने जान की बाजी लगाकर इस महान भू-भाग को आजाद कराया था। इससे पूर्व भी कई महान राजे, रजबाड़ों ने आक्रांताओं से लोहा ले, अपना सबकुछ लुटा अपना बेभांव खून मातृ-भूमि एवं आवाम की रक्षा के लिये बहाया था। कौन नहीं जानता कि बालगंगाधर तिलक जी के आग्रह पर गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका का नहीं, अपना शूट-बूट छोड़, देश की खातिर मात्र एक लंगोट, लाठी के सहारे, ब्रितानियां से हुकूमत से लोहा ले, अंग्रेजों को छठी का दूध याद दिलाया था। संपन्न परिवार में जन्में पढ़े-लिखे नौजवान पं.जवाहर लाल नेहरु ने कितने दिन-रात, वर्ष देश की खातिर जेल में परिवार से दूर रह बिताया था। कौन नहीं जानता कि धोखेबाज चीन ने आजादी और महान भारत के भीषण बंटवारे और कई रियासतों में बंटे देश को संभालने के 14 वर्ष बाद ही घिनोना आक्रमण कर नन्हें से आजाद भारत को जवान होने से पूर्व ही कुचलने का प्रयास किया था। 

जिस आघात को शायद देश का पहला प्रधानमंत्री नहीं सह सका और देश से विदा ले गया। कौन नहीं जानता सादगी की विभुति देश के प्रति समर्पित जय जवान, जय किसान का नारा देने वाले लाल बहादुर शास्त्री जैसी विभूति का जिनका निधन भी देश के लिये कार्य करते हुये हदयघात से हुआ। वो इन्द्रा गांधी ही थी जिन्होंने पड़ोसी देश को लाख समझाने के बावजूद आये दिन की उसकी अमानवीय हरकतों से आहत और मानवता की रक्षा के लिये पड़ोसी पाकिस्तान को सबक सिखाते हुये पाकिस्तान के चंगुल से बांग्लादेश को आजाद कराया और इसी प्रकार पंजाब में पनपते आतंकवाद को समाप्त करने तथा देश की एकता-अखंण्डता के लिये अपने राजधर्म का पालन करते हुये कानून की खातिर आतंकियों के खिलाफ सैनिक अभियान चला, देश की एकता-अखंण्डता को बचाया था जिसका परिणाम कि उन्हें उन्हीं के सुरक्षाकर्मियों द्वारा गोलियों से भून मौत के घाट उतार दिया गया। 

वहीं वह देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ही थे जिन्होंने दक्षिण भारत की सुरक्षा एकता-अखंण्डता के लिये श्रीलंका में भारतीय सेना को भेजना पड़ा और परिणाम कि उन्हें शान्ति, एकता, अखंण्डता के दुश्मनों द्वारा बम से उड़ा दिया गया। 

मगर र्दुभाग्य कि आज हमारा महान देश एक बार फिर से देश की शान्ति, एकता, अखंण्डता के दुश्मनों से संघर्ष कर रहा है। और वह तब की स्थिति में जब हमारे प्रधानमंत्री पूरी द्रण इच्छा शक्ति के साथ नये भारत गणने का सपना देख, देश के नवनिर्माण की ओर अग्रसर है। तब हरियाणा जैसे राज्य में पहले जाट आंदोलन की दहशत और तबाही और अब एक ओर बाबा के हिंसक भक्तों का सिरसा पंचकुला ही नहीं कई राज्यों में हिंसा का नंगे नाच ने देश को एक ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां आज समुचे देश ही नहीं विश्व की निगाहे देश के प्रधानमंत्री की ओर आ टिकी है। 

विगत तीन वर्षो में देश के प्रधानमंत्री ने जो विश्वास देश की जनता और विश्व भर में भारतवर्ष के लोगों के बीच कड़ी मेहनत कर, पैदा किया है और वर्षो से आशा आकांक्षा पाले 125 करोड़ लोगों के बीच भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था व अन्तिम छोर पर बैठे लोगों को उनके हक मिलने का जो अभियान छेड़ा है, अगर कम शब्दों में समझे तो अब देश के प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा इस घटनाक्रम के बाद अब दांव पर लग चुकी है। अगर केन्द्र की ओर से देश के 125 करोड़ लोगों की आशा आकांक्षा अनुरुप राजधर्म का पालन नहीं हुआ और समुचे देश को एक लाइन में, सरकार की ओर से यह संदेश नहीं गया कि इस महान देश में देश के संविधान, कानून से ऊपर कोई भी नहीं, फिर वह कोई भी हो, तो निश्चित ही देश के लिये कड़ी मेहनत करने वाले प्रधानमंत्री की संपूर्ण त्याग-तपस्या का तो नुकसान होगा ही बल्कि राष्ट्र का भी बड़ा नुकसान होगा। जिसे कोई भी महान राष्ट्र भक्त नागरिक स्वीकार नहीं करेगा और न ही ऐसे में लोकतंत्र पर उसका विश्वास टिकेगा। 

अब इस पर विचार देश की सरकार तथा देश के प्रतिविम्ब बन चुके प्रधानमंत्री सहित उन राष्ट्र भक्तों को करना चाहिए जो देश के लिये कड़ी त्याग-तपस्या कर रहे है और अपनी जान जोखिम डाल देश व देश की जनता की भलाई के लिये काम कर रहे है। क्योंकि वोट की नीति ने न तो आज तक इस महान राष्ट्र का भला किया है और न ही वह भविष्य में कोई भला करने वाली बेहतर हो राष्ट्र व राजधर्म का पालन करते हुये राष्ट्रद्रोहियों के खिलाफ सख्त कार्यवाहीं हो, तभी देश में कानून के राज का बेहतर संदेश जायेगा और यह देश संपन्न, शक्तिशाली, खुशहाल राष्ट्र बन पायेगा। 

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