डूबती कॉग्रेस का डरावना सच

व्ही.एस. भुल्ले : यूं तो देश में इसकी शुरुआत जनता दल के नेतृत्व वाली वी.पी. सिंह सरकार के समय से ही हो चुकी थी मगर नरसिंह राव ने संगठनात्मक स्तर पर कुछ कार्य कर इसे स हालने का प्रयास किया। मगर जैसे ही देश में अटल जी के नेतृत्व वाली सरकार बनी कॉग्रेस का छरण तेज हो गया मगर कॉग्रेस के पतन को तब लगे जब एक गैर राजनैतिक व्यक्ति को देश का प्रधानमंत्री चुन लिया गया। जिसे गलत ठहराना उन नेकदिल इन्सान के साथ बड़ी नइंसाफी होगी। जिसने अपने  अनुभव और हुनर के आधार पर देश को शिक्षा, स्वास्थ, सूचना, रोजगार का अधिकार सहित देश के 80 करोड़ से अधिक लोगों को खादय का संवैधानिक अधिकार दिया। 

मगर कॉग्रेस सरकार में मास्क नेतृत्व के सक्रिय न होने के चलते, कुछ कॉग्रेस नेता, औद्योगिक घराने सहित यू.पी.ए के सहयोगी संगठनों ने एक कर्तव्य निष्ठ ईमानदार बच भले प्रधानमंत्री की सरकार को अपने-अपने स्वार्थो के चलते बदनाम कर दिया, जैसी कि चर्चा आजकल राजनैतिक गलियारों में जोरों पर है। देखा जाये तो सत्ता और संगठन स्तर पर विगत 20 वर्षो के दौरान खासकर मोदी सरकार के पूर्व रही कॉग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में कॉग्रेस के शुभचिन्तकों  के रहते भी कोई शुभचिन्तक नहीं रहा और परिणाम कि कॉग्रेस को समुचे देश में वो दिन देखना पड़ रहे है जिसकी शायद उसने कभी कल्पना भी न की होगी।  

जिसका परिणाम कि कॉग्रेस दिल्ली, छत्तीसगढ़, म.प्र., राजस्थान सहित उत्तराखंण्ड, यू.पी., गोवा, महाराष्ट्र, बिहार, मणिपुर में चाह कर भी सत्ता में नहीं लौट सकी। न ही कॉग्रेस इस दौरान संगठन को ही इतना मजबूत कर सकी, कि वह एक सेकड़ा से अधिक अनुवांशिक संगठनों वाले दल से सीधा लोहा ले सके। इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि गुजरात, छत्तीसगढ़, म.प्र., गोवा, मणीपुर में ऐसा क्या विगत 15 वर्षो में घटा कि कॉग्रेस धीरे-धीरे सिकुड़ अब खात्मे की ओर अग्रसर है। 

आज सवाल होना चाहिए उन रणनीतकारों से जो आज भी केन्द्र व कई प्रदेशों से सत्ता जाने के बावजूद भी सत्ता की खुमारी छोडऩे तैयार नही, न ही वह राज्यो में संगठनात्मक ढांचा तैयार कर, यह सोचने तैयार नहीं कि अब डूबते  अस्तित्व को कैसे नये सिरे से तैयार किया जाये। 

सच क्या है ये तो कॉग्रेस आलाकमान और उसके वह रणनीतकार ही जाने जिनकी रणनीत के तहत कॉग्रेस अब अस्तित्व के लिये संघर्ष ही नहीं, अन्तिम दिन गिनने पर मजबूर नजर आती है। क्योंकि कॉग्रेस को अब यह नहीं भूलना चाहिए कि जब तक वह विभिन्न स्तरों पर अपनी संगठनात्मक क्षमता नहीं बढ़ा लेती, तब तक अब उसका भला होने वाला नहीं, फिर कॉग्रेस का नेतृत्व जो भी रहे, इससे कोई फर्क पडऩे वाला नहीं। 
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